Tuesday, January 3, 2017

रैगर समाज

अखिल भारतीय रैगर महासभा के झंडे तले जुड़े हम आप सभी का हार्दिक अभिनन्दन करते हैं. बंधुओं, हम सब सामाजिक कार्यकर्त्ता है. जिसे पद अनुरूप कार्य को सम्पादित करने का अवसर दिया गया है. दिल्ली प्रान्त में निवास कर रहे लाखों रैगरो के बीच से आपका चुनाव जहाँ आपको गौरवान्वित करता है वहीँ आपके ऊपर एक ऐसा दायित्व भी देता है जिसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता. अतः आपसे समाज को काफी अपेक्षाए हैं.
दुनिया का हर समाज स्वार्थी होता है. वह आपसे अनगिनत अपेक्षाय रखता है पर बदले में देने के लिए अनगिनत आरोप एवं लांछन होते हैं. उनके पास कुछ ही शब्द प्रशंसा के होते हैं, जिसे वह बहुत ही सोच-समझ कर मितव्ययिता के साथ खर्च करता है. प्रशंसा के शब्द दूध में बहुत ही अल्प मात्रा में स्थित मक्खन की तरह है. हम सबको दूध से मक्खन निकालने जैसा प्रयास करना होता है. आपको कठोरता से दूध को मथना है और बहुत ही नरमी के साथ मक्खन को निकालना है.
हमें विरासत में टूटा-फूटा और बहुत ही बेरहमी से कुचला हुआ, समाज / परिवार मिला है जिसे संभालना है, भरोसा देना है और उन्हें साथ लेना है. समय की मार से आत्मकेंद्रित होता हुआ समाज को पूर्ववत गरिमा की ओर मोड़ने में बहुत परिश्रम है. अपना घर संभालते हुए यह सब करना कठिन ही नहीं अत्यंत दुष्कर कार्य है. हमें संतोष है की इस विपरीत परिस्थिति में भी कुछ मेधावी भागीरथ मिले है, जिनके बल पर हम परस्पर विश्वास, सहयोग एवं एकता की गंगा बहा सकते हैं.
आप सामाजिक प्रदुषण को देख रहे हैं, समझ रहें हैं. अखिल भारतीय रैगर महासभा के बैनर को इतना गन्दा कर दिया गया है कि कई टन सोडा लगेगा इसकी सफाई के लिए. और आज भी ऐसा करने से बाज नहीं आ रहे हैं. समाज आँखे मूंदता है कुछ समय के लिए. पर जब आँखे खोलता है तो ऐसे लोग इस तरह भस्म होते हैं की राख भी नसीब नहीं होती. यह चीज हम पर भी लागू होती है. इसलिए हमें भी गलत कामों से बचना होगा. आपके मन में यह विचार भी आता होगा की क्यों मैं अपना समय, धन खर्च कर, एवं गालियाँ खाकर समाज का काम करूँ? आप जानते हैं कि हर काल में समाज पर यह संकट आया है पर समाज के अनाम लोगों ने ही उसका प्रतिकार भी किया. आप काम करेंगे और आपके काम से एक का भी भला हो गया तो आपको इतना आत्म संतोष मिलेगा कि उतना सौ तीर्थों के भ्रमण पर भी नहीं मिल सकता.
बंधुओं, आप विश्वास करें अध्यक्ष पद से लेकर कार्यकर्त्ता तक सभी पद समान है. कार्य की श्रेणीयां एवं उत्तरदायित्व अलग -अलग है, जिसे सबको गंभीरता से निभाना है. हम सब को मिल बांटकर अपने अपने हिस्से के कार्य करने है. हमारे साथ इस मुहीम में महिलाओं की प्रतिनिधि बहन पुष्पा सरसुनिया जी भी हैं, मै व्यक्तिगत रूप से इन पर गर्व करता हूँ. इनकी सूझ-बुझ, लगन एवं मेहनत हम सब पर भारी है. अभारैम में विगत सात वर्षों के अंतराल में अभी तक एक अकेली महिला हमें मिली हैं जिन्होंने मुझे काफी प्रभावित किया है. हमें इन्ही के सदृश अन्य महिलाओं को भी तलाशना है और समाज के सेवार्थ उठे इनके हाँथ को ताकत देनी है. महिलाओं की भागीदारी के बिना हमारा कार्य त्वरित गति और सही दिशा में आगे बढ़ ही नहीं सकता.
हमारा प्रयास है कि हम ऐसे लोगों को जोड़ें जो सही रूप से कार्य कर सकते हों. हमें निष्क्रिय लोगों को जोड़कर पदाधिकारियों की संख्या नहीं बढानी. हम ऐसे लोगों को जोड़ने में विश्वास करें जिन्हें हमें फोन कर कहना नहीं पड़े कि आप क्या कर रहें हैं? कहाँ हैं? बल्कि वे खुद फोन कर प्रगति की जानकारी दें. जो काम करेगा उसे समस्याए भी होंगी और उसके निराकरण के लिए प्रयास भी करेगा. काम नहीं करनेवाले के पास कुछ भी नहीं होगा कहने के लिए सिवाय अपनी समस्या गिनाने की.
अपने समाज में कुछ प्रगति हो रही है या नहीं पर एक चीज की प्रगति तो है और वह है नीत नयी रैगर संगठनो का गठन. हमारे समाज में कुछ सौ पचास लोग ऐसे है जो सभी संगठनो में प्रायः दिख जायेंगे. उनका किसी संगठन से कोई लेना देना नहीं. उनका काम है अपना पोर्टफोलियो बनाना. संगठन कर्ता को यह एहसास होता है की उनका संगठन तो काफी प्रभावी है. अमुक-अमुक बाबु उनके साथ हैं और दो चार दस लोगों के साथ लेकर चलते रहते है. दरअसल ऐसे लोग समाज की एकता में बहुत बड़ी बाधा हैं ऐसा मै मानता हूँ. दूसरी जातियों में इतने संगठन नहीं मिलेंगे. अभारैम की नयी निबंधित संविधान में एक देश, एक जाति, एक संगठन के मन्त्र को आत्मसात किया गया है. अतः मेरी अपनी सोच है कि हम किसी अन्य रैगर संगठन में सक्रिय रूप से भाग न लें जिससे उनके संगठन को मजबूती और हमें वही टहलने वाली प्रवृति का शिकार होना पड़े. हमारा संगठन इतना बड़ा है कि इसमे कई संगठन अपने को विलीन कर सकते हैं और हम इसे बढ़ावा देंगें.
मैं एक सज्जन से मिलने गया था तथाकथित बड़े नाम थे. सोचा, शायद उनका साथ मिल जाएगा तो हमारे संगठन को और ताकत मिल जाएगी. उन्होंने पूछा कि आपके साथ कौन-कौन बड़े आदमी हैं? मैंने कहा की बड़े आदमी कौन-कौन है? मुझे तो बड़े आदमी कोई दिखा नहीं है. तब उन्होंने कुछ बड़े आदमियों के नाम गिनाये और पूछा कि क्या वे आपके साथ हैं? मैं सच कहता हूँ कि जिन्हें मै जोड़ने गया था, उस सोच पर ही मै शर्मिंदा हो गया. मेरे भाइयों, आप सब जो यहाँ बैठे हुए हैं आपसे से बड़ा आदमी मेरी नजर में कोई और नहीं हो सकता. आप सब अपना काम छोड़कर, भाडा लगाकर अथवा अपनी गाडी का ईंधन खर्च कर समाज के काम के लिए यहाँ एकत्रित हुए हैं. आपकी शिक्षा, योग्यता, धन-वैभव क्या है, मैं नहीं जानता. पर एक चीज जान रहा हूँ- आप सबसे बड़े, सबसे धनवान और सबसे ज्यादा शिक्षित हैं, जो समाज सेवा के लिए निकले हैं. बड़े व्यापारी, बड़े पदाधिकारी, बड़े इंजिनियर, बड़े वकील, बड़े डॉक्टर, बड़े नेता न जाने कितने बड़े-बड़े. पर समाज निर्माण में कोई योगदान नहीं. बड़ा-बड़ा दंभ, बड़े बड़े अहंकार. बड़े लोगों की विकृत हो चुकी परिभाषा को फिर से परिभाषित करनी होगी. कैसे बनेगा समाज? सभी लोगों को समाज निर्माण के लिए प्रेरित करना भी हमारा लक्ष्य होगा.

हम सब पदाधिकारी रैगर समाज के सामने अच्छे काम करने, अखिल भारतीय रैगर महासभा के नाम को सार्थक करने, समाज को एकताबद्ध करने की शपथ ली है तो इसे कर दिखाना भी होगा. आशा है हम सब मिलकर अपनी एक अलग पहचान बनायेंगे. रैगर समाज को सतत सुदृढ़ करने का कार्य करेंगे.

दयालुता

संसार के प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई ऐसी वस्तु रहती है जिसे देकर वह दूसरे का उपकार कर सकता है। अन्न, वस्त्र, धन, विद्या आदि जिसके पास जो वस्तु अधिक है वह अभाव ग्रस्त व्यक्ति को कृपा पूर्वक देकर उसकी कठिनाइयों, कष्टों और दुःखों में सहयोग कर सकता है। अपने पास जो कुछ है वह दूसरे की सुख-सुविधा में बिना किसी विनिमय भावना से लगा देना यही उदारता है। मनुष्य के बड़ा होने, उत्कृष्ट होने का यही प्रमाण है।
‘जो कुछ है सो मेरे लिए’ यह पशु-प्रवृत्ति है। जानवर अपनी घास किसी को खाते देख लें तो मरने मारने पर उतारू हो जाय बहुत शहद इकट्ठा कर लेती हैं पर माँगने पर मधुमक्खी उसका एक कण भी नहीं दे सकती कुत्ते को सबसे बड़ा डर अपने सजातियों से ही रहता है।
कितनी ही परिश्रम की कमाई हो हर छोटे कुत्ते का टुकड़ा बड़ा वाला दबोच कर छीन लेता है यह पशु-प्रवृत्तियाँ हैं ‘अपना दो मत दूसरों का छीन लो’ यह पाशविक वृत्ति जहाँ भी रहेगी वहीं कलह क्लेश कटुता का नारकीय वातावरण बना रहेगा।
मनुष्य की स्थिति इससे भिन्न है। उसने बहुत कुछ पाया है पर तब जब उसने बहुत कुछ दिया है। आज हमें जितनी सुख-सुविधायें उपलब्ध हैं वह सब उदारता पूर्वक आदान-प्रदान के कारण ही विकसित हुई हैं। गुरु को अन्न वस्त्र देते हैं बदले में वे विद्या देते हैं। इसमें गुरु शिष्य दोनों की उदारता है। जहाँ एक सी उदारता है, वहाँ संतोष, स्नेह, आत्मीयता का स्वर्गीय सुख भी है। पिता कमाता है उस कमाई के शतांश से भी कम का उपयोग अपने शरीर के हित में करता है शेष अपनी धर्म पत्नी, बच्ची, बच्चों, भाइयों-भतीजों को दे डालता है जहाँ यह उदारता है वहाँ परस्पर प्रेम होता है, दया होती है, विनम्रता होती है। सौजन्यता, सफलता और समृद्धियाँ भी होती हैं।
मनुष्य देने के स्वभाव से ही बड़ा है यह तो कोई कह ही नहीं सकता कि मेरे पास देने को कुछ नहीं है। जो धन, विद्या, अन्न आदि नहीं दे सकते, वे प्रेम-स्नेह दया, परोपकार, सन्मार्ग की प्रेरणा, बुराइयों से बचाने के सर्वोत्कृष्ट दान देकर अपनी उदारता व्यक्त कर सकते हैं। इससे समाज का जो हित होगा वह किसी उदारता पूर्वक दी गई भौतिक वस्तु से अधिक मूल्यवान होगा।
काम जितना ही बड़ा हो, यदि वह केवल अपने अभिमान की रक्षा अथवा दिखावे के लिये ही किया जा रहा है उसमें उदारता का कोई स्थान नहीं तो उससे कोई लाभ नहीं। इससे आत्म संतोष नहीं मिल सकता जबकि उदारता पूर्वक दिया हुआ छोटा बड़ा जो कुछ भी हो उतना ही फलदायी होता है और उससे बड़ा आत्म-सुख मिलता है। काम की बड़ाई उसके आकार पर नहीं व्यक्ति की विशालता से संयुक्त होती है तो उसमें दिव्यता के दर्शन होते हैं। वह बुराई करने वालों की भी भलाई करता है। निन्दा करने वालों में भी गुण देखता है। घृणा द्वेष और हिंसा न करते हुए दया करुणा, स्नेह और सम्मान देता हुआ अपनी दैवी-सम्पदा का विकास करता है। समाज में सम्पन्नताओं का विकास इसी तरह हुआ है और व्यक्ति में उत्कृष्टता व अभिवर्द्धन इसी तरह होता है।
अनुदार व्यक्तियों को उनका आसुरी अन्तःकरण ही असंतुष्ट रखता है जबकि उदार मति वाले मानवता के दिव्य दर्शन का आनन्द प्राप्त करते हैं। जिसमें उदारता अपने लिए किसी वस्तु की इच्छा नहीं रखता वरन् सब पदार्थों में और सब के ऊपर परमात्मा की दया और करुणा देखने की उत्कंठित रहता है। यह सरलता, सज्जनता और मनोवाँछित धर्म अपने आप में इतना मधुर और बड़ा सुख हैं कि उसकी क्षणिक अनुभूति जिसे हो जाती है वह बार-बार उसी की ओर भागता है। अपना सर्वस्व विश्वात्मा के उद्धार और विकास में लगा देने के लिए तत्पर होता है। वह किसी व्यक्ति से ईर्ष्या नहीं करता क्योंकि वह जानता है कि सब चीजें परमात्मा से ओत-प्रोत हैं । वह अच्छे कार्यों का कर्त्ताः व्यक्ति को नहीं परमात्मा को मानता है जहाँ से वे मूलतः विकसित होती है इससे वह द्वन्द्व रहित निर्मल और शान्त अन्तःकरण की आनन्द विभूति प्राप्त करता है। जिन्हें सच्ची उदारता का ज्ञान हो गया वे अनुभव करते हैं कि सब पार्थिव वस्तुएँ असार हैं। आध्यात्मिकता इसीलिए हमें उदारता का सबक पहले सिखाती है।
दी हुई वस्तु का मोल माँगना पड़ता है पर जो वस्तु बिना किसी प्राप्ति-भावना से केवल औरों के कल्याणार्थ दे दी जाती है उसका मूल्य माँगना नहीं पड़ता । इसे चाहे ईश्वर विश्वास कहें अथवा विश्व की अन्तर्व्यथा दान करने वाला, उदारता पूर्वक अपनी शक्तियों को परोपकार में खर्चने वाला उससे भी अधिक पा लेता है। यदि वह स्थूल रूप से न भी दिखाई दे तो भी सामाजिक जीवन में जो सच्चा आदर सम्मान, विश्वास, सहानुभूति और आत्मीयता उसे मिलती है वह किसी प्रत्यक्ष लाभ से कम नहीं होती। शर्त केवल इतनी ही है कि अनुचित कामना पूर्ति के रूप में उदारता का प्रदर्शन न किया गया हो। प्रदर्शन की उदारता उदारता नहीं रह जाती वह व्यवसाय बन जाता है और उसकी प्रतिष्ठा जाती रहती है।
फूल सब की प्रियता का पात्र है। सब उसे स्नेह करते हैं क्योंकि वह अपनी सुवास का कोई मूल्य नहीं माँगता पर मधुमक्खी से उतना मीठा मधुर पाकर भी उसे कोई नहीं सराहता क्योंकि वह उदारता पूर्वक नहीं देती। देने की भावना अकाम हो तो वह कर्ता को अपने आप ही विकसित होने योग्य परिस्थितियाँ प्रदान कर देती हैं।
उदारता का सच्चा स्वरूप वह है जो हमें अपने कुटुम्ब में देखने को मिलता है। परिश्रम कुछ थोड़े से लोग करते हैं पर उसका लाभ बहुत से लोग उठाते हैं। प्रत्यक्ष में इसमें परिश्रम कर्त्ताः को हानि दिखाई देती है पर अपने परिजनों की श्रद्धा, आत्मीयता, प्रेम और स्नेह का उसे जो भावनात्मक प्रतिफल मिलता है वह भौतिक भोग से कहीं अधिक सुखदायी होता है। मनुष्य इसीलिए तो जीता है कि लोग उसे अधिक से अधिक प्रेम करें। अच्छा आदमी कहें, प्रशंसा करें और जब कभी आवश्यकता पड़े तो सच्ची सहानुभूति व्यक्त करें।
सामाजिक जीवन में भी ऐसी चाह स्वाभाविक है। वह आदान-प्रदान के ही नियम से मिलती है। समाज और संसार भी एक प्रकार का कुटुम्ब ही है। इससे उसमें अधिक सदस्य हैं इसलिए वहाँ आत्मविकास की परिस्थितियाँ भी बहुत अधिक होती हैं। समाज में जो भी विद्या-बुद्धि धन साधनों की दृष्टि से गये गुजरे हैं उनकी सहायता करके हम अधिक प्रेम और आत्मीयता का सुख अर्जित कर सकते हैं।
हम भारतीयों की विशिष्टता इसी बात में रही हैं कि हमने सारे संसार को एक कुटुम्ब माना है। और समान रूप से जन-सेवा और सहयोग के कर्तव्य का पालन बिना किसी मूल्य प्राप्ति की भावना से किया है। इसीलिए गई गुजरी परिस्थितियों में भी हमारी उत्कृष्टता बनी रही है। हमारे पुरखों का स्वभाव ही था- दीन-दुखियों और अभाव ग्रस्तों को कुछ देकर उन्हें ऊँचे उठाना। इन परिस्थितियों ने ही इस देश को विशालता के एक सूत्र में बाँधा है। अब तो उसके लिए परिस्थितियाँ भी और अधिक अनुकूल हैं। सही अर्थों में यह युग सेवा और उदारता का युग है इस युग में मनुष्य को धन साधनों का दान देने की आवश्यकता नहीं, लोगों को प्रेम और आत्मीयता का, स्नेह और सौजन्यता का दान देने की जरूरत हैं ताकि अविकसित मानवता का क्रम पुनः स्वर्गीय परिस्थितियों की ओर मुड़ चले और पीड़ित लोगों को भी आत्म-विकास का समुचित वातावरण मिल सके।
यह उदारता मनुष्य में विकसित हो तो इस युग की बुराइयों का अन्त हो और उत्कृष्टता का विकास। हमें ऊपर उठने की चाह है। हम मानवीय उत्कृष्टता को सिद्ध करना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले उदार बनना चाहिए। अपनी साधन सम्पत्ति का एक अंश समाज को भी देने के लिए तत्पर होना चाहिए।

Monday, January 2, 2017

साधना

मरण शैया पर पड़े हुए पिता ने अपने पुत्र की ओर कातर दृष्टि से देखा। बैजू ने कहा-तात मैं आपकी जीते जी तो कोई विशेष सेवा नहीं कर पाया बताइए अब क्या आदेश है?”
बेटा! मुझे इस समय अपनी एक ही इच्छा कचोट रही है। अपने संगीत दर्प से तानसेन ने मुझे बड़ा अपमानित किया था और मैं उसका बदला नहीं ले सका।यह कहकर बैजू के पिता ने दम तोड़ दिया।
बदला मैं लूँगा-निश्चय कर उसने अपने पिता की मृत देह की अन्त्येष्टि क्रिया सम्पन्न करा दी। श्मशान में भी अपने पिता की राख को हाथ में लेकर उसने कसम खाई कि में बदला लेकर रहूँगा।
रात का घना अन्धकार था। तानसेन के महल की चहार दीवारी फाँद कर बैजू अन्दर घुस गया। हाथ में परशु की तेजधार, अँधेरे में भी चमक रही थी। वह तानसेन के शयन कक्ष की ओर बढ़ा। दरवाजे की झिरझिरी से झाँक कर देखा। सब लोग निद्रा मग्न थे तानसेन देवी सरस्वती की प्रतिभा के आगे बैठा कुछ पढ़ रहा था।
सरस्वती की शान्त और वरद्हस्त उठाए प्रतिमा को देख कर बैजू के हृदय में विचार मन्थन होने लगा। अन्तः करण में स्फुरणाएं उठने लगीं-प्रतिरोध ऐसा प्रतिशोध, किस काम का जिसमें अपना और भी पतन हो। माना कि तानसेन तो संगीत दर्प में पिताजी को अपमानित कर बैठा तो क्या मैं भी अपने बल और छल के दर्प में उसे मारकर उसका बदला लू क्या प्रतिशोध का दूसरा मार्ग नहीं है? हो सकता है? ऐसा ही प्रतिशोध मुझे नहीं लेना। देवी माँ मुझे सद्बुद्धि दे।और वह बिना प्रतिशोध लिए ही घर लौट आया। वस्तुतः ऐसे प्रतिशोध से क्या लाभ जो मनुष्य को दानवी-प्रवृत्तियों में लगा दे।-
बैजू ने घर आते-आते रास्ते में संगीत साधना का निश्चय किया और अपनी साधना तथा सिद्धि की प्रखरता के आधार पर तानसेन को परास्त कर प्रतिशोध लेने का विचार किया। वीणा और वाद्य यन्त्र लेकर देवी सरस्वती के सम्मुख बैठा बैजू अहर्निश संगीत साधना में लगा रहने लगा।
संगीत के स्वरों में झंकृत वीणा के साथ-साथ उसकी हृदय तंत्री भी बजने लगी और बैजू के गीतों का आराध्य सर्व नियामक परमात्मा हो गया। अपनी साधन तन्मयता में वह खाने पीने की सुध तक भूल जाता। लोगों ने उसे बावरा कह कर सम्बोधित करना शुरू कर दिया। उसके गीतों और स्वरों को जो भी सुनता, ईश्वर भक्ति की तरंगें मन में उठने लगती।
बैजूबावरा की ख्याति फैलने लगी। होते-होते सम्राट अकबर तक उसकी प्रशंसा पहुँची। अकबर की दृष्टि से तो तानसेन के समान और कोई गायक ही नहीं था परन्तु जब सुना कि बैजू बावरा भी बहुत अच्छा गाता है तो स्वाभाविक ही उसका जी भी गायन सुनने के लिए मचल उठा।

अकबर ने दूत को भेजा बैजू बावरा को दरबार में उपस्थित होने के लिए। परन्तु दूत अकेला ही लौट आया और बोला-महाराज आपको गीत सुनना है तो उसकी झोंपड़ी पर जाए
दरबारियों समेत राजा बैजू बावरा की झोंपड़ी पर पहुँचे और बैजू ने अपनी स्वर लहरी छोड़ी। सब मंत्रमुग्ध हो उठे। तानसेन ने अपनी पराजय को अब प्रत्यक्षतः स्वीकार कर लिया- जहाँपनाह मैं आपको खुश करने के लिए गाता हूँ और बैजू ईश्वर को खुश करने के लिए। ईश्वर की तुलना में आपकी सत्ता की संगति कहाँ बैठेगी। जो अन्तर ईश्वर और आपमें है वही अन्तर बैजू और मुझमें है।

ईश्वर भक्ति के प्रसार स्वरूप बैजू के मन से प्रतिशोध या विकार की भावना नष्ट हो चुकी थी। उसे ध्यान भी नहीं था कि मुझे तानसेन को पराजित करना थाफिर भी उसका प्रतिरोध-सही अर्थों में पूरा हो चुका था। क्योंकि तानसेन का संगीत दर्प टूट गया।

नैतिकता

नैतिकता वह जीवन-व्यवस्था है जिसके सहारे मानव मन्दिर का सफल निर्माण होता है। नैतिक शक्ति मानव जीवन के विकास की जड़ है नैतिक जीवन जितना बलवान और पवित्र होगा, उसी परिमाण में व्यक्ति का विकास होता है। नैतिक निर्बलता व्यक्ति के विकास के लिए सबसे बड़ा अड़ंगा है। समाज या राष्ट्र व्यक्तियों की नैतिक शक्ति पर ही पनपता है, अतः जिस देश के व्यक्तियों का नैतिक स्तर गिर जाता है वह देश निर्बल हो जाता है। आज भारत में चारों ओर नैतिक शक्ति की गिरावट का स्पष्ट दर्शन होता है। देश में और देश के नेतृत्व में यदि सर्वव्यापी चिन्ता का कोई विषय है, तो वह है, आज के भारत की सर्वव्यापी नैतिक गिरावट। जीवन के समस्त क्षेत्रों में चाहे वह राजनैतिक हो, सामाजिक हो, आर्थिक हो, धार्मिक हो अथवा शैक्षणिक हो, सबमें नैतिक स्तर गिरा हुआ है। दूसरा यह अर्थ नहीं कि देश के हर व्यक्ति का नैतिक स्तर गिरा है और समान रूप में गिरा है। आज भी देश में ऐसे व्यक्ति भी हैं, जिनका नैतिक स्तर खूब ऊँचा है और यत्किंचित् भी उसमें कमी नहीं है। दूसरा वर्ग यह है, जिसमें नैतिक स्तर के गिरावट की-सीमा कुछ सीमित है और समाज में ऐसे लोग भी हैं, जिनका नैतिक स्तर बिलकुल गिरा हुआ है। राष्ट्र में उच्च स्तर के व्यक्तियों के होते हुए भी राष्ट्रीय स्तर इसलिए गिरा हुआ है। बहुजन की स्थिति पर ही राष्ट्र की स्थिति निर्भर रहती है और इसीलिए आज सम्पूर्ण देश में नैतिक पतन का दृश्य दिखाई दे रहा है। ऐसी स्थिति में यदि देश को फिर ऊँचा उठाना है, सभ्य समाज का महान् चट्टान पर नव-निर्माण करना है तो नैतिक शक्ति की बुनियाद पर ही ऐसा हो सकेगा। देश की सबसे प्रमुख समस्या नैतिक समस्या है। उसका निर्धारण हर व्यक्ति की नैतिक शक्ति जगाने से ही संभव है। अब हमें यह देखना है कि नैतिक शक्ति क्या है, उसे किस प्रकार जगाया जा सकता है और उसे किस तरह परिणामी बनाया जा सकता है। स्वस्थ मानव का नव-निर्माण ही नैतिकता का अंतिम उद्देश्य है।
विश्व में जीवन-निर्माण के साथ जीवित रहने की भावना का निर्माण हुआ। पशु-पक्षियों में यह भावना जीवन-व्यापी है। मानव के जीवन में इस भावना शक्ति के साथ विचार-शक्ति ने जन्म लिया। मानव की बाल्यावस्था भावनामय अवस्था है। इसके बाद विचार-शक्ति का जन्म होता है और विचार-शक्ति का ही उन्नत स्वरूप विवेक शक्ति है। मनुष्य में विवेक शक्ति जितनी बलवान होगी उतना ही उसका नैतिक स्तर ऊँचा और प्रभावशाली होगा। विवेक मानव-जीवन की निर्णयात्मक सर्वश्रेष्ठ शक्ति है। कौन सा कार्य उचित है और कौन सा अनुचित इसका निर्णय यही विवेक शक्ति करती है। यह शक्ति फिर विचारों से टकराती है और यदि विचार निम्न श्रेणी के हों तो विवेक न्याय-अन्याय का दर्शन करते हुए भी निर्बल रह जाता है और मनुष्य अन्याय मार्ग से कार्य करता रहता है उदाहरण के लिए मनुष्य को कई प्रकार के व्यसन रहते हैं विवेक कहता है कि व्यसन खराब हैं हानिकारक है पर व्यसन-शक्ति बलवान रहती है। फलतः मनुष्य व्यसनों को त्याग नहीं सकता। दुनिया की किसी वस्तु को अनाधिकार ले लेना, यह अनुचित विचार है। विवेक कहता है कि यह अनुचित कार्य है पर उसकी आवाज निर्बल रहती है और मनुष्य अन्याय को जानते हुए भी जीवन में उसका अवलम्ब करता है। सारांश मनुष्य की विवेक शक्ति जितनी प्रभावी होगी, उतना ही व्यक्ति का नैतिक बल भी प्रभावी होगा। अतः समाज के स्वस्थ नव-निर्माण के लिए सर्वप्रथम इस बात की आवश्यकता है कि मनुष्य की विवेक बुद्धि इतनी बलवान और जाग्रत हो कि वह अनुचित कार्य के मोह में न फँसे और जो न्याय दिखाई दे, उसी मार्ग पर जीवन को निश्चय के साथ अग्रसर कर सके।
नैतिक शक्ति का मूल स्रोत यद्यपि मानव की अंतस्थ विवेक शक्ति में है, पर यह अंतस्थ शक्ति बाह्य स्थिति से प्रभावित हुआ करती है और बाह्य शक्तियाँ इस अंतस्थ शक्ति को अपने अनुरूप ढालने का प्रयत्न किया करती हैं। ये बाह्य शक्तियाँ हैं-मानव-समाज की सामयिक स्थिति और व्यवस्था।
समस्त मानव-समाज का यदि अवलोकन किया जाय तो वहाँ नैतिकता मानव-व्यापी दिखाई देगी। इस दृष्टि से नैतिकता ही मानव-समाज की सर्वश्रेष्ठ शक्ति है और इसकी बुनियाद पर ही नव-मानव का एवं नये युग का निर्माण होना संभव हो सकता है। नैतिकता यदि विवेक पर आधारित विश्वव्यापी बनेगी तो वह आत्मशक्ति प्रेरित नैतिकता होगी। उस नैतिकता में निर्भयता रहेगी। वहाँ आत्मप्रेरणा का स्रोत रहेगा और मानव को अपनी जीवनी शक्ति का एक नया अनुभव आयेगा। आज इस प्रकार की विश्वव्यापी नैतिकता की माँग संसार में बढ़ रही है और यद्यपि सर्वत्र राज्य-सत्ता और संकुचित धर्मसत्ता की प्रबलता दिखाई देती है पर इसमें कोई संदेह नहीं कि आने वाला युग नैतिकता और विज्ञान शक्ति का युग होगा।
नैतिकता के क्षेत्र में दो बातों का स्पष्ट दर्शन होना चाहिए-(1) अपने मानवीय अधिकारों के रक्षण की सामर्थ्य और (2) हर कार्य में निर्भय-वृत्ति समाज में व्यक्ति के सुखों का और सामाजिक सुखों का समन्वय आवश्यक है। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के सुख भिन्न-भिन्न होते हैं और जिनके पास अधिक शक्ति है, वे निर्बलों का शोषण करते हैं। निर्बल व्यक्ति शोषण को सहन करता है और जीवित रहता है, यह मानसिक अवस्था नीति युक्त नहीं। नीति का दर्शन वहाँ होगा, जहाँ व्यक्ति अपने सिद्धान्तों एवं अधिकारों की रक्षा करने में समर्थ होगा और उसके लिए अपनी सारी शक्ति लगा देगा यहाँ तक कि जीवन-समर्पण तक के लिए तत्पर रहेगा, तभी नैतिकता का सही अवलंब व्यक्ति के जीवन में दिखाई देगा। नैतिकता में अपने अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ दूसरों के अधिकारों की रक्षा का भी समावेश होता है। शक्तिशाली मनुष्य अपने अधिकारों की तो रक्षा करता है पर वह निर्बलों का शोषण कर उनके अधिकारों पर आक्रमण करता है। सभ्य नीतिवान व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकता। अपने अधिकारों की रक्षा और अन्यों के अधिकारों का आदर उसका जीवन-लक्ष्य रहेगा। इस लक्ष्य से ही व्यक्ति और समाज के सुखों का समन्वय होकर शान्तिमय कल्याणप्रद समाज-व्यवस्था स्थापित होगी।
नैतिकता का दूसरा लक्षण है। निर्भयता। धर्म और राजसत्ता से प्रभावित नैतिकता भय प्रेरित हुआ करती है। किन्तु स्व प्रेरित नैतिकता पूर्णतः निर्भय होती है और वही स्थायी एवं सच्ची नैतिकता कहलाती है। भययुक्त नैतिकता की आड़ में मनुष्य छिपकर अनुचित कार्य करता है और छिपाने का प्रयत्न करता है। अनुचित कार्य करने पर वह व्यक्ति असत्य का आश्रय लेता है और जब सारा समाज असत्य की बुनियाद पर नीतिवान बनने का दावा करता है तब अनीति सर्वव्यापी बन जाती हे और समाज निःस्वत्व बन जाता है। स्व प्रेरित नीतिवान व्यक्ति प्रथमतः अनुचित कार्य करेगा ही नहीं पर किसी स्थिति में कर भी डाले तो उसे वह निर्भयता से स्वीकार कर लेता है। ऐसा करना यद्यपि समाज की दृष्टि से उचित न हो पर नीति की दृष्टि से अनुचित नहीं होगा। कोई व्यक्ति भावना वश या अन्याय के प्रतिकार में किसी का खून कर डालता है पर उसकी विवेक शक्ति इतनी बलवान होती है कि वह थाने में जाकर अपने अपराध को स्वीकार करता है। शासन और धर्म के नाते भले ही उसका कार्य अनुचित हो परन्तु यदि वह निर्भयता से उसे स्वीकार करता है, तो वह व्यक्ति नीतिवान ही कहा जायेगा।
निर्भयता का दर्शन मानव-जीवन की आकांक्षाओं की पूर्ति में भी होता है और वह है कार्य की सफलता के लिए उचित साधनों का प्रयोग। नैतिकता के क्षेत्र में साध्य की अपेक्षा साधनों की शुचिता का अधिक महत्त्व होता है। नीतिवान व्यक्ति उचित या न्याय पूर्ण साधनों का ही अवलंब करता है। किसी वस्तु को प्राप्त करने के लिए वह अनुचित साधन का उपयोग नहीं करता है। ऐसी हालत में उसे निर्भय वृत्ति का परिचय देना ही पड़ता है। अनुचित साधनों का प्रयोग निर्भयता के साथ प्रायः नहीं किया जाता। अतः निर्भयता जीवन के कार्य क्षेत्र में बहुत बड़ी शक्ति है और वह शक्ति को जीवन के हर क्षेत्र में नीतिमय बनाये रखने में सहायक होती है।
मानव जीवन में अनेक गुणात्मक शक्तियाँ होती हैं। यथा-सत्य अहिंसा, अक्रोध आदि। इन सारी शक्तियों की जड़ भी निर्भयता में है। जिस शक्ति के जीवन में भय है वह दृढ़ता पूर्वक सदा सत्य का पालन नहीं कर सकता। न वह अहिंसा का उपासक हो सकता है और न क्रोध को ही वश में रख सकता है।
सन्मार्ग के अवलम्बन के लिए अनेक गुणों के समन्वय की आवश्यकता है। जीवन की पवित्रता और जीवन की श्रेष्ठता सन्मार्ग पर अवलंबित है। व्यक्ति और समाज दोनों की महानता व्यक्ति के गुण समन्वय पर आधारित हैं। सारे सद्गुणों की शक्ति का स्रोत निर्भयता है। निर्भयता में से ही अनेक गुणों का प्रवाह स्रावित होता है, जो जीवन-सरिता को सर्वत्र सन्मार्ग में प्रवाहित करता रहता है। देश की आज सर्वाधिक आवश्यकता जीवन के सर्वव्यापी क्षेत्र में सही मार्ग का अवलम्ब, उसका निर्भयता के साथ पालन एवं जीवन की सर्वव्यापी ऊँचाई की है। इसी में व्यक्ति के जीवन एवं समाज के विकास तथा शान्तिमय सह-अस्तित्व की सफलता है।
एक दिन इन्द्र और इन्द्राणी विमान में बैठकर पर्यटन को निकले, उनका विमान भूलोक के जिस नगर के पास रुका वह बड़ा अभावग्रस्त था। वहाँ के निवासी बड़ी दीन-हीन स्थिति में गुजर करते थे। अधिकतर लोगों का भाग्य पर विश्वास था। पूर्वजों के द्वारा पुरुषार्थ से कमा-कमा कर जो धन संचित किया गया था। उसे उनकी सन्तानें खर्च करने में जुटी हुई थी।
उनकी स्थिति देख कर इन्द्राणी को दया आ गई वे बोलीं “प्राणेश्वर! आपका हृदय भी कितना निर्मम है जो ऐसे दुखी व्यक्तियों को देखकर भी नहीं पसीजता।’
‘यह व्यक्ति भाग्यवादी और असन्तोषी हैं मुझे तो ऐसा लगता है कि इनकी स्थिति में कोई परिवर्तन होगा नहीं पर तुम्हारी इच्छा है, तो कुछ प्रयत्न करता हूँ। ‘इन्द्र ने इतना कह कर उस नगर के पास एक सोने की खान बना दी। जिसने भी सुना कुदाली और टोकरी लेकर चल पड़ा सोने की खुदाई करने। अब उस नगर में कोई निर्धन नहीं रह गया था सब की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो गई थी सब धनी बन गये थे।
फिर भी सन्तुष्ट न थे। इन्द्र के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना तो दूर रहा उल्टे उसे अन्यायी और निर्दयी ही ठहराया जा रहा था। लोग कह रहे थे-इन्द्र तुम जैसा निर्दयी और बना दिया। अब तुम्हीं बताओ हमारे इस बड़प्पन का प्रभाव किस पर पड़ेगा?
इन्द्र ने इन्द्राणी से कहा-प्रिय मृत्यु लोक के इस अज्ञानी मनुष्य की स्थिति देख ली तुमने! कितना असन्तोषी है? कितना अविवेकी है?

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'ट्रिपल एक्स' ने देश के युवाओं को बिगाड़कर रख दिया, खासकर गांव वाले अशिक्षित वर्ग के युवाओं,
जो भूल जाते हैं कि रियल और रील जिन्दगी में क्या फर्क है। उनको दोनों ही एक जैसी नजर आती हैं खासकर ट्रिपल एक्स रील और रियल लाईफ। मगर मेरे देश को बर्बाद करने में ट्रिपल एक्स से ज्यादा योगदान 'ट्रिपल पी' का है, जिस दिन इस ट्रिपल पी में सुधार हो गया, उस दिन देश अन्य देशों के लिए प्रेरणास्रोत बनकर उभरेगा।

आप सोच रहें होंगे कि ट्रिपल एक्स तो समझ में आ रहा है, लेकिन ये मूर्ख ट्रिपल पी कहां से लेकर आए। मगर सच कहता हूं ट्रिपल एक्स में तो नहीं ट्रिपल पी में तो मैं भी आता हूं और आप भी। हां, अगर आप ट्रिपल एक्स का पूरा नाम ढूंढने जाओगे तो नहीं मिलेगा, मगर मेरे ट्रिपल पी का पूरा नाम है पुलिस पब्लिक और प्रेस।

जिस दिन इन तीनों ने अपनी जिम्मेदारियां ईमानदारी से निभानी शुरू कर दी, उस दिन भारत को बदलने से कोई नहीं रोक सकेगा, भारत का ही नहीं हर देश का भविष्य ट्रिपल पी पर ही टिका है। जनसेवा के लिए बनी पुलिस अगर असल में ही जनसेवा करने लगे, और जनता की आवाज बुलंद करने के लिए बनी प्रेस उसकी आवाज को दबने से रोक पाए और पब्लिक एक सही सरकार चुन सके तो वो दिन दूर न होंगे। जब भारत फिर से सोने की चिड़िया कहलाएगा।

देश का बेड़ा गर्क करने में बिगड़ चुकी ट्रिपल पी का बहुत बड़ा दु-योगदान है। आज की प्रेस पैसे वाले की हो गई, इसलिए तो जनमत तैयार करने वाली प्रेस लोगों को भ्रमित करने के लिए अलावा कुछ नहीं करती। सनसनी फैलानी हो, किसी को स्टार बनाना हो, वोट बैंक तैयार करना हो तो आज की प्रेस सबसे अच्छा साधन है, लेकिन बुराइयों के खिलाफ जनमत नहीं बना सकती, पैसे वालों के हाथ की कठपुतली बन चुकी ये प्रेस।

जन सेवा के लिए बनी पुलिस धनवानों के दरवाजे पर गाढ़े हुए खूंटे पर कुत्ते की तरह पहरा देती है, और गली से निकले वाले गरीबों पर भौंकती है, इतना ही नहीं कभी कभी तो नोंचने से भी बाज नहीं आती।
पैसों की लालसा में अंधी हुई पुलिस गरीब को ऐसे लेती है कि जैसे कुत्ता हड्डी को।

पब्लिक तो हमेशा की तरह मौन ही है, और पता नहीं कब इस का मौन टूटेगा। कब अपने वोट का सही इस्तेमाल कर पाएगी। कुछ रुपयों के लिए पांच साल की खातिर अपना भविष्य बेचने वाली पब्लिक को जागना होगा। वरना, गांव के युवाओं को जैसे ट्रिपल एक्स ने बिगाड़ दिया, वैसे ही देश को ट्रिपल पी खत्म कर देगी।

मैं बार बार गांव के बिगड़ैल युवाओं की बात क्यों कर रहा हूं, आपके जेहन में सवाल उठ रहा होगा, मैंने अपनी जिन्दगी के कई साल भारत की रूह माने जाने वाले गांवों में गुजारें हैं, ज्यादातर गांवों में शादी से पहले ही युवा ट्रिपल एक्स यानी नीली फिल्में कई दफा देख लेते हैं और उसको वो रियल लाईफ में उतारने की कोशिश भी करते हैं। जिसके कारण उनकी लाईफ पार्टनर उम्र भर किसी गुप्त रोग का शिकार हो जाती है। ऐसी हजारों उदाहरणें मेरे जेहन में हैं, जिनका उदाहरण दूंगा तो आपको शर्म आएगी, क्या ऐसे होता है महिलाओं के साथ, सच पूछो तो गांव में आज भी औरत एक सैक्स की वस्तु है और कुछ नहीं।

Sunday, January 1, 2017

अतीत , वर्तमान और भविष्य

नारी समाज का अतीत , वर्तमान और भविष्य
किसी संस्कृति को अगर समझना हो तो सबसे आसान तरीका हैं कि हम उस संस्कृति में नारी के हालात को समझने की कोशिश करे स्त्रिया समाज के सांस्कृतिक चेहरे का दर्पण होती हैं ! अगर किसी देश में स्त्रियों का जीवन उन्मुक्त हैं तो इसका सीधा आशय यह निकलता हैं कि उस देश का समाज एक उन्मुक्त समाज हैं !वात्सल्य, स्नेह, कोमलता, दया, ममता, त्याग, बलिदान जैसे आधार पर ही सृष्टि खड़ी है। और ये सभी गुण-एक साथ नारी में समाहित हैं। नारी-प्रेम त्याग का प्रतिबिंब है। नारी के अभाव में मानव जीवन शुष्क है और समाज अपूर्ण। नारी, संसार की जननी है। मातृत्व, उसकी सबसे बड़ी साधना है। निर्विवाद रूप में नारी की यह विशेषता है कि वह जन्मदात्री है, सृष्टि सृजन करती है, जीवन की समूची रस-धार उसी पर आधारित है, लेकिन पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव, नारी संदर्भ में भारतीय समाज में भी, अब दूर से ही पहचाना जा सकता है। वर्तमान सामाजिक संदर्भ में, व नारी की दशा और दिशा में, क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है कोई भी समाज एक जगह स्थिर नहीं रहता हर पल बदलता रहता हैं ! हर पल बदलते समाज में महिलाओ की असल सूरत को पहचान पाना मुश्किल हैं ! वर्तमान युग, चेतना का युग है। तकनीकी उपलब्धियों का युग है तथा प्राचीन मूल्यों में परिवर्तन कायुग है। गत शताब्दी ‘महिला जागरण का युग’ रही। 8 मार्च ‘विश्व महिला दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। नारियों को प्रगति पथ पर प्रेरित करने हेतु राजाराम मोहन राय, महात्मा गांधी, जो महती योगदान किया, उसी कारण वर्तमान ‘नारी- में नारी की स्थति में सुधार हुआ हैं !इक्कीसवीं शताब्दी में भारतीय नारी अपनी लक्ष्मण रेखाओं को छोड़ अबलापन की भावना से हटकर विकास के पथ पर चढ़ रही है। वह किरण बेदी है, तो साथ ही कल्पना चावला भी है, । जहां-जहां, उसका दिशा बोध डगमगाया है, वहीं उसका पतन भी चरम पर पहुंचा है। पश्चिमी सभ्यता के संक्रमण के कारण जहां नारी-जीवन में विविध बदलाव आये हैं, वहां यौन शुचिता भी संक्रमित हुई है। यथार्थ के नाम पर नग्नता को अपनाया जा रहा है। टी.वी. चैनलों पर प्रसारित धारावाहिकों में नारी को अलग रूप में दिखाया जा रहा हैं जो धीरे-धीरे पूर्ण समाज का सत्य बनता जा रहा है। षड्यंत्रकारी भूमिका में नारी का के पर्दे चित्रण हो रहा है ! जो वास्तविक जीवन में अपने पांव पसार चुका है। निःसंदेह आज नारी को समानाधिकार प्राप्त हैं लेकिन फिर भी वह दहेज की खातिर, जलाई जाती है । कदम-कदम पर तिरस्कृत होती है। प साहित्यकार अमृता प्रीतम के शब्दों में-
‘...मैं नहीं मानती कि यह सभ्यता का युग है... सभ्यता का युग तब आयेगा, जब औरत की मर्जी के बिना उसका नाम भी होठों पर नहीं आयेगा, ! शिक्षा प्रसार के साथ-साथ नारी की जड़-मानसिकता में तीव्र परिवर्तन हुआ है। नारी ने शुष्क व्यवहार उपेक्षा की मार झेलते हुए भी अपने सौंदर्य और सहजता को किस ख़ूबसूरती के साथ बनाए रखा हैं ! खूबसूरत नारी खुद अपनी अनुयाई होती हैं ! प्राचीन काल में स्त्रियों को आध्यात्मिक और सामाजिक जीवन में प्रतिष्ठा प्राप्त थी और घर के बाहर आने जाने और घुमने पर प्रतिबन्ध नहीं था ! महिलाए तीज त्योहारों में सम्मिलित होती थी ! उनकी नैतिकता का स्तर भी ऊचा था ! विदुषी स्त्रिया समाज में दार्शनिक विचार विमर्श और तर्क वितर्क मैं भाग लेती थी ! लेकिन मध्य काल में नारी की दशा बिगडती चली गयी ! मुग़ल काल मैं भारतीय नारी ने अपने सतीत्व के साथ अपने प्राणों की आहुति देने का कार्य किया ! आज़ाद भारत में महिलाओ ने सामाजिक व शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से तरक्की हासिल की ! वर्तमान मैं भी राजनीतिक क्षेत्र में महिला शक्ति का वर्चस्व कायम है ! शिक्षा एवं आर्थिक स्वतंत्रता ने नारी को नवीन चेतना दी है। पुरुष नियंत्रित समाज में नारी, आज आत्मविश्वास से भरी हुई हैं !। यदि नारी में निर्भीकता और स्पष्टवादिता है, तो वह कहीं पर भी और कभी भी कुंठाग्रस्त नहीं होती। आज हम महिला दिवस को व्यापक रूप में मानते है ! महिलाओ के विकास की बात करते है ! समाज राजनीति , फिल्म और साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओ को सम्मानित किया जाता है ! धीरे धीरे परिस्थतिया बदल रही है और महिलाएँ पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रही है ! माता पिता अब बेटा बेटी में कोई फर्क नहीं करते है ! महिलाओ को सशक्त करना जरुरी होगा क्युकि महिलाएँ ही देश के विकास में महत्व पूर्ण भागीदारी निभाएंगे ! लेकिन आज हम देखते है कि गाँवों में नारी की दशा आज भी बेहद ख़राब है गाँवों में नारी शिक्षा का प्रचार प्रसार होने के बावजूद अज्ञान की कालिमा नहीं मिटी है ! अशिक्षित महिलाओ को अपने अधिकारों की जानकारी न होना और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक न होना महिला पीड़ा का सबसे बड़ा कारण है! यह सही बात है कि बिना शिक्षा और क़ानूनी जागरूकता के वर्तमान युग मैं महिलाओ को अधिकार और सम्मान मिलना मुश्किल है !! भूमण्डलीकरण, नारियों के लिए एक ऐसी चक्की है, जिसमें उन्हें पीसा जा रहा है। इसका एक चेहरा बेबस, गरीब नारी है, जिसकी आंखों में उसके भूखे बच्चे के प्रति उसकी वेदना समाई हुई है, तो उसका दूसरा चेहरा, उस लड़की का है- जिसका मुंह गुस्से से तमतमाया हुआ है। । नारी का छद्म रूप दिखाकर उन असंख्य नारियों की वेदना नहीं छिपाई जा सकती, जो गांवों में रहती हैं। नारियों का वास्तविक स्वरूप वही है, जो गांवों में अभावों से जूझती और रूढि़यों में जकड़ी नारियों में, दिखाई देता है
नारी में भी नैतिकता का भारतीय परम्परागत भाव तिरोहित हो रहा है। समय और स्थान के अनुसार मान्यताओं में शीर्षासन होता रहा है, लेकिन प्रदर्शन की होड़ में, वर्तमान नारी स्वयं चीरहरण में लगी है। सात्विक रूचि और कलात्मकता, उदारीकरण की बयान में बह गई है। संबंधों के बीच से प्रेम और स्नेह गायब हो रहा है। नारी भी, आत्मकेन्द्रित हो रही है। इसी के अनुरूप बदल रहा है - आधुनिक नारी का-मूल भाव। पिछली सदी में जब हम लड़कियों की बात करते हैं तो हर तरफ लगभग एक ही सूरत नजर आती थी !पहनावे जरुर अलग थे लेकिन जमीनी तौर पर पुरे देश मैं महिलाओ की स्थिति एक सी थी ! उनका चेहरा सामाजिक गतिशीलता की एक कहानी सुनाता था ! लड़कियों के कई तरह के चेहरों का आना शुरू हुआ ! आज भारत में लड़कियों की तीन तरह की सूरते हैं पहली सूरत गॉंव और कस्बो में जन्मी पली बढ़ी और गुजर बसर करने वाली लडकियों की ! इनका चेहरा खुली किताब हैं ! दूसरा चेहरा महानगरो की लडकियों का जिनका आधुनिक होना बहुत सहज हैं उनके मन में परम्पराओं की कोई गाँठ शेष नहीं हैं ! इन लडकियों ने जनम से ही उन्मुक्त जीवन जिया हैं उनकी स्वतंत्रता नेसर्गिक हैं ! तीसरी सूरत मध्य वर्ग की उन लडकियों की जिसकी जड़े अब तक तथा कथित अविकसित इलाको से ही जुडी हैं पर जिन्दगी का सफ़र महानगरों तक फ़ैल गया ! बचपन से एसी लड़कियों को पारिवारिक संस्कार दिए जाते हैं उन्हें बताया जाता हैं क्या हैं एक स्त्री का फर्ज !उनका चरित्र और व्यक्तित्व इस तरह से गढा जाता हैं कि वह समाज और परिवार के प्रति जिम्मेदार बने ! इन चेहरों पर आत्म विश्वास झलकना चाहता हैं लेकिन मन में अद्रशय शक्तियों का भय अब तक हैं ! इनके ख़ुशी की लालसा भी हैं !
‘ शीर्ष पदों पर पहुँचकर महिलाएँ महिला शक्ति का परचम लहरा रही है ! परन्तु आज भी परिवार में महिला अपनी जिम्मेदारियों और घरेलु हिंसा व पाटो के बीच पिसती चली जा रही है महिलाओ के प्रति अपराध कम होने का नाम नहीं ले रहे ! महिलाओ पर होने वाले अत्याचारों में महिलाओ की भी अहम् भूमिका को नाकारा नहीं जा सकता !! कन्याओ को कोख में मारे जाने में महिलाओ की भूमिका ज्यादा होती है ! महिलाओ पर होने वाले घरेलू अत्याचारों में भी महिलाओ की भूमिका अहम् होती है ! महिलाओ को बराबरी का दर्जा दिलाना है तो खुद महिलाओ को इस दिशा में प्रयास करना होगा और सकारात्मक कदम उठाना होगा ! आज वर्तमान में नारी की अस्मिता के साथ खिलवाड़ किया जा रहा हैं ! आज समाज को स्वामी को दयानंद सरस्वती , गोखले , तिलक जैसे महान सुधारको की जरुरत हैं जो समाज मैं जनजागरण ला सके ! समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना करनी होगी ! वर्तमान में समाज को सही दिशा देने वाले नेताओं की कमी खल रही हैं ! समाज में संयुक्त राष्ट्र ने महिलाओ के समानाधिकार और सुरक्षा देने के लिए विश्व भर में कुछ नीतियाँ ,कार्य क्रम और मानदंड निर्धारित किये गए है ! किसी भी समाज में सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं का निराकरण महिलाओ की साझेदारी के बिना नहीं हो सकता इसलिए समाज में महिलाओ की स्थति को मजबूत करना बहुत ज़रुरी है ! महिलाओ के प्रति भेदभाव करने के मामले समाज के लिए नए नहीं है !सालो से चल रहे महिला सशक्तिकरण के अभियानों के बावजूद भी महिलाए उपेक्षा का शिकार हो रही है ! विज्ञापन में नारी-देह का धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है। नारी का नंगापन, उसकी स्वतंत्रता का सूचक नहीं है। वर्तमान समय में भी समाज में नारी का स्थान कुछ वैसा ही है, जैसा-किसी दुकान, मकान, आभूषण अथवा चल-अचल सम्पत्ति हो। वर्तमान प्रधान समाज को अपनी सामंती सोच एवं संकीर्ण मानसिकता, सड़ी-गली व्यवस्था, रूढि़गत कुप्रथा को नारी-उत्कर्ष हेतु तिलांजलि देनी ही होगी। पुरुषों को इस प्रकार का वातावरण तैयार करना होग, जिससे नारी को एक जीवंत-मानुषी, जन्मदात्री एवं राष्ट्र की सृजनहार समझा जाये, न कि मात्र भोग्य की वस्तु !
दैनिक जीवन में महिलाओ द्वारा कठिनाई झेलने के बावजूद भी चीज़े बेहतर हुई हैं ! और एक ऐसी गति भी आई हैं जिसकी उम्मीद दो दशक पहले तक नहीं की जा सकती ! पिछली सदी में जब हम लड़कियों की बात करते हैं तो हर तरफ लगभग एक ही सूरत नजर आती थी !पहनावे ज़रुर अलग थे लेकिन ज़मीनी तौर पर पूरे देश मैं महिलाओ की स्थिति एक सी थी ! उनका चेहरा सामाजिक गतिशीलता की एक कहानी सुनाता था ! लड़कियों के कई तरह के चेहरों का आना शुरू हुआ ! आज भारत में लड़कियों की तीन तरह की सूरत हैं पहली सूरत गॉंग और कस्बों में जन्मी पली बढ़ी और गुजर बसर करने वाली लड़कियों की ! इनका चेहरा खुली किताब हैं ! दूसरा चेहरा महानगरों की लड़कियों का जिनका आधुनिक होना बहुत सहज हैं उनके मन में परम्पराओं की कोई गाँठ शेष नहीं हैं ! इन लड़कियों ने जन्म से ही उन्मुक्त जीवन जिया हैं उनकी स्वतंत्रता नेसर्गिक हैं ! तीसरी सूरत मध्य वर्ग की उन लड़कियों की जिसकी जड़े अब तक तथा कथित अविकसित इलाक़ो से ही जुड़ीं हैं पर जिंदगी का सफ़र महानगरों तक फैल गया ! बचपन से एसी लड़कियों को पारिवारिक संस्कार दिए जाते हैं उन्हें बताया जाता हैं क्या हैं एक स्त्री का फर्ज !उनका चरित्र और व्यक्तित्व इस तरह से गढा जाता हैं कि वह समाज और परिवार के प्रति जिम्मेदार बने ! इन चेहरों पर आत्म विश्वास झलकना चाहता हैं लेकिन मन में अद्रशय शक्तियों का भय अब तक हैं ! इनके चेहरे पर लालसा हैं ख़ुशी की ! वर्तमान में देखे तो आज की नारी कई मायने में स्वतंत्र भी हुई हैं और एक लम्बी उडान भरना चाहती हैं ! कुछ करना चाहती हैं एक नए हिम्मत और होंसले के साथ !सामाजिक/राजनीतिक/शैक्षिक/व्यवसायिक आदि तथा कला एवं साहित्य के क्षेत्र में नारी सम्मानित हुई है। समाजवादी नारी भावना का निरंतर विकास हो रहा है। वास्तव मे। ।!नारी पर जो बंधन/सीमा नियंत्रण थे, वह इन सबसे मुक्ति पा रही है। वर्तमान समाज में अर्थ प्रधान संस्कृति का बोलबाला है। विकास के नाम पर नारी स्वच्छंद जीवन व्यतीत कर रही है। नारी-जीवन मूल्यों में आमूल परिवर्तन हुआ है भारत में व्यव्साइक शिक्षा हासिल करने वाली महिलाएँ दुनिया के किसी भी मुल्क से ज्यादा हैं !नौकरी करने वाली महिलाएँ भारत देश में ज्यादा हैं ! भारत में अमेरिका से ज्यादा महिलाए प्रोफ़ेसर और seientist हैं ! अमीर देशो मैं जो सुधार 100 वर्ष में आया वह निम्न और मध्यम वर्ग वाले देशो में महज 40 वर्ष में आ गया ! भारत में मातृ सत्तामक समुदायों की महिलाओ में स्वछंद और अनैतिक व्यवहार को बढ़ावा देने वाले कहकर आलोचना हुई ! मातृसत्तात्मक परिवारों की महिलाओ को वेश्याओ के लिए आरक्षित तिरस्कार के साथ बर्ताव किया गया ! एसा इसलिए हुआ कि वो जीवन साथी अपनी इच्छानुसार बदल सकती थी ! आज वर्तमान युग में हमारी आधी आबादी के खिलाफ यौन हिंसा खत्म करने से बड़ा कोई मुद्दा नहीं हो सकता ! वर्तमान में महिलाओ की इतनी दुर्दशा क्यू हो रही हैं ? ये सवाल महत्वपूर्ण हैं ! आज बेटियों की संख्या कितनी कम रह गई ये सोचने वाली बात हैं ! सवाल बस इतना सा हैं कि हम कैसा जीवन चाहते हैं कैसी कुदरत चाहते हैं जो स्त्री के बिना सोची जा रही हैं ! शक्ति के बगैर शिव को शव ही माना जायेगा ! कृष्ण की बात करे तो राधा का संग पाकर ही सोलह कलाओ से परिपूर्ण होते हैं ! आज अगर नारी जीवन की उपेक्षा होती हैं ऐसे में हम मनुष्य भी नहीं रह सकेंगे ! मातृ शक्ति को हर रूप में समानता देनी होगी एसा नहीं हुआ तो असंतुलन होगा ! हमे कोशिश करनी होगी बेटियों को बचाने की और नारी शक्ति का सम्मान करने की !नारी-विवाह संस्था को धुरी रही है, लेकिन वर्तमान सामाजिक संदर्भ में विवाहेत्तर संबंध खुले आम प्रदर्शित हो रहे हैं तथा उन्हें सामाजिक स्वीकार भी लिमता है। यह स्थिति बेहद खतरनाक/विस्फोटक है। पति-पत्नी के जन्म-जन्मांतर के साथ का, मिथक टूट चुका है। , उसने अपना व्यक्तित्व प्राप्त कर लिया है। पत्नी कथा की पीड़ा और वेदना अब कम हुई है। आज की नारी-मध्यकालीन आदर्शों से भिन्न सामंती सभ्यता से विच्छिन्न हो, अपने जीवन के प्रति सजग होकर जीव नयापन करने को स्वच्छंद है ! आज की नारी कुछ करना चाहती हैं एक नए हिम्मत और होंसले के साथ ! भारत में व्यव्साइक शिक्षा हासिल करने वाली महिलाएँ दुनिया के किसी भी मुल्क से ज्यादा हैं !नौकरी करने वाली महिलाएँ भारत देश में ज्यादा हैं ! भारत में अमेरिका से ज्यादा महिलाएँ प्रोफ़ेसर और seientist हैं ! नारी ने शुष्क व्यवहार उपेक्षा की मार झेलते हुए भी अपने सौंदर्य और सहजता को किस ख़ूबसूरती के साथ बनाए रखा हैं ! खूबसूरत नारी खुद अपनी अनुयाई होती हैं ! अमीर देशो मैं जो सुधार 100 वर्ष में आया वह निम्न और मध्यम वर्ग वाले देशो में महज 40 वर्ष में आ गया ! भारत में मातृ सत्तामक समुदायों की महिलाओ में स्वछंद और अनैतिक व्यवहार को बढ़ावा देने वाले कहकर आलोचना हुई !! आज वर्तमान युग में हमारी आधी आबादी के खिलाफ यौन हिंसा खत्म करने से बड़ा कोई मुद्दा नहीं हो सकता ! वर्तमान में महिलाओ की इतनी दुर्दशा क्यू हो रही हैं ? ये सवाल महत्वपूर्ण हैं ! आज बेटियों की संख्या कितनी कम रह गई ये सोचने वाली बात हैं ! सवाल बस इतना सा हैं कि हम कैसा जीवन चाहते हैं कैसी कुदरत चाहते हैं जो स्त्री के बिना सोची जा रही हैं ! शक्ति के बगैर शिव को शव ही माना जायेगा ! कृष्ण की बात करे तो राधा का संग पाकर ही सोलह कलाओ से परिपूर्ण होते हैं ! !इक्कीसवीं शताब्दी में भारतीय नारी अपनी वर्जनाओं को तोड अबलापन की भावना को तिलांजलि देकर विकास के सोपान चढ़ रही है। वह किरण बेदी है, तो साथ ही कल्पना चावला भी है, जहां-जहां, उसका दिशा बोध डगमगाया है, वहीं उसका पतन भी चरम पर पहुंचा है। लेकिन शिक्षा प्रसार के साथ-साथ नारी की जड़-मानसिकता में तीव्र परिवर्तन हुआ है। महिलाओ को अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना होगा महिलाओ के लिए अपना स्वतंत्र अस्तित्व गढ़ने और उसे कायम रखने के लिए उसका स्वावलंबी और आत्म निर्भर होना बहुत जरुरी हैं ! महिलाएँ चाहे महानगरों की हो या गाँव की निरंतर असुरक्षित होती जा रही हैं ! ओरतो की आज़ादी पर लगाम लगाने वालो पर लगाम लगाना बहुत ज़रुरी हैं ! सच तो यह हैं कि स्त्री से जुड़ीं मान्यता और पुलिस कानून की व्यवस्था ही आज दुष्कर्मी की सबसे बड़ी रक्षक बनी हुई हैं ! महिलाओ पर यौन हिंसा आक्रमण न हो इसके लिए हमे स्वस्थ समाज की पुनर्स्थापना करनी होगी !आज की नारी के चेहरे पर दिखेगा जीवन में कैरिएर के ऊँचे मुकाम हांसिल करना जिसके लिए शायद वो कोई भी समझौता कर सकती हैं शायद अपनी आज़ादी को फिर से दाव लगाकर भी ! खेतिहर और घरेलू महिलाओ को शोषण के विरुद्ध अधिकार दिया जाना महिला सशक्तिकरण में एक महत्व पूर्ण कदम हैं !
जो समाज स्त्रियों के विकास को उचित नहीं समझता उसे बदल देना बेहतर हैं ! नारी ईश्वरीय वरदान हैं आज समाज में सिर्फ इस तरह की मानसिकता के लोग हैं जो सिर्फ नारी को भोग की वस्तु समझते हैं !आधुकनिकता के आक्टोपसी संजाल में फंसी नारी की विभिन्न मुद्राओं एवं चीखों को भी सुना जा सकता है। वह दिन कब आएगा जब महिलाओ और लड़कियों के लिए अपनी मर्ज़ी से जीना संभव हो सकेगा ! आज योग्यता और क्षमता होने के बावजूद देश की आधी आबादी उन्नति नहीं कर पा रही हैं ! असुरक्षा की भावना उन्हें न चाहते हुए भी चार दीवारी में कैद कर देती हैं ! आक्स फेम इंडिया की और से करवाए गए एक सर्वे के अनुसार भारत में 70 फीसदी महिलाएँ कार्य स्थल पर यौन शोषण का शिकार होती हैं ! एक सर्वेक्षण के नतीजों में तीन भारतीय महिलाओ में एक ने कार्य स्थल पर लेंगिक भेदभाव की बात स्वीकारी ! पुरुषों को ये बर्दाश्त नहीं होता कि स्त्री अपनी जिंदगी से जुड़ा छोटा सा फैसला खुद ले ! महिलाओ को अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना होगा महिलाओ के लिए अपना स्वतंत्र अस्तित्व गढ़ने और उसे कायम रखने के लिए उसका स्वावलंबी और आत्म निर्भर होना बहुत जरूरी हैं आज के समय में नारी जीवन को अधिक गति मिली है। , नगरों में सुशिक्षित नारी में इसकी गति विधि, अधिक दिखाई देती हैं। , सयुक्त परिवार की प्रथा समाप्त हो रही है। पश्चिम के अनुकरण में आज की नारी-शिक्षा, विज्ञान, विज्ञापन, कला, साहित्य के क्षेत्र मे अपना बहुमूल्य योगदान दे रही है ! राष्ट्रीय स्तर पर राजनी‌ति में राबड़ी देवी जैसी घरेलू म‌हिलाएं और मामूली द‌लित प‌रिवार से आई मायावती अपनी प्रभावी भूमिकाएँ निभा रही हैं। आज की नारी के चेहरे पर दिखेगा जीवन में कैरियर के ऊँचे मुकाम हासिल करना जिसके लिए शायद वो कोई भी समझौता कर सकती हैंग्लैमर, फैशन, आजादी और आसमान को छूने की चाह तो बढ़ी ही है।!! खेतिहर और घरलू महिलाओ को शोषण के विरुद्ध अधिकार दिया जाना महिला सशक्तिकरण में एक महत्व पूर्ण कदम हैं ! आज की नारी, अपने स्वाभिमान की रक्षा करनी जानती है, उसे अपनी सामाजिक सत्ता का पूर्ण भान है। नारी, बदलते परिवेश में पारिवारिक बिखराव, मूल्यहीनता, , दिशाहीन राजनीति का प्रभाव, शोषण से मुक्ति पाने की इच्छा व्यक्त कर रही है, एवं धीरे-धीरे अपने इस प्रयास में सफल भी हो रही है। नारी- की दृढ इच्छा शक्ति के कारण वर्तमान में उसकी अबला नारी की छवि निश्चित ही बदली हैं , नारी-सबल हो रही है, ऊर्जावान बनी है और ये बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ हैं नारी के सम्पूर्ण जीवन में ! आज अगर नारी जीवन की उपेक्षा होती हैं ऐसे में हम मनुष्य भी नहीं रह सकेंगे ! मातृ शक्ति को हर रूप में समानता देनी होगी ऐसा नहीं हुआ तो असंतुलन होगा ! हमे कोशिश करनी होगी बेटियों को बचाने की और नारी शक्ति का सम्मान करने की
अगर पुलिस ना होती तो शायद हमारे यहाँ अधर्म का बोलबाला होता। लेकिन पुलिस के होते हुए भी क्या हम चैन की नींद सो सकते हैं? बहुत-से शहरों, और गाँवों में भी लोग अपनी सुरक्षा को लेकर बहुत चिंतित हैं। क्या हम पुलिस से यह अपेक्षा कर सकते हैं कि वह अपराधियों के गिरोह से या जुर्म करने से बाज़ न आनेवाले अपराधियों से हमारी रक्षा करेगी? क्या हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि पुलिस हमें ऐसी हिफाज़त देगी कि हम बेखौफ सड़कों पर घूम-फिर सकेंगे? क्या वह अपराध के खिलाफ अपनी जंग में कभी कामयाब हो सकेगी?
डेविड बेली अपनी किताब, भविष्य की पुलिस (अँग्रेज़ी) में अपनी राय ज़ाहिर करते हैं: “पुलिस अपराध को रोक नहीं सकती। . . . देखा जाए तो पुलिस कैंसर के लिए सिर्फ एक बैंड-एड के समान है। . . . अपराध को रोकने के लिए पुलिस चाहे कितनी ही मेहनत क्यों न करे, लेकिन हम इस बात के लिए पुलिस पर पूरी तरह निर्भर नहीं हो सकते कि वह समाज से अपराध खत्म कर देगी।” अध्ययन दिखाते हैं कि पुलिस के तीन खास काम हैं—सड़कों पर गश्त लगाना, अचानक उठनेवाली समस्या पर फौरन कार्यवाही करना, और अपराध की तहकीकात करना। लेकिन इन कामों से अपराध रोके नहीं जा सकते। ऐसा क्यों है?
अपराध रोकने के इरादे से किसी जगह पर भारी तादाद में पुलिस-बलों को तैनात करना, व्यवहारिक नहीं क्योंकि यह बहुत की महँगा पड़ता है। वैसे भी, अगर इतनी सारी पुलिस तैनात करना मुमकिन भी हो, तब भी इससे अपराधियों को कोई फर्क नहीं पड़ता। इसके अलावा, कार्यवाही करने में पुलिस चाहे कितनी ही फुर्ती क्यों न दिखाए, लेकिन इससे अपराध कम नहीं होते। पुलिस ने रिपोर्ट दी है कि घटनास्थल पर अगर वे एक मिनट के अंदर नहीं पहुँचते, तो अपराधी हाथ से निकल जाते हैं। अपराधी शायद बखूबी जानते हैं कि पुलिस का घटनास्थल पर इतनी जल्दी पहुँचना नामुमकिन है। और अपराधी के बारे में तफतीश करने का भी कोई खास फायदा नहीं होता। यहाँ तक कि अगर जासूस किसी अपराधी को कसूरवार ठहराकर जेल की सलाखों के पीछे डाल भी दे, तौभी इससे अपराध बंद नहीं होते। दूसरे देशों के मुकाबले अमरीका सबसे ज़्यादा अपराधियों को जेल में डालती है, फिर भी वहाँ सबसे ज़्यादा अपराध होते हैं। दूसरी तरफ जापान में, हालाँकि बहुत कम लोगों को जेल में डाला जाता है, फिर भी वहाँ अपराध बहुत कम होते हैं। पड़ोसियों में जागरूकता जैसी योजनाएँ भी खासकर ऐसी जगहों पर ज़्यादा समय तक नहीं टिकतीं, जहाँ हिंसा की बहुत-सी वारदातें होती हैं। ड्रग्स की तस्करी या चोरी जैसे अपराध के खिलाफ जब कड़ी कार्यवाही की जाती है, तो शुरू-शुरू में इसका असर बहुत अच्छा होता है, मगर फिर धीरे-धीरे असर खत्म हो जाता है।
भविष्य की पुलिस (अँग्रेज़ी) किताब कहती है: “किसी समझदार इंसान को यह बात अचंभे की नहीं लगनी चाहिए कि पुलिस, अपराध को रोकने में नाकाम है। कुछ ऐसी सामाजिक परिस्थितियाँ हैं जिन पर न तो पुलिस पूरी तरह काबू पा सकती है और न ही पूरी कानून व्यवस्था, इसलिए आम तौर पर यह समझा जाता है कि इन परिस्थितियों की वजह से अपराध की दर बढ़ती जा रही है।”
अगर पुलिस ना होती?
मान लीजिए कि किसी पुलिसवाले की नज़र आप पर नहीं है, तो आप क्या करेंगे? क्या आप उनकी गैर-हाज़िरी का फायदा उठाकर कोई कानून तोड़ेंगे? यह एक हैरत की बात है कि खुद को इज़्ज़तदार कहनेवाले कितने ही उच्च और मध्यम वर्गीय लोग, बेईमानी से मुनाफा पाने के लिए दफ्तरों में घोटाला करके अपने मान-सम्मान और भविष्य को खतरे में डाल लेते हैं। न्यू यॉर्क टाइम्स ने अभी हाल में यह रिपोर्ट दी कि ‘ऐसे 112 लोगों पर धोखाधड़ी का इलज़ाम लगाया गया है, जिन्होंने गाड़ियों की बीमा कंपनियों से छल करके पैसा निकालने की कोशिश की। इन आरोपियों में वकील, डॉक्टर, काइरोप्रैक्टर, थेरपिस्ट, एक्युपंक्चरिस्ट और पुलिस विभाग के प्रशासन की एक सहयोगी शामिल थी।’
हाल ही में न्यू यॉर्क की सदबी और लंदन की क्रिस्टी, नीलाम घरों में बड़े पैमाने पर हुए घोटाले ने उन कला-प्रेमी रईसों को हिलाकर रख दिया जो जनता की सेवा में अपना पैसा खर्च करते हैं। उन्हें यह जानकर धक्का लगा कि नीलाम घरों के भूतपूर्व मुख्य प्रशासकों पर प्राइज़-फिक्सिंग का इलज़ाम लगाया गया है यानी वे चीज़ों का नकली दाम लगवाकर उन्हें बेचते थे। उन प्रशासकों और नीलाम घरों के मालिकों को मुआवज़े और जुरमाने के तौर पर करोड़ों डॉलर भरने पड़े। तो देखिए समाज का कोई भी वर्ग पैसे के मोह से खुद को बचा नहीं पाया है।
सन्‌ 1997 में, ब्राज़ील के रसीफा शहर में पुलिस के हड़ताल कर देने पर जो लूटमार हुई वह यही दिखाती है कि जब सज़ा पाने का डर नहीं होता तो ज़्यादातर लोग बड़ी आसानी से अपराध कर बैठते हैं। ऐसे समय पर उनका धार्मिक विश्वास, उन्हें गलत काम करने से रोक नहीं पाता। वे बड़ी आसानी से अपने आदर्शों और सिद्धांतों को या तो अपनी सहूलियत के मुताबिक बदल देते हैं या उन्हें ताक पर रख देते हैं। इसमें शक नहीं कि छोटे-बड़े पैमाने पर लोग आज बुराई करने के लिए आमादा हैं और ऐसे में बहुत-से देशों की पुलिस एक ऐसी जंग लड़ रही है जिसमें उसकी हार तय है।
दूसरी तरफ, कुछ ऐसे लोग हैं जो कानून का पालन करते हैं क्योंकि वे अधिकार की इज़्ज़त करते हैं। प्रेरित पौलुस ने रोम के मसीहियों से कहा था कि उन्हें परमेश्वर की ओर से नियुक्त अधिकारियों के अधीन रहना चाहिए क्योंकि ये अधिकारी कुछ हद तक समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखते हैं। ऐसे अधिकार के बारे में उसने लिखा: “वह . . . परमेश्वर का सेवक है; कि उसके क्रोध के अनुसार बुरे काम करनेवाले को दण्ड दे। इसलिये अधीन रहना न केवल उस क्रोध से परन्तु डर से अवश्य है, बरन विवेक भी यही गवाही देता है।”—रोमियों 13:4,5.
समाज की स्थिति में बदलाव
बेशक समाज को सुधारने में पुलिस का काम काफी हद तक असरदार रहा है। जब सड़कों पर ड्रग्स के व्यापारी या हिंसा नहीं दिखायी देती, तो लोग भी समाज के अच्छे स्तरों के मुताबिक जीने की कोशिश करते हैं। मगर जहाँ तक समाज को पूरी तरह बदलने की बात है, वह किसी भी पुलिस-बल के बस में नहीं है।
क्या आप एक ऐसे समाज की कल्पना कर सकते हैं, जहाँ लोगों के दिलों में कानून के लिए इतना गहरा आदर होगा कि पुलिस की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी? क्या आप अपने मन में एक ऐसे संसार की तसवीर उभार सकते हैं, जहाँ पड़ोसी एक-दूसरे की परवाह करेंगे और मदद करने के लिए हरदम तैयार रहेंगे और किसी को पुलिस बुलाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी? शायद यह बात एक खयाली पुलाव लगे। मगर यीशु के ये शब्द हालाँकि दूसरे संदर्भ में कहे गए थे, बेशक यहाँ भी लागू होते हैं। उसने कहा: “मनुष्यों से तो यह नहीं हो सकता, परन्तु परमेश्वर से सब कुछ हो सकता है।”—मत्ती 19:26.
बाइबल वर्णन करती है कि भविष्य में एक ऐसा वक्‍त आएगा जब सारी मानवजाति परमेश्वर यहोवा के ज़रिए स्थापित सरकार के अधीन होगी। “स्वर्ग का परमेश्वर, एक ऐसा राज्य उदय करेगा जो . . . उन सब राज्यों को चूर चूर करेगा, और उनका अन्त कर डालेगा।” (दानिय्येल 2:44) यह नयी सरकार सभी सच्चे दिल के लोगों को परमेश्वर के प्रेम के मुताबिक शिक्षा देगी और अपराध से भरे इस पुराने समाज को पूरी तरह से बदल देगी। “पृथ्वी यहोवा के ज्ञान से ऐसी भर जाएगी जैसा जल समुद्र में भरा रहता है।” (यशायाह 11:9) यहोवा का ठहराया हुआ राजा, यीशु मसीह हर तरह के अपराध को रोकने में काबिल होगा। “वह मुंह देखा न्याय न करेगा और न अपने कानों के सुनने के अनुसार निर्णय करेगा; परन्तु वह कंगालों का न्याय धर्म से, और पृथ्वी के नम्र लोगों का निर्णय खराई से करेगा।”—यशायाह 11:3,4.
न अपराध होगा, न अपराधी। तो फिर पुलिस की भी ज़रूरत नहीं होगी। सभी लोग “अपनी अपनी दाखलता और अंजीर के वृक्ष तले बैठा करेंगे, और कोई उनको न डराएगा।” (मीका 4:4) अगर आप उस “नई पृथ्वी” का भाग बनना चाहते हैं जिसका वर्णन बाइबल करती है, तो यही समय है कि परमेश्वर के वचन में लिखे उसके वादों के बारे में आप जाँच-परख करें।—2 पतरस 3:13.(g02 7/8)
[पेज 12 पर बड़े अक्षरों में लेख की खास बात]
न अपराध होगा, न अपराधी
[पेज 11 पर बक्स/तसवीर]
पुलिस बनाम आतंकवादी
सितंबर 11,2001 को न्यू यॉर्क सिटी और वॉशिंगटन डी. सी. में जो घटना घटी उससे जग ज़ाहिर हो गया कि विमान अपहरण करनेवालों, बंदी बनानेवालों और आतंकवादियों की वजह से पुलिस-दलों के सामने जनता की हिफाज़त करना खासकर एक बड़ी चुनौती बन गयी है। दुनिया के कई भागों में विशेष सैनिक दस्तों को ट्रेनिंग दी गयी है कि वे कैसे खड़े विमान में झट-से घुसकर उसे अपने काबू में कर सकते हैं। उन्हें यह भी सिखाया गया है कि किसी इमारत में कैसे अचानक घुसना चाहिए, जैसे रस्सी के सहारे छत से उतरना, खिड़कियों से कूदकर अंदर आना, आँसू-गैस छोड़ना या कॉनकशन ग्रेनेड फेंकना जिसमें से शॉक देनेवाली तरंगे निकलती हैं और जिससे लोग कुछ देर के लिए बेहोश हो जाते हैं। ये माहिर अफसर अकसर आतंकवादियों को चौंका देने और उन्हें अपने कब्ज़े में कर लेने में कामयाब होते हैं और इस दौरान बंधक व्यक्तियों को भी कम-से-कम चोट पहुँचता है।

Shailesh Gandhi,filed a complaint with the CIC over the RBI’s refusal to answer queries under Right to Information Act


RBI's refusal to share details under RTI is sheer arrogance, says activist Shailesh Gandhi

The most shocking aspect of the decision to demonetise the Rs 500 and Rs 1,000 currency notes by NDA government is the lack of transparency. The government and the RBI, the monetary authority, have not yet revealed the exact reason why the decision was taken or even about the current status of the economy and cash supply. There have even not been regular press releases or statements from the authorities through out the last 51 days.
The country’s central bank remained silent in the initial days of the demonetisation when the citizens had a harrowing time with cash crunch at banks and ATMs coupled with long queues that also led to even a few deaths of senior citizens. The role of the Reserve Bank of India and its new governor Urjit Patel has come for severe criticism.

Excerpts from the conversation:
Shailesh Gandhi, former Information Commissioner with the Central Information Commission (CIC), New Delhi, filed a complaint with the CIC over the RBI’s refusal to answer queries under Right to Information Act by a non-disclosure policy put up on its site on November 30. In a conversation with Firspost, Gandhi explains why the RBI is on the course to setting a dangerous precedent by its refusal to answer queries and setting up its list under its non-disclosure policy which goes against the exemptions laid under the RTI Act, passed by the Supreme Court.
Your take on RBI's unwillingness to respond to RTI queries.
This is sheer arrogance on the part of the RBI. Almost everyone in power dislikes transparency for themselves, be it the courts, bureaucrats, the RBI and even the media for that matter. Arrogance weighs with everyone who will say that in theory the RTI is good but when asked to release information, will remark: I am not corrupt. I am honest and clean and why should any ordinary citizen question me. Even the honest dislike the RTI and are happy to tell others to be transparent. It takes time to get used to being questions. It is 11 years since the RTI Act came into force.
What the RBI is doing by refusing to answer queries under RTI is denying citizens their fundamental rights. There are ten exemptions under the RTI. These do not include what the RBI is stating as exemption for itself. The central bank has also not given any reason for its actual rejection to the questions posed to it under the RTI.
Our RTI Act is the best in the world and we now rank at number 4 in terms of provisions of law and at 66 with regard to implementation. The Act is grossly misrepresented. The courts also have not been very enthusiastic about it.
You have filed a case against RBI’s refusal with the CIC
Yes, I have filed a complaint with the CIC on 16 December that the RBI is arbitrarily claiming exemption and have spread the net very wide in the garb of following the law and are actually defying the law. I did that because the RBI could set a bad precedent which is dangerous that could lead other public authorities to follow it, which could lead to increase in the load on the CIC. Everyone will compile their own non-disclosure list like the RBI has done and the CIC will not be able to penalise them. I hope the Supreme Court and the CIC takes cognisance of it.
The RBI has in its Disclosure Policy on its site on 30 November said that the list of information which shall not be given is justified by the proclamation that: ‘While compiling the ( nondisclosure) list, it has been the Bank's endeavour to attain the objectives of the RTI Act, without jeopardizing the financial stability and economic interests of the State.’ Effectively it means that RBI arrogates to itself the right to lay down exemptions to disclosure of information in line with the objectives of the Act. This is the sole prerogative of Parliament which has provided the exemptions to disclosure in Section 8 and 9 of the RTI Act. The RBI's disclosure policy is actually a non-disclosure. They are the masters and the judges themselves.
What are the 10 areas that are exempted under the RTI Act?
1) To give information, disclosures which would affect the sovereignty and integrity of India, the security, strategic, scientific or economic interests of the State, relation with foreign State or lead to incitement of an offence; 2) information which has been expressly forbidden to be published by any court of law or tribunal or the disclosure of which may constitute contempt of court; 3) information, the disclosure of which would cause a breach of privilege of Parliament or the State Legislature; 4) information including commercial confidence, trade secrets or intellectual property, the disclosure of which would harm the competitive position of a third party, unless the competent authority is satisfied that larger public interest warrants the disclosure of such information; 5) information available to a person in his fiduciary relationship, unless the competent authority is satisfied that the larger public interest warrants the disclosure of such information; 6) information received in confidence from foreign government; 7) information, the disclosure of which would endanger the life or physical safety of any person or identify the source of information or assistance given in confidence for law enforcement or security purposes; 8) information which would impede the process of investigation or apprehension or prosecution of offenders; 9) cabinet papers including records of deliberations of the Council of Ministers, Secretaries and other officers: Provided that the decisions of Council of Ministers, the reasons thereof, and the material on the basis of which the decisions were taken shall be made public after the decision has been taken, and the matter is complete, or over: Provided further that those matters which come under the exemptions specified in this section shall not be disclosed; 10) information which relates to personal information the disclosure of which has no relationship to any public activity or interest, or which would cause unwarranted invasion of the privacy of the individual unless the Central Public Information Officer or the State Public Information Officer or the appellate authority, as the case may be, is satisfied that the larger public interest justifies the disclosure of such information: Provided that the information, which cannot be denied to the Parliament or a State Legislature shall not be denied to any person.
When Supreme Court orders are not being adhered to by the RBI, can no action be taken on the institution?
When you defy SC orders, the CIC cannot do anything. The commission has the authority and power to say that the list you put up is too wide ranging and can’t be accepted. That's all.