Saturday, November 29, 2014

भीख नहीं, वंचितों का अधिकार है आरक्षण

इस समय देश में पदोन्नति में आरक्षण को लेकर एक गंभीर बहस छिड़ी हुई है। कैबिनेट ने प्रस्ताव पास कर दिया कि अनुसूचित जाति/जनजाति को पदोन्नति में आरक्षण दिया जाना चाहिए। बसपा ने इसका समर्थन किया और समाजवादी पार्टी ने विरोध। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री ने 21 अगस्त को सर्वदलीय बैठक बुलाई थी और उसमें भी तय हुआ कि पदोन्नति में आरक्षण को लेकर संवैधानिक संशोधन की जरूरत है। संसद में 51 पार्टियां हैं, जिनमें सपा को छोड़कर सभी ने पदोन्नति में आरक्षण का समर्थन किया है।

2006 में सुप्रीम कोर्ट ने एम. नागराज के मामले में फैसला दिया था कि तीन शर्तो को पूरा करने के बाद ही पदोन्नति में आरक्षण दिया जाए। सवर्णो में जलन है कि कम योग्यता पर अनुसूचित जाति/जनजाति के लोग नौकरी में आ जाते हैं और साथ ही पदोन्नति में आरक्षण भी ले लेते हैं।

कई जगह पर भ्रम है कि आरक्षण की व्यवस्था 10 साल के लिए ही की गई थी। सच्चाई यह है कि राजनीति में आरक्षण 10 साल के लिए है, न कि सरकारी नौकरी में। आरक्षण पूरा ही नहीं हो पाया है तो यह कहना कि कब तक इन्हें आरक्षण मिलता रहेगा, भेदभाव की सोच है।

भारत सरकार में 149 सचिव हैं जिनमें एक भी अनुसूचित जाति का नहीं। 108 अतिरिक्त सचिव में केवल दो अनुसूचित जाति के हैं। 477 कनिष्ठ सचिव हैं, जिसमें केवल 31 अनुसूचित जाति के हैं। इस तरह से 590 निदेशकों में से 17 इस वर्ग से हैं। कौन नहीं जानता कि सारे नीतिगत फैसले सचिव एवं अतिरिक्त सचिव के हस्ताक्षर पर ही होते हैं। फिर प्रशासनिक क्षमता के लिए कौन जिम्मेदार है-दलित या जो उच्च पदों पर हैं?

आरक्षण विरोधी बताएं कि आजादी के बाद से लेकर अब तक 15 प्रतिशत आरक्षण पूरा क्यों नहीं हो पाया है? क्या कभी उन्होंने दलितों को अपना ही भाई समझकर मांग की कि आरक्षण अभी तक पूरा क्यों नहीं हो पाया? केवल चतुर्थ श्रेणी में कोटा पूरा ही नहीं, बल्कि थोड़ा ज्यादा ही है और उसका कारण है कि सफाई के काम में सवर्ण भर्ती नहीं होते।

शिक्षा जगत में स्थिति और भी खराब है। कुल 1864 प्रोफेसरों में से 14 अनुसूचित जाति और 11 जनजाति के हैं। इस तरह से रीडर के पद पर 38 अनुसूचित जाति के और 23 जनजाति के हैं, जबकि कुल संख्या है 3533। प्रवक्ता के पद पर भी स्थिति आरक्षण के अनुपात में दयनीय है। कुल 6688 प्रवक्ताओं में से 372 अनुसूचित जाति के और 223 जनजाति के हैं। जिस तरह से नौकरशाही में फैसला लेने के स्तर पर दलित-आदिवासी नहीं हैं उसी तरह से शिक्षा जगत में भी स्थिति है। फिर शिक्षा जगत में गिरावट के लिए कौन जिम्मेदार है? इसी वर्ष कार्मिक विभाग ने यह जानकारी दी कि उसे यह नहीं पता कि अनुसूचित जाति/जनजाति के कितने पद हैं।

जो आरक्षण का विरोध करते हैं उन्हें पूना पैक्ट के बारे में पता होना चाहिए। अंग्रेजी हुकूमत ने दलितों को पृथक मताधिकार अर्थात् दो वोट देने का अधिकार दिया था। एक सामान्य उम्मीदवार को और दूसरा दलित उम्मीदवार को। गांधीजी को यह नागवार गुजरा और उन्होंने पूना के यरवदा जेल में रहते हुए अनशन शुरू कर दिया। 22 दिन के लंबे उपवास के कारण डॉ. अंबेडकर के ऊपर दबाव बना कि वह पृथक मताधिकार की मांग ���ोड़ दें। देश में हाहाकार मच गया था। अंत में डॉ. अंबेडकर और गांधीजी के बीच में समझौता हुआ, जिसे पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है। जाहिर है, आरक्षण समझौते का प्रतिफल था। एक बार जब पृथक मताधिकार लागू हो जाता तो बहुत संभव था कि आजादी के समय देश के दो हिस्से ही नहीं, बल्कि तीन भी हो सकते थे। दलितों को अगर आरक्षण मिला है तो देश की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए।

अब जगह-जगह पर दलितों में आक्रोश पैदा हो रह��� है और वे कह रहे हैं कि आरक्षण भीख नहीं अधिकार है। सवर्णो और अन्य के साथ रहने के एवज में आरक्षण मिला है। निजीकरण एवं भूमंडलीकरण की वजह से सरकारी नौकरियां दिन-प्रतिदिन समाप्त हो रही हैं। अनुसूचित जाति/जनजाति की तरक्की जो भी हुई है वह राजनीति एवं सरकारी सेवाओं में आरक्षण की वजह से। निजी क्षेत्र अब बहुत बड़ा हो गया है, जिसमें इनकी भागीदारी नहीं के बराबर है। ऐसे में आरक्षण पर आपत्ति जताने वालों को देश के बारे में एक बार सोचना पड़ेगा। क्या इतनी बड़ी आबादी को राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग करके अखंड और मजबूत देश बनाया जा सकता है?

सुप्रीम कोर्ट का नजरिया यहां उचित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि जो तीन शर्ते उसने लगाई हैं उसकी जरूरत नहीं है। संवैधानिक संशोधनों ने पदोन्नति में आरक्षण के लिए कहीं अगर-मगर नहीं लगाया गया, फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने शर्ते लगा दीं। सुप्रीम कोर्ट की पहली शर्त है कि यह जांच की जाए कि ये पिछड़ हैं कि नहीं। दूसरी शर्त के अनुसार आरक्षण से दक्षता पर असर नहीं पड़ना चाहिए। अभी तक ऐसा प्रमाणित करने वाला उदाहरण देश में देखने को नहीं मिला। तमिलनाडु में आरक्षण 69 प्रतिशत तक है। शायद इसी वजह से वह कानून एवं व्यवस्था, शिक्षा एवं स्वास्थ्य, आदि के मामलों में आगे है। तीसरी शर्त के मुताबिक प्रतिनिधित्व की जांच करने के लिए कहा गया है। आंकड़े खुद बताते हैं कि आरक्षण पूरा हुआ ही नहीं तो सीमा लांघने की बात कहां पैदा होती है? सरकार को संवैधानिक संशोधन करके पदोन्नति में आरक्षण देना चाहिए। इससे देश की एकता और अखंडता मजबूत होगी, क्योंकि यह सबकी भागीदारी का मामला है।

अब सवाल उठता है कि आरक्षण कब तक? हजारों वर्ष की जाति व्यवस्था का अन्याय इतने कम सालों में खत्म नहीं होने वाला है। दलित, आदिवासी, पिछड़े आरक्षण छोड़ने के लिए तैयार हैं बशर्ते समान शिक्षा व्यवस्था हो जाए और जाति समाप्त कर दी जाए। वर्ना जब तक जाति रहे, आरक्षण मिलते रहना चाहिए। 

- साभार: डा0 उदित राज (राष्‍ट्रीय दैनिक मे छपे सम्पादकीय से अवतरित)
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/pratyuttar/entry/%E0%A4%AD-%E0%A4%96-%E0%A4%A8%E0%A4%B9-%E0%A4%B5-%E0%A4%9A-%E0%A4%A4-%E0%A4%95-%E0%A4%85%E0%A4%A7-%E0%A4%95-%E0%A4%B0-%E0%A4%B9-%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%95-%E0%A4%B7%E0%A4%A3

आरक्षण क्यों

आरक्षण क्यों
आरक्षण के संदर्भ में यह बात शुरू से ही उठती रही है कि आखिर आरक्षण की आवश्यकता क्या है. क्या पिछड़े लोगों को सुविधाएं देकर उन्हें मुख्य धारा में नहीं लाया जा सकता है. यह सवाल जायज हो सकता है, लेकिन ऐसे सवाल करने वालों को पहले यह जानना होगा कि आरक्षण दिया क्यों गया है.
आरक्षण दिए जाने के पीछे न्याय का सिद्धांत काम करता है, यानी राज्य का कर्तव्य है कि वह सभी लोगों के साथ न्याय करे. न्याय को दो अर्थों में देखा जा सकता है. पहला कानून के स्तर पर और दूसरा समाज के स्तर पर. कानून के स्तर पर न्याय दिलाने के लिए न्यायपालिका का गठन किया गया, जिसमें खामियां हो सकती है, लेकिन उन खामियों को सुधारा जा सकता है, जिससे न्याय सभी को मिल सके. उसी तरह समाज के स्तर पर न्याय का अर्थ है, वितरणमूलक न्याय से यानी समाज में प्रतिष्ठा, राजनीतिक शक्ति और आर्थिक संसाधानों का वितरण ऐसे हो जिससे किसी वर्ग या समुदाय को ऐसा नहीं लगे कि उसके साथ अन्याय हो रहा है, उसे सही मौका नहीं मिल रहा है.
सामाजिक अन्याय भारत में सदियों से होता रहा और अभी भी जारी है. भारत में सामाजिक अन्याय का सबसे बड़ा कारण जातिय व्यवस्था रही और इसके कारण सामाजिक प्रतिष्ठा कर्म के आधार पर नहीं, बल्कि जाति के आधार पर मिली. जाति के आधार पर कुछ वर्गों ने आर्थिक संसाधनों पर कब्जा किया और कुछ को आर्थिक संसाधनो से वंचित रखा गया. आर्थिक संसाधनों की कमी के कारण योग्यता प्रभावित हुई और योग्यता के अभाव में पिछड़ापन आया और असमानता कम होने के बजाय बढ़ता ही गया. इसी असमानता को कम करने के लिए विकल्प की तलाश की गई. इस असानता को कम करने के लिए तीन विकल्प मौजूद थे. पहला विकल्प सुविधाओं का था यानी शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण आदि की सुविधाएं उन वर्गों को  दी जाएं जिसे अभी तक उपलब्ध नहीं हुआ है. लेकिनcके पास इतना संसाधन नहीं था और न ही है कि वह सभी लोगों को इतनी ज्यादा और अच्छी सुविधाएं दे सके ताकि वह शारीरिक और मानसिक तौर पर उन वर्गों का मुकाबला कर सके, जिनके पास अपना संसाधन है, जो खुद के संसाधन से अपना विकास करने के योग्य हैं. राज्य ने वंचित वर्गों के लिए सुविधाएं दी है, लेकिन उस स्तर तक नहीं दे पायी है, जिस स्तर की सुविधाएं उच्च वर्गों के संसाधन युक्त लोगों को प्राप्त है. एक दूसरी बात यह भी है कि भारतीय समाज में निम्न जातीय लोगों को मानसिक तौर पर भी इतनी प्रताडऩा मिली है कि वे सामान्य वर्ग के लोगों के साथ समान सुविधाओं के साथ प्रतिस्पर्धा करने में पूरी तरह सक्षम नहीं थे और शायद उस समय तक नहीं हो पाएंगे, जब तक जातीय दंभ की भावना निम्नतम स्तर पर नहीं होगी. इसलिए सुविधाओं से समानता का सवाल ही नहीं उठता.
दूसरा विकल्प वरीयता है, यानी दो समान योग्यता वाले लोगों में पिछड़े को वरीयता दी जाए, जैसाकि अमेरिका आदि कई देशों में दी गई. लेकिन वरीयता समान योग्यता के बाद दी जा सकती है, जबकि यहां समान योग्यता तक पहुंचाने का रास्ता ही इतना कठिन है कि इसमें दशकों लग जाने के बाद भी मुश्किल से समान योग्यता आती क्योंकि यह सदियों से हो रहे शोषण का परिणाम रहा है. इसलिए भारत में इस विकल्प को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता था.
तीसरा विकल्प आरक्षण का था, जिसे भारत सरकार ने स्वीकार किया, क्योंकि सामाजिक न्याय दिलाने के लिए, कोई अन्य विकल्प नहीं था. हालांकि आरक्षण से योग्यता का ह्रास जरूर होता है और कुछ वर्गों के साथ इसे अन्याय भी कहा जा सकता है, लेकिन यह अन्याय उस अन्याय की अपेक्षा काफी कम है, जो हजारों सालों से होता रहा है और जिसके परिणाम स्वरूप इस व्यवस्था को अपनाया जाना नितांत जरूरी हो गया. यह भी सच है कि आरक्षण से सवर्ण हिंदुओं में विद्रोह की भावना पनपती है, लेकिन अगर आरक्षण नहीं  दिया गया तो इससे उन वर्गों में इससे काफी तीव्र विद्रोह की भावना पनपेगी और जो विस्फोटक रूप धारण कर सकता है, क्योंकि उनके पास सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक संसाधनों का अभाव है, जबकि सवर्णों के पास सामाजिक प्रतिष्ठा भी है और अपेक्षाकृत आर्थिक संसाधन भी इन लोगों से अधिक है. इसलिए आरक्षण की आवश्यकता पर किसी तरह का कोई संदेह होना ही नहीं चाहिए.
किसके लिए हो आरक्षण
आरक्षण से संबंधित सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर आरक्षण किसे दिया जाना चाहिए और इसका आधार क्या हो. आरक्षण लागू करने का मुख्य कारण सामाजिक अन्याय या वितरण मूलक अन्याय को कम करना रहा है. इसलिए यह जरूरी है कि इसे देने से पहले इस बात को समझा जाए कि आखिर अन्याय हुआ किसके साथ है. संविधान में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को इसके दायरे में रखने की बात की गई है, जिसे आधार बनाकर पिछड़े वर्ग के प्रतिनिधि यह तर्क देते हैं, कि आर्थिक आधार पर आरक्षण देना संविधान विरोधी है. लेकिन यहां इस बात को समझना जरूरी है कि क्या भारतीय संविधान में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ों की बात कही गई है, तो इसमें आर्थिक पिछड़ापन नहीं जोड़ा जा सकता है. भारतीय संविधान का स्वरूप लचीला है, इसमें संशोधन किया जा सकता है और किया भी गया है. इसलिए संविधान में अगर आर्थिक पिछड़ापन के आधार पर आरक्षण की बात नहीं की गई है, तो इसमें संशोधन कर इसे जोड़ा जा सकता है. अत: यह तर्क सही नहीं है. फिर आर्थिक आधार पर आरक्षण क्यों नहीं दिया जाना चाहिए. इसके पीछे का कारण कुछ और है. पिछड़ापन दो कारणों से होता है. पहला कारण स्वयं अपनी क्षमता का विकास समय की मांग के अनुसार नहीं करना और दूसरा उस क्षमता के विकास को समाज और शासन द्वारा अवरूद्ध कर दिया जाना. जिन लोगों के पिछड़ेपन का कारण स्वयं वह है, उसे आरक्षण देना एक बड़ी भूल होगी क्योंकि इससे विकास करने की भावना प्रभावित होगी और कोई भी व्यक्ति आरक्षण का लाभ उठाने के लिए अपने आर्थिक संसाधनों में कमी कर सकता है. इसलिए आरक्षण उन वर्गों को दिया जाना चाहिए, जिसके पिछड़ेपन का कारण समाज रहा है. भारत में दलितों, आदिवासियों तथा पिछड़ी जातियों के पिछड़ेपन का कारण समाज तथा शासन रहा है, क्योंकि जाति के आधार पर बंटे समाज में जाति को पेशा का आधार बनाया गया और कुछ जातियों को वैसे कामों से वंचित रखा गया, जिससे उसका सामाजिकआर्थिक विकास हो सकता था. इस जाति व्यवस्था को स्थापित करने तथा कुछ वर्गों को विकास करने से रोकने में शासन का भी बराबर का योगदान रहा है, क्योंकि राजशाही में इस व्यवस्था को कठोरता से लागू किया गया. इसलिए भारत में आरक्षण का आधार जाति ही हो सकता है, क्योंकि उच्च जाति के किसी व्यक्ति के विकास में न तो समाज रोड़ा बना है और न ही शासन.
आरक्षण का स्याह पक्ष
भारत की वर्तमान आरक्षण व्यवस्था पर समय-समय पर यह सवाल उठता रहता है कि आरक्षण का लाभ उन लोगों को कम मिल रहा है, जो इसके वास्तविक हकदार हैं, बल्कि उन लोगों को अधिक मिल रहा है, जिन्हें अब इसकी जरूरत नहीं रह गई है. भारत में आरक्षण का राजनीतिकरण हो गया है और इसे वोट बैंक का आधार बना लिया गया है, जिसके कारण सही तरीके से इसकी समीक्षा नहीं हो पाती है और इसके दायरे में आने वाले वर्गों की संख्या तो लगातार बढ़ायी जा रही है, लेकिन इसमें कटौती नहीं की जा रही है. यह संदेह जायज है और इसमें कोई दो राय नहीं है कि इसका राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा है. लेकिन इसके साथ यह भी समझना होगा कि आरक्षण का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत लाभ देना नहीं है और न ही केवल आर्थिक उद्धार है. आरक्षण का एक सबसे बड़ा उद्देश्य प्रदर्शनात्मक प्रभाव उत्पन्न करना है, जिससे उस वर्ग के लोगों को प्रोत्साहन मिले, जिस वर्ग का व्यक्ति आरक्षण का लाभ उठाकर शासन में बड़े पदों पर पहुंचा है. इससे उस वर्ग के लोगों का शासन के प्रति भरोसा बढ़ता है और उसमें मेहनत की प्रवृति का विकास होता है, जिसका लाभ उस वर्ग के अन्य सदस्यों को कम या अधिक जरूर मिलता है.
हालांकि आरक्षण में निहित दोषों को दूर करना निहायत जरूरी है और इसके लिए समय-समय पर इसकी समीक्षा की जानी चाहिए ताकि सही लोगों को इसका ज्यादा से ज्यादा फायदा मिल सके. इसके लिए राजनीति से प्रत्यक्ष तौर पर जुड़े लोग कदम नहीं उठाएंगे, क्योंकि उन्हें इससे वोट खिसकने का खतरा महसूस होता है, इसलिए यह जरूरी है कि दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के उन प्रतिनिधियों को आगे आकर इसके लिए आवाज उठाना पड़ेगा. उच्च वर्गीय लोगों के ऐसे सवालों से आरक्षण के लाभार्थी वर्गों को इसमें उनका अपना स्वार्थ दिखाई देता है, इसलिए उन्हीं के वर्ग के जागरूक लोगों को इसकी जिम्मेदारी उठानी होगी और अनुसूचित जाति-जनजाति में भी क्रीमिलेयर की अवधारणा लागू करने, केवल एक बार आरक्षण का लाभ मिलने, आरक्षण में आरक्षण दिए जाने जैसे मुद्दों को उठाना होगा ताकि आरक्षित वर्गों में इसके लाभ से वंचित लोग एक मंच पर आ सकें और राजनीतिक दलों पर इसका दबाव पड़े.
क्रीमीलेयर
क्रीमीलेयर का मतलब होता हैमलाईदार परत यानी आरक्षण पाने वाले वर्गों के वे लोग जो सरकार के द्वारा बनाए गए मापदंड( आय तथा सरकारी नौकरी में उच्च स्थान) के अनुसार आरक्षण के अधिकारी नहीं है. पिछड़े वर्ग में तो क्रीमीलेयर का प्रावधान हैलेकिन अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति में इसका प्रावधान नहीं हैजिसे लागू करने की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि आरक्षण का लाभ कुछ लोगों तक सीमित न रह पाए.
एक बार आरक्षण
एक बार आरक्षण से तात्पर्य है कि अगर किसी व्यक्ति को एक बार आरक्षण मिल चुका हैतो उसके बेटा या बेटी को आरक्षण न मिले क्योंकि आरक्षण का लाभ उठा लेने के बाद व्यक्ति की स्थिति सामान्य वर्ग के लोगों की तरह हो जाती है और उसे सुविधाएं दी जा सकती हैआरक्षण नहीं. इससे उस वर्ग के दूसरे लोगों को आरक्षण का लाभ मिलेगा और आरक्षण के मूल उद्देश्यों की प्राप्ति की संभावना बढ़ जाएगी.
आरक्षण में आरक्षण
आरक्षण में आरक्षण का तात्यपर्य यह है कि जिन वर्गों को आरक्षण दिया जा रहा है, उसमें भी यह देखा जाए कि कौन सी जाति ज्यादा पिछड़ी है और कौन कम. इसके बाद यह व्यवस्था की जाए कि अनुसूचित जाति या पिछड़े वर्ग(ओबीसी) के अंतर्गत जिन जातियों की स्थिति ज्यादा खराब है, उन्हें उसके अंदर ज्यादा आरक्षण दिया जाए ताकि इसका लाभ भी आनुपातिक तरीके से वितरित हो और आरक्षण का लाभ सही लोगों को मिल सके.

तेरा आरक्षण, आरक्षण है और मेरा आरक्षण, आरक्षण नही

आज कल कई लोग आरक्षण विरोध का खोखला ढिंडोरा पीट रहे है| जब मैने इनमे से कुझ लोगो ने जानना चाहा की क्या बह गाँधी विरोधी है तो आसमान ताकने लगे | क्यो की आरक्षण तो गाँधी की एक चाल थी जो बाबा साहब ने भारी दबाब मे आकर बनाई थी | जब बाबा साहब ने दलितों के लिया अलग से निर्वाचन की मांग रखी तो गाँधी भूख हड़ताल पर बैठ गया| तब बाबा साहब ने यह प्रस्ताव गाँधी के सामने रखा | तो सबसे पहले इन आरक्षण बिरोधिओ को गाँधी से नफरत  करनी चाहिये |
मेरा दूसरा सवाल था | तुमने कभी ट्रेन का टिकेट बुक कराया , सभी ने एक सुर मे कहा हा तो मैने कहा अभी तो तुम कह रहे थे की तुम आरक्षण विरोधी हो फिर भी आरक्षण करा लिया उनका तर्क था ट्रेन मे तो ऐसा ही होता है| मैने कहा क्यो | अगर बहा भी आरक्षण की खत्म कर दो तो कितना अच्छा होगा पहले आओ पहले पाओ और पैसा भी कम |
मेरा यह तर्क इसलिये था क्यो की अगर सच मे ट्रेन मे आरक्षण खत्म कर दिया जाये और पहले आओ पहले पाओ के तर्ज पर सीट मिले तो सोचो क्या होगा | यह तथा कथित अमीर जो जायदतर आरक्षण के विरोधी है कभी भी गरीब दलित से पहले स्टेशन पर नही पहुच सकते | तो सीट क्या खाक मिलेगी | दोस्तो खेत मे मजदूरी करने बाला मजदूर हमेशा मलिक से पहले पहुच जाता है
मेरा यह तर्क सुनकर आब तक मुझे सारे ही पागल करार से चुके थे | मेरा अगला तर्के था की सिर्फ आरक्षण विरोधी हो जाती प्रथा के विरोधी नही हो | जो लोग अपने नाम के साथ जाती का टैग लगा के घूमते है उनके विरोधी क्यो नही | सिर्फ जाती के नाम पर पण्डित को मंदिर का पुजारी बना दिया जाता है देश मे कितने लाखो मंदिर है सब मे एक जाती विशेष को आरक्षण | उसके विरोधी हो की नही | मेरा यह तर्क भी उनको नही भाया
आब मेरा अगला तर्क था | कि आप आपने बच्चो का दाखिला अच्छे स्कूल मे कराया की नही | लगभग सबने एक सुर मे कहा हा, और बड़े गर्व से बताने लगे कि हमने तो इतना पैसा डोनेशन मे दिया | बस यही में सुनना चाहता था| मैने तुरंत कहा तो यह डोनेशन भी एक तरह् का आरक्षण है | आपने एक गरीब बच्चे का हक मारा है| पैसे के बल पर आपने आरक्षण लिया है इसका भी विरोध करोगे | अब सब शांत हो चुके थे |
मैने कहा आप अपने बच्चे का दाखिला स्कूल मे कराने के लिये सिफारिश कराते हो, डोनेशन देते हो नौकरी मे भी सिफारिश कराते हो मोटा पैसा देते हो ताकि नौकरी मिल जाये | मॅनेज्मेंट कोटे का लाभ उठाते हो | फिर भी कहते हो की आरक्षण के विरोधी हो| पहले आरक्षण का मतलब समझो फिर सभी तरह् के आरक्षण का लाभ लेना छोडो फिर गाँधी का विरोध करो अंत मे आरक्षण का विरोध करो | हम भी आपके साथ होगे|
सबसे अच्छा सारी बातो को छोड़ दो अगर समाज में रोटी और बेटी का रिश्ता कायम करो आरक्षण का विरोध अपने आप करना बंद करो दोगे| तब यह बाला आरक्षण आपको भी मिलने लगेगा सोचो आपकी बेटी की शादी किसी दलित से होगी तो उसके बच्चो को इसका लाभ मिलेगा | आपके बेटे की शादी किसी दलित लड़की से होगी तो उसके बच्चो को भी आरक्षण का लाभ मिलने लगेगा| तब आरक्षण के मायने ही खत्म हो जायेगे
दोस्तो इन सब तर्क के बाद मेरा मूह बंद करने का आखिरी रास्ता ही उनके सामने था बह था अरे चुप जा …(मेरी जाती).. कही का बड़ा आया लेक्चर देने उसके बाद एक गाली

Tuesday, November 18, 2014

Mr. Muktesh Chander IPS

Mr. Muktesh Chander IPS
Mr. Muktesh Chander joined Indian Police Service in 1988 and has remained posted to several
places including DIG Goa and Addl. Commissioner of Police, Crime, and Traffic Delhi and IG
Daman Diu. He has served as Centre Director Cyber Division and National Critical Information
Infrastructure Protection Centre in NTRO under Prime Ministers’ Office. He was specially
selected as United Nation Police Observer and has monitored, trained and advised police in
Bosnia and Herzegovina in Europe for 1 year.
He has been awarded President’s Police Medal for meritorious service, President’s Police
Medal for distinguished service, Police Medal for Hard Duty, UN Service Medal and 50th
Anniversary of Independence Medal. He has written a number of articles on Cyber Crime and
related topics, which have been published in various prestigious journals and newspapers. He is
a resource person for premier institutes in India. He was member secretary of the Joint Working
Group which formulated “Guidelines for Protection of National Critical Information
Infrastructure”.
He graduated in Electronics and Telecommunication Engineering from Delhi University. Mr.
Muktesh Chander also holds a law degree from Delhi University, diploma in Human Resource
Management, Diploma in Cyber Laws and Masters Degree in Criminology & Forensic Science
and has submitted his Ph.D. thesis in Information Security Management to I.I.T., Delhi. He has
also done Hostage Negotiation course at Louisiana State Police Academy, USA and Law
Enforcement Executive Development Course with FBI, Los Angeles, USA.
Apart from this Mr. Muktesh Chander holds a license of Amateur Radio. He is also life member
of Amateur Radio Society of India. During his spare time he plays on flute and mouth organ and

listens to classical and semi classical music.