Saturday, October 8, 2016

रोगियों की समाज सेवा-हिंदी व्यंग्य कविता

रोगियों की समाज सेवा-हिंदी व्यंग्य कविता
समाज की हर बीमारी के इलाज का
दावा करते हैं वह लोग,
अस्पतालों के पीछे जाकर
छिपाते हैं जो अपने रोग।
कहें दीपक जिनकी देह
अपनी शक्ति से संभाली नहीं जाती
ज़माने भर की समस्याओं पर
उनकी ज्यादा ही नज़र जाती,
कोई चंदा कोई दान जुटा रहा,
उनके इलाज का बोझ भी समाज ने सहा,
लाचार इंसानों के जज़्बातों से
खेलना कितना आसान हो गया है
उसमें उम्मीदों का झूठा जोश जगा रहे
फरिश्ता बने कुछ लोग,
जिनके तन और मन
बेबस हो गये हैं करते हुए भोग।

गोल तोंद का राज

जाने है वो कौन नगरीया, आये जाये खत ना खबरीया,
आये जब जब उन की यादें, आये होठों पे फ़र्यादे,
जा के फिर ना आनेवाले, जाने चले जाते है कहाँ,
कैसे ढूँढे कोई उन को, नहीं कदमों के भी निशान,,,,
सभी महान पवित्र आत्माओ को कोट्टि कोट्टि नमन....
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गोल तोंद का राज :
कौन क्या-क्या खाता है ?
खान-पान की कृपा से, तोंद हो गई गोल,
रोगी खाते औषधी, लड्डू खाएँ किलोल।
लड्डू खाएँ किलोल, जपें खाने की माला,
ऊँची रिश्वत खाते, ऊँचे अफसर आला।
दादा टाइप छात्र, मास्टरों का सर खाते,
लेखक की रायल्टी, चतुर पब्लिशर खाते।
दर्प खाय इंसान को, खाय सर्प को मोर,
हवा जेल की खा रहे, कातिल-डाकू-चोर।
कातिल-डाकू-चोर, ब्लैक खाएँ भ्रष्टाजी,
बैंक-बौहरे-वणिक, ब्याज खाने में राजी।
दीन-दुखी-दुर्बल, बेचारे गम खाते हैं,
न्यायालय में बेईमान कसम खाते हैं।
सास खा रही बहू को, घास खा रही गाय,
चली बिलाई हज्ज को, नौ सौ चूहे खाय।
नौ सौ चूहे खाय, मार अपराधी खाएँ,
पिटते-पिटते कोतवाल की हा-हा खाएँ।
उत्पाती बच्चे, चच्चे के थप्पड़ खाते,
छेड़छाड़ में नकली मजनूँ, चप्पल खाते।
सूरदास जी मार्ग में, ठोकर-टक्कर खायं,
राजीव जी के सामने मंत्री चक्कर खायं।
मंत्री चक्कर खायं, टिकिट तिकड़म से लाएँ,
एलेक्शन में हार जायं तो मुँह की खाएँ।
जीजाजी खाते देखे साली की गाली,
पति के कान खा रही झगड़ालू घरवाली।
मंदिर जाकर भक्तगण खाते प्रभू प्रसाद,
चुगली खाकर आ रहा चुगलखोर को स्वाद।
चुगलखोर को स्वाद, देंय साहब परमीशन,
कंट्रैक्टर से इंजीनियर जी खायं कमीशन।
अनुभवहीन व्यक्ति दर-दर की ठोकर खाते,
बच्चों की फटकारें, बूढ़े होकर खाते।
दद्दा खाएँ दहेज में, दो नंबर के नोट,
पाखंडी मेवा चरें, पंडित चाटें होट।
पंडित चाटें होट, वोट खाते हैं नेता,
खायं मुनाफा उच्च, निच्च राशन विक्रेता।
काकी मैके गई, रेल में खाकर धक्का,
कक्का स्वयं बनाकर खाते कच्चा-पक्का।

नहीं चाहिए मुझको हिस्सा माँ-बाबा की दौलत में चाहे वो कुछ भी लिख जाएँ भैया मेरे ! वसीयत में

एक बहन भाई को क्या लिखती है-
नहीं चाहिए मुझको हिस्सा माँ-बाबा की दौलत में
चाहे वो कुछ भी लिख जाएँ भैया मेरे ! वसीयत में
नहीं चाहिए मुझको झुमका चूड़ी पायल और कंगन
नहीं चाहिए अपनेपन की कीमत पर बेगानापन
मुझको नश्वेर चीज़ों की दिल से कोई दरकार नहीं
संबंधों की कीमत पर कोई सुविधा स्वीकार नहीं
माँ के सारे गहने-कपड़े तुम भाभी को दे देना
बाबूजी का जो कुछ है सब ख़ुशी ख़ुशी तुम ले लेना
चाहे पूरे वर्ष कोई भी चिट्ठी-पत्री मत लिखना
मेरे स्नेह-निमंत्रण का भी चाहे मोल नहीं करना
नहीं भेजना तोहफे मुझको चाहे तीज-त्योहारों पर
पर थोडा-सा हक दे देना बाबुल के गलियारों पर
रूपया पैसा कुछ ना चाहूँ..बोले मेरी राखी है
आशीर्वाद मिले मैके से मुझको इतना काफी है
तोड़े से भी ना टूटे जो ये ऐसा मन -बंधन है
इस बंधन को सारी दुनिया कहती रक्षाबंधन है
तुम भी इस कच्चे धागे का मान ज़रा-सा रख लेना
कम से कम राखी के दिन बहना का रस्ता तक लेना..

अकल व्यंग्य

🙏जरूर पढ़े:एक व्यंग्य
अक्ल बाटने लगे विधाता, लंबी लगी कतारें
सभी आदमी खड़े हुए थे कहीं नहीं थी नारी ।
सभी नारियाँ कहाँ रह गई
था ये अचरज भारी।।
पता चला ब्यूटी पार्लर में पहुँच गई थी सारी ।
मेकअप की थी गहन प्रक्रिया एक एक पर भारी।।
बैठी थीं कुछ इंतजार में कब आएगी बारी।
उधर विधाता ने पुरूषों में अक्ल बाँट दी सारी।।
ब्यूटी पार्लर से फुर्सत पाकर जब पहुँची सब नारी।
बोर्ड लगा था स्टॉक ख़त्म है नहीं अक्ल अब बाकी।।
रोने लगी सभी महिलाएं नींद खुली ब्रह्भा की
पूछा कैसा शोर हो रहा है ब्रह्मलोक के द्वारे।
पता चला कि स्टॉक अक्ल का पुरुष ले गए सारे।।
ब्रह्मा जी ने कहा देवियों बहुत देर कर दी हैं।
जितनी भी थी अक्ल वो मैंने पुरुषों में भर दी हैं।।
लगी चीखने महिलाये सब कैसा न्याय तुम्हारा।
कुछ भी करो हमें तो चाहिए आधा भाग हमारा।।
पुरुषो में शारीरिक बल है हम ठहरी अबलाएं।
अक्ल हमारे लिए जरुरी निज रक्षा कर पाएं।।
सोच सोच कर दाढ़ी सहलाकर तब बोलर ब्रह्मा जी।
एक वरदान तुम्हे देता हूँ अब हो जाओ राजी।।
थोड़ी सी भी हँसी तुम्हारी रहे पुरुष पर भारी।
कितना भी वह अक्लमंद हो अक्ल जायेगी मारी।।
एक औरत ने तर्क दिया मुश्किल बहुत होती है।
हंसने से ज्यादा महिलाये जीवन भर रोती है।।
ब्रह्मा बोले यही कार्य तब रोना भी कर देगा।
औरत का रोना भी नर की अक्ल हर लेगा।।
एक अधेड़ बोली बाबा हंसना रोना नहीं आता।
झगड़े में है सिद्धहस्त हम खूब झगड़ना भाता।।
ब्रह्मा बोले चलो मान ली यह भी बात तुम्हारी।
झगडे के आगे भी नर की अक्ल जायेगी मारी।।
तब बुढियां तुनक उठीं सुन यह तो न्याय नहीं है।
हँसने रोने और झगड़ने की अब अपनी उम्र नहीं है।।
ब्रह्मा बोले सुनो ध्यान से अंतिम वचन हमारा।
तीन शस्त्र अब तुम्हे दे दिए पूरा न्याय हमारा।।
इन अचूक शस्त्रों में भी जो मानव नहीं फंसेगा।
निश्चित समझो, उस पागल का घर भी नहीं बसेगा।।
कहे जीत कविमित्र ध्यान से सुन लो बात हमारी।
बिना अक्ल के भी होती है नर पर नारी भारी।। 

सभी दोस्तों को सर्दी की शुभकामनांए

जाड़े की धूप
टमाटर का सूप
मूंगफली के दाने
छुट्टी के बहाने
तबीयत नरम
पकौड़े गरम
ठंडी हवा
मुँह से धुँआ
फटे हुए गाल
सर्दी से बेहाल
तन पर पड़े
ऊनी कपड़े
दुबले भी लगते
मोटे तगड़े
किटकिटाते दांत
ठिठुरते ये हाथ
जलता अलाव
हाथों का सिकाव
गुदगुदा बिछौना
रजाई में सोना
सुबह का होना
सपनो में खोना.
स्वागत है सर्दियों का आना
सभी दोस्तों को सर्दी की शुभकामनांए

मियां-बीबी दोनों मिल खूब कमाते हैं, तीस लाख का पैकेज दोनों ही पाते हैं

*** आधुनिक सच ***
मियां-बीबी दोनों मिल खूब कमाते हैं
तीस लाख का पैकेज दोनों ही पाते हैं
सुबह आठ बजे नौकरियों परजाते हैं
रात ग्यारह तक ही वापिस आते हैं
अपने परिवारिक रिश्तों से कतराते हैं
अकेले रह कर वह कैरियर बनाते हैं
कोई कुछ मांग न ले वो मुंह छुपाते हैं
भीड़ में रहकर भी अकेले रह जाते हैं
मोटे वेतन कीनौकरी छोड़ नहींपाते हैं
अपने नन्हे मुन्ने को पाल नहीं पाते हैं
फुल टाइम की मेड ऐजेंसी से लाते हैं
उसी के जिम्मे वो बच्चा छोड़ जाते हैं
परिवार को उनका बच्चा नहीं जानता है
केवल आया'आंटी' को ही पहचानता है
दादा -दादी ,नाना-नानी कौन होते है?
अनजान है सबसे किसी को न मानता है
आया ही नहलाती है आया ही खिलाती है
टिफिन भी रोज़ रोज़ आया ही बनाती है
यूनिफार्म पहनाके स्कूल कैब में बिठाती है
छुट्टी के बाद कैब से आया ही घर लाती है
नींद जब आती है तो आया ही सुलाती है
जैसी भी उसको आती है लोरी सुनाती है
उसे सुलाने में अक्सर वो भी सो जाती है
कभी जब मचलता है तो टीवी दिखाती है
जो टीचर मैम बताती है वही वो मानता है
देसी खाना छोड कर पीजा बर्गर खाता है
वीक ऐन्ड पर मौल में पिकनिक मनाता है
संडे की छुट्टी मौम-डैड के संग बिताता है
वक्त नहीं रुकता है तेजी से गुजर जाता है
वह स्कूल से निकल के कालेज मेंआता है
कान्वेन्ट में पढ़ने पर इंडिया कहाँ भाता है
आगे पढाई करने वह विदेश चला जाता है
वहाँ नये दोस्त बनते हैं उनमें रम जाता है
मां-बाप के पैसों से ही खर्चा चलाता है
धीरे-धीरे वहीं की संस्कृति में रंग जाता है
मौम डैड से रिश्ता पैसों का रह जाता है
कुछ दिन में उसे काम वहीं मिल जाता है
जीवन साथी शीघ्र ढूंढ वहीं बस जाता है
माँ बाप ने जो देखा ख्वाब वो टूटजाता है
बेटे के दिमाग में भी कैरियर रह जाता है
बुढ़ापे में माँ-बाप अब अकेले रह जाते हैं
जिनकी अनदेखी की उनसे आँखें चुराते हैं
क्यों इतना कमाया ये सोच के पछताते हैं
घुट घुट कर जीते हैं खुद से भी शरमाते हैं
हाथ पैर ढीले हो जाते,चलने में दुख पाते हैं
दाढ़- दाँत गिर जाते,मोटे चश्मे लग जाते हैं
कमर भी झुक जाती,कान नहीं सुन पाते हैं
वृद्धाश्रम में दाखिल हो,जिंदा ही मर जाते हैं
: सोचना की बच्चे अपने लिए पैदा कर रहे हो या विदेश की सेवा के लिए।
बेटा एडिलेड में,बेटी है न्यूयार्क।
ब्राईट बच्चों के लिए,हुआ बुढ़ापा डार्क।
बेटा डालर में बंधा, सात समन्दर पार।
चिता जलाने बाप की, गए पडौसी चार।
ऑन लाईन पर हो गए, सारे लाड़ दुलार।
दुनियां छोटी हो गई,रिश्ते हैं बीमार।
बूढ़ा-बूढ़ी आँख में,भरते खारा नीर।
हरिद्वार के घाट की,सिडनी में तकदीर।
तेरे डालर से भला,मेरा इक कलदार।
रूखी-सूखी में सुखी,अपना घर संसार।

Friday, October 7, 2016

*"प्राचीन स्वास्थ्य दोहावली"*

*"प्राचीन स्वास्थ्य दोहावली"*
पानी में गुड डालिए, बीत जाए जब रात!
सुबह छानकर पीजिए, अच्छे हों हालात!!
*धनिया की पत्ती मसल, बूंद नैन में डार!*
दुखती अँखियां ठीक हों, पल लागे दो-चार!!
*ऊर्जा मिलती है बहुत, पिएं गुनगुना नीर!*
कब्ज खतम हो पेट की, मिट जाए हर पीर!!
*प्रातः काल पानी पिएं, घूंट-घूंट कर आप!*
बस दो-तीन गिलास है, हर औषधि का बाप!!
*ठंडा पानी पियो मत, करता क्रूर प्रहार!*
करे हाजमे का सदा, ये तो बंटाढार!!
*भोजन करें धरती पर, अल्थी पल्थी मार!*
चबा-चबा कर खाइए, वैद्य न झांकें द्वार!!
*प्रातः काल फल रस लो, दुपहर लस्सी-छांस!*
सदा रात में दूध पी, सभी रोग का नाश!!
*प्रातः- दोपहर लीजिये, जब नियमित आहार!*
तीस मिनट की नींद लो, रोग न आवें द्वार!!
*भोजन करके रात में, घूमें कदम हजार!*
डाक्टर, ओझा, वैद्य का , लुट जाए व्यापार !!
*घूट-घूट पानी पियो, रह तनाव से दूर!*
एसिडिटी, या मोटापा, होवें चकनाचूर!!
*अर्थराइज या हार्निया, अपेंडिक्स का त्रास!*
पानी पीजै बैठकर, कभी न आवें पास!!
*रक्तचाप बढने लगे, तब मत सोचो भाय!*
सौगंध राम की खाइ के, तुरत छोड दो चाय!!
*सुबह खाइये कुवंर-सा, दुपहर यथा नरेश!*
भोजन लीजै रात में, जैसे रंक सुरेश!!
*देर रात तक जागना, रोगों का जंजाल!*
अपच,आंख के रोग सँग, तन भी रहे निढाल^^
*दर्द, घाव, फोडा, चुभन, सूजन, चोट पिराइ!*
बीस मिनट चुंबक धरौ, पिरवा जाइ हेराइ!!
*सत्तर रोगों कोे करे, चूना हमसे दूर!*
दूर करे ये बाझपन, सुस्ती अपच हुजूर!!
*भोजन करके जोहिए, केवल घंटा डेढ!*
पानी इसके बाद पी, ये औषधि का पेड!!
*अलसी, तिल, नारियल, घी सरसों का तेल!*
यही खाइए नहीं तो, हार्ट समझिए फेल!
*पहला स्थान सेंधा नमक, पहाड़ी नमक सु जान!*
श्वेत नमक है सागरी, ये है जहर समान!!
*अल्यूमिन के पात्र का, करता है जो उपयोग!*
आमंत्रित करता सदा, वह अडतालीस रोग!!
*फल या मीठा खाइके, तुरत न पीजै नीर!*
ये सब छोटी आंत में, बनते विषधर तीर!!
*चोकर खाने से सदा, बढती तन की शक्ति!*
गेहूँ मोटा पीसिए, दिल में बढे विरक्ति!!
*रोज मुलहठी चूसिए, कफ बाहर आ जाय!*
बने सुरीला कंठ भी, सबको लगत सुहाय!!
*भोजन करके खाइए, सौंफ, गुड, अजवान!*
पत्थर भी पच जायगा, जानै सकल जहान!!
*लौकी का रस पीजिए, चोकर युक्त पिसान!*
तुलसी, गुड, सेंधा नमक, हृदय रोग निदान!
*चैत्र माह में नीम की, पत्ती हर दिन खावे !*
ज्वर, डेंगू या मलेरिया, बारह मील भगावे !!
*सौ वर्षों तक वह जिए, लेते नाक से सांस!*
अल्पकाल जीवें, करें, मुंह से श्वासोच्छ्वास!!
*सितम, गर्म जल से कभी, करिये मत स्नान!*
घट जाता है आत्मबल, नैनन को नुकसान!!
*हृदय रोग से आपको, बचना है श्रीमान!*
सुरा, चाय या कोल्ड्रिंक, का मत करिए पान!!
*अगर नहावें गरम जल, तन-मन हो कमजोर!*
नयन ज्योति कमजोर हो, शक्ति घटे चहुंओर!!
*तुलसी का पत्ता करें, यदि हरदम उपयोग!*
मिट जाते हर उम्र में,तन में सारे रोग। 🌸
*कृपया इस जानकारी को जरूर आगे बढ़ाएं