Tuesday, February 7, 2017

राजस्थान के रेगिस्तान की जिंदगी कितनी मुश्किल है

अनिल वर्गीस बता रहे हैं राजस्थान के रेगिस्तान के एक दूरस्थ हिस्से में बिताई गई रात के बारे में। उन्होंने देखा कि वहां के लोगों की जिंदगी कितनी मुश्किल है और जाना कि फिर भी वे उससे मुक्त होना क्यों नहीं चाहते

जमीनी हक़ीक़त : अनिल वर्गीस

मैसूर, 31 जनवरी, 2016 : 10 जनवरी को हम लोग भारत की पश्चिमी सीमा और उसके पार पाकिस्तान की एक झलक पाने के लिए जैसलमेर से निकले। जैसे-जैसे हम लोग सीमा के नज़दीक पहुंचते गए, हाईवे से देखने पर ऐसा लगने लगा मानो देश पीछे छूटता जा रहा हो। वहां लोग भी बहुत कम थे और पेड़-पौधे भी। अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगभग 30 किलोमीटर पहले, जैसे ही हमारी कार ने एक पहाड़ी से नीचे उतरना शुरू किया, हमने पाया कि हम एक रेगिस्तान के बीचो.बीच हैं। जितनी दूर तक निगाहें जाती थीं, सड़क के दोनो और केवल रेत ही रेत थी। काफी दूर हमें एक छोटा-सा गांव दिखलाई दिया। वह गांव घाटी के नीचे था, जहां सड़क दाहिनी ओर मुड़ रही थी। इस गांव, जिसका नाम रानऔतार था, ने हमें वहां रहने वालों की कठिन जिंदगी और उनके जीवट को समझने का मौका दिया। वहां सिर्फ बीएसएनएल के सिग्नल उपलब्ध थे, पानी बहुत सीमित मात्रा में टैंकरों के ज़रिये प्रदान किया जाता था और गांव में बिजली नहीं थी – यद्यपि गांव के ऊपर से बिजली के मोटे केबिल गुज़र रहे थे।
रानऔतार की हमारी पहली झलक
गांव में मिट्टी से लिपे माचिस के डिब्बेनुमा मकान थे। खिड़की के नाम पर दीवारों में छेद थे और ये छेद इतने छोटे थे कि उनमें से सिर्फ हवा ही गुज़र सकती थी। अगर आकार को छोड़ दें, तो ये मकान रेगिस्तानी इग्लू जैसे लग रहे थे। दोपहर का समय था और गांव के खुले इलाके में भेड़ें, बकरियां और गायें विचरण कर रहीं थीं। सूं-सूं करती हवा, भेड़ों की मिमियाहट और कभी-कभी हाईवे से तेज़ गति से गुज़रते किसी वाहन की आवाज़-इसके अलावा सब कुछ एकदम शांत था।
रानऔतार के घर
गांव से निकटतम शहर जैसलमेर पहुंचने के लिए दिन भर में केवल एक बस उपलब्ध थी, जो कि तानोट से अलसुबह जोधपुर के लिए निकलती थी और देर शाम इसी रास्ते वापस जाती थी। गांव के कई लोगों ने जैसलमेर तक नहीं देखा था।
इन रेगिस्तानी इग्लूओं में से एक के सामने हमने अपनी गाड़ी रोक दीए ताकि हम दीवारों पर उकेरे गए चित्र नज़दीक से देख सकें। वहीं हमारी मुलाकात जगन्नाथ सिंह से हुई, जो पड़ोस के एक गांव, गिरदूवाला, से वहां आए हुए थे। परिचय के बाद हम वहां रह रहे लोगों की जिंदगी की जद्दोजहद के बारे में बातें करने लगे। जगन्नाथ सिंह ने कहा कि हम लोग उनके घर पर रात बिता सकते हैं। ‘‘परंतु मेरे घर में पलंग नहीं है। आपको ज़मीन पर सोना पड़ेगा। इसमें आपको कोई परेशानी तो नहीं है?’’ उन्होंने पूछा। जाहिर है, हमारा उत्तर ना ही था।
प्राथमिक विद्यालयए तनौत में एक मात्र शिक्षक और उनके विद्यार्थी
यह गांव सोलंकियों का है। सोलंकी यहां की दो राजपूत उपजातियों में से एक हैं। दूसरी है चौधरी। सीमा के और नज़दीक स्थित तानोट नाम के गांव में केवल अनुसूचित जाति के मेघवाल रहते हैं। तानोट में हमें एक प्रायमरी स्कूल के दर्शन हुए, जिसमें पहली से लेकर पांचवी कक्षा तक को पढ़ाने के लिए केवल एक ही शिक्षक था। हम लोग स्कूल के बरामदे में बैठे हुए थे। मास्टर साहब ने पांचो क्लास के बच्चों को अलग-अलग निर्देश दिए और बच्चे अपने-अपने कामों में व्यस्त हो गए। इसके बाद मास्टर साहब हमसे मुखातिब हुए। ‘‘यहां कोई आना ही नहीं चाहता। मैंने तबादले के लिए अर्जी दी थीए परंतु सरकार को मेरी जगह लेने वाला कोई मिला ही नहीं। इसलिए मैं यहीं बना हुआ हूं’’, उन्होंने कहा।

सीमा पर भी संघर्ष

सीमा पर स्थित बीएसएफ चैकी पर हमारी मुलाकात सीमा सुरक्षा बल की दो महिला कर्मियों से हुई। उनसे हमने उनकी कठिन जिंदगी का हाल जाना। हमें इस चैकी तक जाने की अनुमति प्राप्त करने के लिए कई टेलीफोन करने पड़े थे। दोनों महिला कर्मी, जिनकी आयु 20-25 वर्ष रही होगी, ने हमें बताया कि उन कुछ महीनों के अलावा, जो वे छुट्टी पर अपने घरों में बिताती हैं, उन्हें 24 घंटे, सातों दिन ड्यूटी पर रहना होता है। दो पालियों के बीच उन्हें केवल छह घंटे आराम करने के लिए मिलते हैं। उन्हें लगातार चैकस रहना होता है कि कहीं सीमा के उस पार से कोई घुसपैठिया भारत में प्रवेश न कर जाए। सीमा के इस ओर मोबाइल फोन के सिग्नल उपलब्ध नहीं हैं, क्योंकि वहां आसपास मीलों तक कोई नहीं रहता। हम जहां तक भी देख सकते थे, हमें केवल झाड़ियां ही झाड़ियां नज़र आ रही थीं।
सानोवल सिंह
देर शाम जब हम रानऔतार पहुंचे तब तक अंधेरा घिर चुका था। जगन्नाथ सिंह, जिन्होंने हमारी मेज़बानी करने की इच्छा व्यक्त की थी, वहां नहीं थे। यह जानकारी रानऔतार के एक और निवासी सानोवाल सिंह ने हमें दी। हमारी कार की खिड़की से झांक कर हमसे बात कर रहे सानोवाल सिंह को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हम जगन्नाथ से क्यों मिलना चाहते हैं। गठीले बदन के सानोवाल का रंग गेहुंआ था और उनके चेहरे पर पतली-सी मूंछें थीं। हमें उन्हें इस बात के लिए राजी करने में काफी वक्त लग गया कि वे हमें जगन्नाथ के गांव गिरदूवाला तक छोड़ने चलें। हमारी बातचीत के दौरान नशे में धुत्त एक व्यक्ति बीच-बीच में आकर कुछ न कुछ अनर्गल बातें कर रहा था। हाईवे से नीचे उतरकर एक पतली सड़क पर कुछ दूर जाने के बाद हमें अपनी गाड़ी रोकनी पड़ी। इसके आगे हमें लगभग 100 मीटर तक रेत में पैदल चलकर जगन्नाथ के घर तक पहुंचना था। हमारी किस्मत अच्छी थी कि उस दिन आकाश में चांद खिला हुआ था और हम आसानी से जगन्नाथ के घर तक पहुंच गए।
जगन्नाथ तब तक घर नहीं लौटे थे। उनके भाई पदम सिंह, सानोवाल और कुछ अन्यों ने एक वैकल्पिक योजना सुझाई। उन्होंने कहा कि हम उसी क्षेत्र में आयोजित एक ‘पार्टी’ में भाग ले सकते हैं। हमारे लिए यह समझना मुश्किल था कि ‘पार्टी’ से उनका क्या मतलब है परंतु हम इसलिए राज़ी हो गए क्योंकि हमें लगा कि वहां हमें बहुत से लोगों से मिलने का मौका मिलेगा। ‘पार्टी’ का स्थान डामर की सड़कों से काफी दूर था। उन लोगों ने हमसे कहा कि हमारी गाड़ी रेत पर नहीं चल सकेगी और इसलिए वे एक ट्रैक्टर का इंतज़ाम कर लेंगे। उन्हें आशंका थी कि हमारी बूढ़ी होण्डा सीआरवी रेत में फंस सकती है, परंतु हम अज्ञानियों को यह पता नहीं था कि हमारी लो-फ्लोर, टू-व्हील ड्राईव गाड़ी को रेत में दौड़ाने के क्या परिणाम हो सकते हैं। इसलिए हमने यह सोच कर कि हमारे दरियादिल मेज़बानों को कोई परेशानी न हो, उनसे कहा कि उन्हें ट्रैक्टर का इंतज़ाम करने की ज़रूरत नहीं है और हम सब इसी गाड़ी से ‘पार्टी’ में जा सकते हैं। उन्होंने कुछ हिचकिचाहट के साथ हमारी बात मान ली। परंतु उन्होंने कहा कि उन्हें पहले गाड़ी के टायरों की हवा कम करनी होगी। यह करने केे बाद अपनी अनजान मंज़िल की ओर निकल पड़े।

सूनसान रेगिस्तान में अकेले

जिस रास्ते पर हम जा रहे थे, वहां कोई सड़क नहीं थी; थे तो केवल एक-दूसरे को काटते रेत में बने टायरों के निशान। हमें रास्ता दिखाने के लिए सानोवाल सिंह हमारे साथ थे। वे जब और जहां मुड़ने को कहते, हम मुड़ जाते। हमारे ड्रायवर रवीन्दर रविदास की जगह प्रमोद रंजन गाड़ी चला रहे थे। ‘‘तेज़, और तेज़’’, हमारे मेज़बान बार-बार चिल्लाते, ‘‘अगर गाड़ी धीमी हुई तो रेत में फंस जाएगी’’। हमें तब तक उनकी बात पर विश्वास नहीं हुआ जब तक उनकी बात सच सिद्ध न हो गई। जब हम एक हल्की चढ़ाई चढ़ रहे थे तभी अचानक गाड़ी रूक गई। गाड़ी का इंजन गरज रहा था, पहिए तेज़ी से घूम रहे थे परंतु गाड़ी एक इंच भी आगे नहीं बढ़ रही थी। हम अब कुछ नहीं कर सकते थे, सिवाए मदद के इंतेजार के।
मदद के इंतज़ार में अनिल कुमार और हौंडा सीआरवी
हम में से किसी का फोन नहीं चल रहा था। रेत के एक टीले पर चढ़कर बीएसएनएल के सिग्नल मिले। काफी कोशिश करने पर एक ट्रैक्टर मालिक का फोन लगा और लगभग एक घंटे के इंतज़ार के बाद ट्रैक्टर वहां पहुंचा। सानोवाल ने स्टीयरिंग संभाला और हम लगभग दस लोग ट्रैक्टर पर लद गए। एक इंच जगह भी खाली नहीं थी। ठंड इतनी थी कि हमारे हाथ सुन्न पड़ गए थे परंतु ट्रैक्टर का जो भी हिस्सा जिसके हाथ लगा उसे कसकर पकड़े रहना उसकी मजबूरी थी। ट्रैक्टर कभी एक ओर झुकता तो कभी दूसरी ओर। कभी-कभी किसी झाड़ी को बचाने के लिए जब ट्रैक्टर को तेज़ी से मोड़ा जाता तो हमें ऐसा लगता कि ट्रैक्टर पलट ही जाएगा। हमें अपनी मंजिल तक पहुंचने में लगभग 30 मिनट लगे परंतु हम जब वहां पहुंचे तो हमें लगा मानो हम न जाने कितने समय से ठंडे रेगिस्तान में घूम रहे थे। ट्रैक्टर से उतरने पर हमारी जान में जान आई।
रानऔतार के लोग एक पार्टी में मटन और रोटा खाते हुए

पार्टी

पार्टी’ का स्थान रेगिस्तान के बीच एक खुला मैदान था, जहां रानऔतार और आसपास के गांव के लोग अपनी भेड़ें और बकरियां चराते थे। वे वहां चैबीसों घंटे रहते थे और अब तो यह और ज़रूरी था क्योंकि बकरियां बच्चों को जन्म देने वाली थीं। आसपास बहुत लोमड़ियां थी जो बकरियों के बच्चों को पकड़ने की फिराक में घूमती रहती थीं। हमने मटन करी और रोटा (कोयले पर सिंकी आटे की बहुत मोटी और बड़ी रोटी) का सुस्वादू भोजन किया। इस बीच हमें एक बकरी के बच्चे की दर्दभरी मिमयाहट सुनाई दी। हमें बताया गया कि शायद किसी लोमड़ी ने उसे पकड़ लिया है। बकरी के बच्चों को पूस से बने छोटे-छोटे पिंजरों में रखा गया था। उनकी मांएं सभी बच्चों का पेट भरने में सक्षम नहीं थीं। वहां मौजूद चरवाहों का यह काम था कि वे यह सुनिश्चित करें कि सभी बच्चों को बराकर दूध उपलब्ध हो सके। वहां मौजूद सभी लोगों के पास बकरियों और भेड़ों के बड़े झुंड थे-कुछ के पास 50, कुछ के पास 100 तो कुछ के पास 1,000।
अपनी भेड-बकरियों के पास सोते गड़ेरिये
सानोवाल सिंह ने हमें बताया कि नोटबंदी के कारण उसके जैसे पशुपालकों की कमर टूट गई है। चारा खरीदने के लिए पर्याप्त पैसे न होने के कारण उसकी 30 गाय मर गई थीं। जगन्नाथ सिंह के भाई पदम सिंह की आंखों के सामने उसकी 30 बकरियां भूख से मर गईं। कुल मिलाकर, गिरदूवाला में 500 गायें, भेड़ें और बकरियां भूखी मर गईं। जब जानवरों को पर्याप्त भोजन नहीं मिलता तो अक्सर उनका गर्भपात हो जाता है। इस कारण जो नुकसान हुआ है, उसका तो अभी अंदाज़ा ही लगाया जा रहा है। सानोवाल का कहना था कि जिस तरह किसानों को फसल के नुकसान के लिए बीमा कंपनियों से मुआवज़ा मिलता है, उसी तरह की व्यवस्था पशुपालकों के लिए भी की जानी चाहिए।
सन 1980 के दशक में भारत-पाक सीमा पर बाड़ लगाई जाने से पहले, उन्हें सीमा पार से आने वाले चोरों का भी डर रहता था जो उनके मवेशी चुराकर पाकिस्तान ले जाते थे। अब यह  बंद हो गया है।
हमने कई घंटे उन लोगों से बातें कीं। अब हम रानऔतार जाना चाहते थे, ताकि कुछ घंटे सो सकें। रानऔतार का एक निवासी अपनी महिंद्रा स्कार्पियो से पार्टी में आया था। हम लोग उसकी गाड़ी में वापस रवाना हुए। रास्ते में हम वहां रूके जहां हमारी कार फंसी हुई थी। इस बार हमारे साथ कई लोग थे और हमने किसी तरह धक्का मार कर कार को रेत के दलदल से निकाल लिया। जल्दी ही हम रानऔतार पहुंच गए और वहां एक अधूरे बने मकान में हमने रात बिताई। इस मकान के मालिक ने परंपरा से हटकर अपना मकान जैसलमेर के मकानों जैसा बनाया था। गांव में दो स्कार्पियो खड़ी थीं। इससे हमें लगा कि पशुपालन के काम में भले ही कितनी ही चुनौतियों क्यों न हों, मुनाफा काफी था। भारतीय सीमा सड़क संगठन हाईवे की मरम्मत और उसके चैड़ीकरण का काम कर रहा है। मजदूरों में से अधिकांश झारखंड से आए प्रवासी हैं। स्पष्टतः, इस इलाके के लोगों को मजदूरी करने की जरूरत नहीं थी। हाईवे के किनारे छोटी-छोटी झोपड़ियां बनी हुई थीं जहां ये प्रवासी मजदूर अपने परिवारों के साथ रह रहे थे।

जातिवाद का घिनौना चेहरा

अगले दिल बहुत सुबह हमारी नींद गांव के एक बुजुर्ग के ज़ोर-जोर से कुछ बोलने के कारण खुल गई। बाद में हमें पता चला कि वह यह कह रहा था कि गांव में कुछ मेहमान आए हुए हैं और इस सिलसिले में एक बैठक बुलानी चाहिए। जब हम घर से बाहर निकले तो हमने देखा कि रंग बिरंगी पगड़ियां पहने कई बुजुर्ग अलाव के आसपास बैठे हैं। सानोवाल सिंह ने तो हमें यह नहीं बताया कि बैठक में क्या हुआ परंतु वे अब उतने उत्साहित नज़र नहीं आ रहे थे, जितने कि पिछली रात थे। शायद कुछ ठीक नहीं था। या तो बुजुर्ग इस बात से खफा थे कि सानोवाल सिंह ने बिना उनकी अनुमति के हमारी मेज़बानी की थी या उन्हें पिछली रात हमारी ‘नीची’ जातियों के बारे में पता चल गया था। हो सकता है हमारे ड्रायवर रवीन्दर रवीदास ने पार्टी के दौरान उन्हें अपनी जाति के बारे में बता दिया हो और उन्हें यह अच्छा नहीं लगा हो कि हम एक ही थाली में उनके साथ भोजन कर रहे थे। हमने अपना सामान समेटा, सब को अलविदा कहा और कार में बैठकर जैसलमेर के लिए रवाना हो गए। तो यह थी राजस्थान के राजपूतों की मेज़बानी!
रानऔतार के लोग फॉरवर्ड प्रेस पढ़ते हुए
रानऔतार से लगभग 30 किलोमीटर दूर है रामगढ़, जो कि गांव का सबसे नज़दीकी कस्बा है। वहां हमारी मुलाकात एक सरकारी स्वास्थ्य कार्यकर्ता से हुई जो हमारे साथ कुछ दूर तक हमारी गाड़ी में गया। वह मेघवाल (अनुसूचित जाति) समुदाय का था। उसने हमें क्षेत्र में व्याप्त जातिवाद के बारे में कुछ बातें बताईं। उसका कहना था कि ऊँची जातियों के परिवारों की शादियों में या तो उसकी जाति के लोगों को आमंत्रित ही नहीं किया जाता और अगर किया भी जाता है तो उन्हें अलग बैठाकर खाना खिलाया जाता है। ‘‘ओबीसी हमारे साथ भेदभाव नहीं करना चाहते परंतु अगर वे ऐसा नहीं करते तो ऊँची जातियों के लोग उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं’’।
रानऔतार के सोलंकी यह नहीं जानते कि ओबीसी किस चिड़िया का नाम है। उनके लिए तो बस राजपूत हैं और दलित। और वे सिर्फ राजपूतों में ही शादियां करते हैं। रानऔतार यदि दुनिया से अलग-थलग है तो उसका एक कारण तो यह है कि वहां के लोगों की जिंदगी भले ही कठिन हो परंतु उनके पास अपने मवेशियों को चराने के लिए पर्याप्त ज़मीन उपलब्ध है और वे काफी समृद्ध हैं। दूसरा कारण यह है कि उन्हें अपने जीवनयापन के लिए बाहरी दुनिया की ज़रूरत नहीं है और वे अपनी ही दुनिया में मस्त रह सकते हैं। हमें यह भी अहसास हुआ कि ऊँची जातियों का रानऔतार जैसा गांव जब अपने बुजुर्गों के चंगुल से मुक्त होता है या सेलफोन की मदद से बाकी दुनिया के नज़दीक आता है तो वह कुछ खोता भी है और कुछ पाता भी है। और जो वह खोता है उसमें शामिल हैए वह उच्च सामाजिक दर्जा जो उसे अपने आसपास की दुनिया में प्राप्त है।

सामाजिक बहिष्कार और न्याय

सामाजिक बहिष्कार की घटनाओं को देखते हुए एक संस्था ने इस प्रथा को अपराध घोषित किए जाने और इसके खिलाफ कड़ा कानून बनाने की मांग को लेकर राज्यव्यापी अभियान शुरू कर दिया है। शहर की अंधश्रृद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष दिनेश मिश्र ने बताया,‘हमने ‘सामाजिक बहिष्कार निषेध कानून लागू करने और इस प्रथा के शिकार लोगों को न्याय दिलाना सुनिश्चित करने की मांग को लेकर राज्य के सभी 27 जिलों में धरना प्रदर्शन आयोजित करने की योजना बनाई है।’ उन्होंने बताया,‘हम अभी तक राजधानी रायपुर और बिलासपुर जिला मुख्यालयों में ऐसा कर चुके हैं जहां बहुत से लोग इसके शिकार हुए हैं या हो रहे हैं। ऐसे सभी लोगों ने इस धरना प्रदर्शन में शिरकत की।
रायपुर के रहने वाले नेत्र रोग विशेषज्ञ मिश्र पिछले दो दशक से अंधविश्वास और काला जादू जैसी इन सामाजिक बुराइयों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने उस आंदोलन की भी शुरूआत की थी जिसकी परिणति जादू टोना उत्पीड़न (निषेध) कानून 2005 के तौर पर हुई। छत्तीसगढ़ सरकार ने सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक क्षेत्र में अभिनव प्रयास करने के लिए मिश्रा को पंडित रविशंकर शुक्ल सम्मान से भी विभूषित किया है। समिति के अध्यक्ष दिनेश मिश्रा ने बताया कि संगठन ने सामाजिक बहिष्कार के मामले में अपराध पंजीबध्द करने और इसके खिलाफ कानून बनाने की मांग की है। इसके लिए धरना प्रदर्शन भी किया गया है।
मिश्रा ने बताया कि राज्य में सामाजिक और जातिगत स्तर पर सक्रिय पंचायतों द्वारा सामाजिक बहिष्कार के लगातार मामले आते रहते हैं। ग्रामीण अंचल में ऐसे मामले ज्यादा होते हैं। राज्य में ऐसे मामले आते हैं जिसमें जाति या समाज से बाहर विवाह करने, समाज के मुखिया का कहना न मामने, पंचायतों के मनमाने फरमान और फैसलों को सिर झुकाकर पालन नहीं करने पर किसी व्यक्ति या उसके पूरे परिवार को समाज व जाति से बाहर कर दिया जाता है तथा समाज में उसका हुक्का पानी बंद कर दिया जाता है। समिति सामाजिक बहिष्कार के प्रभावितों को न्याय दिलाने और बहिष्कार के विरोध में प्रभावी कानून बनाने की मांग कर रही है।
छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में रहने वाले 50 वर्षीय मजदूर भगत दास बघेल की पत्नी श्यामा बाई की मौत इस वर्ष अगस्त महीने में हो गई लेकिन बघेल उसका अंतिम संस्कार गांव के मुक्तिधाम में नहीं कर सके। उन्हें पत्नी का शव अपने घर के पीछे दफनाना पड़ा। गांव वालों के मुताबिक बघेल ने 40 वर्ष पहले दूसरी जाति की महिला से प्रेमविवाह करने की ‘गलती’ की थी। इसके बाद बघेल और उसके परिवार का गांव के लोगों ने सामाजिक बहिष्कार कर दिया था। छत्तीसगढ़ में यह ऐसा अकेला मामला नहीं है जिसकी वजह से एक महिला को मुक्तिधाम की मिट्टी नसीब नहीं हो पाई और उसके परिवार को उपेक्षित जीवन जीना पड़ रहा है।
राज्य में ऐसे सैकड़ों मामले हैं और ऐसे अनेक परिवार हैं जो प्रेम विवाह, टोना करने के आरोप, किसी महिला के दूसरे व्यक्ति के साथ चले जाने, अवैध शराब बेचने या समाज के खिलाफ सूचना का अधिकार का उपयोग करने के कारण सामाजिक बहिष्कार का सामना कर रहे हैं। मिश्रा ने बताया कि सामाजिक बहिष्कार होने से दंडित व्यक्ति और उसके परिवार से पूरे गांव और समाज में कोई भी व्यक्ति न बातचीत करता है और न ही उनसे किसी भी प्रकार का व्यवहार रखता है। बहिष्कृत परिवार को हेंडपंप से पानी लेने, तलाब में नहाने और निस्तार करने, सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल होने, दुकान से सामान खरीदने और अन्य कार्यक्रमों में हिस्सा लेने से वंचित कर दिया जाता है।
वहीं सामाजित पंचायतें कभी कभी सामाजिक बहिष्कार हटाने के लिए भारी जुर्माना, अनाज, शारीरिक दंड और गांव छोड़ने जैसे फरमान जारी कर देती है। इस सामाजिक बहिष्कार के कारण विभिन्न स्थानों पर आत्महत्या, हत्या, प्रताड़ना और पलायन करने की घटनाएं भी होती हैं। उन्होंने बताया कि सामाजिक बहिष्कार को लेकर अभी तक कोई सक्षम कानून नहीं बन पाया है जिसके कारण ऐसे मामलों में कोई उचित कार्रवाई नहीं हो रही है। मिश्रा ने बताया कि इस मुददे को लेकर वह राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायधीश ,छत्तीसगढ़ के राज्यपाल और मुख्यमंत्री से आग्रह कर चुके हैं और विभिन्न आयोगों में पत्र भेज चुके हैं। राज्य शासन ने इस संबंध में गंभीरता पूर्वक विचार करने का आश्वासन दिया है।
भागलपुर में सामाजिक अन्याय की शर्मनाक कहानी घटित हुई है। जर्जर होती जम्हूरियत पर अखिलेश अखिल का यह लेख एक बड़ा सवाल है जिसे समाधान की जरुरत है। 'बिहार फिर एक जातीय युद्ध की चपेट में 'की आशंका जता रहे हैं अखिलेश। स्वराज टीम भागलपुर की घटना पर लगातार नजर रख रही है। पढ़ें यह लेख ।
क्या अपनी  मांगो को लेकर देश के  गरीब, भूमिहीन और दलितलोग सरकार के  लोगो से नहीं मिल सकते ? क्या अपनी बेबसी की आवाज सरकार के कानो में डालना जुर्म है ?और क्या धरना प्रदर्शन करना कानून विरोधी है ? लोकतान्त्रिक देश में सरकार के हर जुर्म के विरोध में अपनी आवाज उठाने की बात हमारे संविधान में दर्ज है।  फिर भागलपुर में जिस तरह भूमिहीन दलितों को पीटा गया और दलित महिलाओ को घायल और नंगा किया गया इसे क्या कहा जाए ? सच तो यही है कि  जमीन के सवाल को लेकर निरीह भूमिहीन जनता पर जो पुलिसिया दमन भागलपुर में हुआ है, वह नीतीश कुमार के सामाजिक न्याय की प्रतिबद्धता को ’नंगा’ कर देता है। जिस तरह से बुजुर्ग महिलाओं और बच्चों पर लाठी चार्ज किया गया, वह साफ करता है कि नितीश सरकार जमीन के सवाल को हल करने से ज्यादा सवाल को दबाने में सक्रिय है। भूमिहीन दलितों  के आवास की गारंटी, भूमिहीनों को जो दशकों पहले परचा दिया गया था- उस पर कब्जा दिलाने की मांग तथा सरकारी व भूदान की जमीनों से दबंगों व सामंतों के कब्जे से मुक्त कराने की मांग समेत डीडी बंदोपाध्याय आयोग की सिफारिशों को लागू कराने की मांग अगर आज बिहार का दलित, महादलित कर रहा है तो नीतीश कुमार की एक दशक से अधिक समय से बिहार पर काबिज सरकार क्या कर रही थी? उन्हें अब तक कब्जे क्यों नहीं दिए गए। चोरी और सीनाजोरी  वाली कहावत भागलपुर में देखने को मिल रही है। 
         भूमहीनो और दलित महिलाओ पर हमले की बात पहले की जाए।  क्या नीतीश सरकार यह बता पायेगी कि जिन दर्जन भर से ज्यादा दलित और भूमिहीन महिलाओ को बेरहमी से पिटाई की गयी है उसका जुर्म क्या था ? या तो सरकार पहले उसका जुर्म साबित  करे या फिर जिन सरकारी तंत्र की वजह से हमारी महिलाये घायल हुयी है उन पर कड़ी कार्रवाई की जाए।  खबर के मुताविक भूमिहीन और दलित लोग कई दिनों से सरकार द्वारा वर्षो पहले मिले जमीन  के पट्टे के अनुसार जमीन पर कब्जा दिलाने की मांग कर रहे थे। लेकिन  लोग सुन नहीं रहे थे , अंत में धरना दे रहे लोगो ने भागलपुर कलेक्टर के दफ्तर में जाकर कलेक्टर से इस बाबत मिलना चाह रहे थे।  भीड़ में बड़ी संख्या में महिलाये भी थी जो कई दिनों से भूखे प्यासे ठंढ से परेशान थी।  उनके बच्चे भी साथ में ही थे।  कलेक्टर के ऑफिस में घुसने के आरोप में दलित महिलाओ की पिटाई की गयी।  यह कैसा इन्साफ है ? आखिर अपनी बात कहने आम जन किसके पास जाए ? और कलेक्टर कोई भगवान् है क्या जिससे मिलने के लिए किसी से परमिशन की जरुरत होती है? 
 राजनीतिक रूप  से देखे तो भागलपुर की यह पुलिसिया गुंडई सामंती सोच से लबरेज है।  सरकार वोट की राजनीति के तहत सरकार ने भूमिहीन दलितों को बसने -रहने के लिए जमीन के कागजात तो दे दिए लेकिन जमीं पर कब्जा नहीं दिया।  जमीन के कागज़ भूमिहीन के पास और जमीन पर कब्जा सामंतो के पास।  गजब का न्याय है भाई ! आंदोलनरत लोग वही कब्जा के लिए सरकार से गुहार लगा रहे थे।  जो फिलहाल सरकार के बुते की बात नहीं है। नीतीश की सरकार में जो लोग शामिल है और जिन जातियो की चलती है उनके पास ही अधिकतर भूमिहीनों की जमीन हड़पी गयी है।  सरकार महिला दमन के विरोध में सबसे पहले पुलिस , कलेक्टर, एसपी और एसडीओ को निलंबित करे और तत्काल जमीनों पर कब्जा दिलाये। अगर ऐसा नहीं होता है तो मान लीजिये कि नितीश की राजनीति ख़त्म होगी और बिहार में एक बार फिर जातीय-युद्ध की राजनीति शुरू होगी। 

Friday, February 3, 2017

दलितों

मूल रूप से पशु और मनुष्य में यही विशेष अन्तर है कि पशु अपने विकास की बात नहीं सोच सकता, मनुष्य सोच सकता है और अपना विकास कर सकता है।
हिन्दू धर्म ने दलित वर्ग को पशुओं से भी बदतर स्थिति में पहुँचा दिया है, यही कारण है कि वह अपनी स्थिति परिवर्तन के लिए पूरी तरह निर्णायक कोशिश नहीं कर पा रहा है, हां, पशुओं की तरह ही वह अच्छे चारे की खोज में तो लगा है लेकिन अपनी मानसिक गुलामी दूर करने के अपने महान उद्देश्य को गम्भीरता से नहीं ले रहा है।ऐसा क्यों है , दलितों की वास्तविक समस्या क्या है?इसे इस विश्लेषण के द्वारा समझा जा सकता है ………..
परम्परागत उच्च वर्ग द्वारा दलितों पर बेक़सूरी एवं बेरहमी से किए जा रहे अत्याचारों को कैसे रोका जाए,वर्तमान मे तो यही यही दलितों की मूल समस्या है।हज़ारों वर्षों से दलित वर्ग पर अत्याचार होते आए हैं, आज भी बराबर हो रहे हैं। यह अत्याचारों का सिलसिला कैसे शुरू हुआ और आज तक भी ये अत्याचार क्यों नहीं रुके हैं? यह एक अहम सवाल है।इतिहास साक्षी है कि इस देश के मूल निवासी द्रविड़ जाति के लोग थे जो बहुत ही सभ्य और शांति प्रिय थे। आज से लगभग पांच या छः हज़ार वर्ष पूर्व यूरेशियन आर्य लोग भारत आये और यहां के मूल निवासी द्रविड़ों पर हमले किए। फलस्वरूप आर्य और द्रविड़ दो संस्कृतियों में भीषण युद्ध हुआ। आर्य लोग बहुत चालाक थे। अतः छल से, कपट से और फूट की नीति से द्रविड़ों को हराकर इस देश के मालिक बन बैठे।इस युद्ध में द्रविडों द्वारा निभाई गई भूमिका की दृष्टि से द्रविड़ों को दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है। प्रथम श्रेणी में वे आते हैं जिन्होंने इस युद्ध में बहादुरी से लड़ते हुए अन्त तक आर्यों के दाँत खट्टे किये। उनसे आर्य लोग बहुत घबराते थे। दूसरी श्रेणी वे द्रविड़ आते हैं जो इस युद्ध में आरम्भ से ही तटस्थ रहे या युद्ध में भाग लेने के थेड़े बाद ही रास्ता बादल लिए अर्थात् लड़े नहीं।
यूरेशियन आर्यों ने विजय प्राप्त कर लेने के बाद युद्ध में भाग लेने वाले और न लेने वाले दोनों श्रेणी के द्रविड़ों को शुद्र घोषित कर दिया और उनका काम आर्यों की सेवा करना निश्चित कर दिया। केवल इतना फ़र्क़ किया कि जिन द्रविड़ों ने युद्ध में भाग नहीं लिया था उन्हें अछूत शूद्र घोषित कर शान्ति से रहने दिया। कोली, माली, धुना, जुलाहे, कहार, डोम आदि इस श्रेणी में आते हैं। लेकिन जिन द्रविड़ों ने इस युद्ध में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और इसके साथ ही उन्हें शूर वीरता का परिचय दिया उन मार्शल लोगों को अछूत-शूद्र घोषित कर दिया और इसके साथ ही उन्हें इतनी बुरी तरह कुचल दिया जिससे कि वे लोग हज़ारों साल तक सिर भी न उठा सके। उनके कारोबार ठप्प कर दिए, उन्हें गांव के बाहर ( दक्षिण टोला ) बसने के लिए मजबूर कर दिया और उन्हें इतना बेबस कर दिया कि उन्हें जीवित रहने के लिए मृत का मांस खाना पड़ा। जाटव, भंगी, चमार, महार, खटीक वग़ैरह आदि इसी श्रेणी के लोग हैं।किन्तु इस मार्शल श्रेणी के लोगों में से एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा बना जिसने यह तय कर लिया कि ठीक है हम युद्ध में हार गए हैं लेकिन फिर भी हम इन आर्यों की गुलामी स्वीकार नहीं करेंगं। वे लोग घोर जंगलों में निकल गए और वहीं पर रहने लगे। नागा, भील, संथाल, जरायु पिछड़ी जातियां आदि जंगली जातियां इसी वर्ग में आती हैं। जो आज भी आर्यों की किसी भी सरकार को दिल से स्वीकार नहीं करती हैं और आज भी स्वतंत्रतापूर्वक जंगलों में ही रहना पसन्द करती हैं।आर्य संस्कृति का ही दूसरा नाम हिन्दू धर्म या हिन्दू समाज है। ये आज बात तो शांति की करते हैं लेकिन हज़ारों वर्ष पूर्व हुए आर्य-द्रविड़ युद्ध में छल से हराए गए द्रविड़ संस्कृति के प्रतीक महाराजा रावण का प्रति वर्ष पुतला जला कर द्वेष भावना का प्रदर्शन करते हैं। आज भी वे शूद्रों को अपना शत्रु और गुलाम मानकर उन्हें ज़िन्दा जला डालते हैं, उनका क़त्ले आम करते हैं, उनके साथ तरह-तरह के अवर्णनीय लोमहर्षक अत्याचार करते हैं।इनके अतिरिक्त रोज़ाना ही अत्याचारों की ख़बरें छपती रहती हैं। बलछी, कफलटा, दिहुली, साढ़ूपुर आदि में हुए दिल दहलाने वाले काण्ड कभी भुलाए नहीं जा सकते हैं।देश में कोई ऐसा क्षण नहीं होगा जबकि दलित वर्ग पर अत्याचार नहीं होता होगा, क्योंकि अख़बार में तो कुछ ही ख़ास ख़बरें छप पाती हैं।
‘‘ये अत्याचार एक समाज पर दूसरे समर्थ समाज द्वारा हो रहे अन्याय और अत्याचार का प्रश्न है। एक मनुष्य पर हो रहे अन्याय या अत्याचारों का प्रश्न नहीं है, बल्कि एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग पर ज़बरदस्ती से किये जा रहे अतिक्रमण और जुल्म, शोषन तथा उत्पीड़न का प्रश्न है।’’इस प्रकार यह एक निरन्तर से चले आ रहे वर्ग कलह की समस्या है।इन अत्याचारों को कौन करता है? क्यों करता है? और किस लिए करता है? अत्याचारी अत्याचार करने में सफल क्यों हो रहा है? क्या ये अत्याचार रोके जा सकते हैं? अत्याचारों का सही और कारगर उपाय, साधन या मार्ग क्या हो सकता है? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिन पर दलित वर्ग को आज फिर से संजीदगी से विचार करना चाहिए।दलित वर्ग पर अत्याचार हिन्दू धर्म के तथकथित सवर्ण हिन्दू करते हैं और वे अत्याचार इसलिए नहीं करते कि दलित लोग उन का कुछ बिगाड़ रहे हैं बल्कि अल्पसंखयकों और दलितों पर अत्याचार करना वे अपना अधिकार मान बैठे हैं और इस प्रकार का अधिकार उन्हें उनके धर्म ग्रन्थ भी देते हैं।सवर्ण अपनी परम्परागत श्रेष्ठता क़ायम रखने के लिए अत्याचार करता है। जब दलित वर्ग परम्परागत उच्च वर्ग (हिन्दू) से व्यवहार करते वक्त बराबरी के, समानता के रिश्ते से बरताव रखने का आग्रह करता है तब यह वर्गकलह उत्पन्न होता है, क्योंकि ऊपरी वर्ग निचले वर्ग के इस प्रकार के व्यवहार को अपनी मानहानि मानता है। इस प्रकार सवर्ण अपनी परम्परागत श्रेष्ठता क़ायम रखने के लिए अत्याचार करता है। सवर्ण और दलित वर्ग के बीच यह एक रोज़ाना होने वाला ‘वर्गकलह’ है।जो दलित इंका मुक़ाबला नहीं कर पाया उसने धर्म परिवर्तित कर लिया और तब वह और इनके निशाने पर आ गया ।
किस तरह से इस वर्ग कलह से अपना बचाव किया जा सकता है। इसका विचार करना अत्यावश्यक है। इस वर्ग कलह से अपना बचाव कैसे होगा? इस प्रश्न का निर्णय करना मैं समझता हूँ मेरे लिए कोई असंभव बात नहीं है। आप सभी लोगों को एक ही बात मान्य करनी पड़ेगी और वह यह कि किसी भी कलह में, संघर्ष में, जिनके हाथ में सामर्थ्‍य होती है, उन्हीं के हाथ में विजय होती है, जिनमें सामर्थ्‍य नहीं है उन्हें अपनी विजय की अपेक्षा रखना फ़िज़ूल है । इसलिए तमाम दलित और अल्पसंखयक वर्ग को अब अपने हाथ में सामर्थ्‍य और शक्ति को इकट्ठा करना बहुत ज़रूरी है।
मनुष्य समाज के पास तीन प्रकार का बल होता है। एक है मनुष्य बल, दूसरा है धन बल, तीसरा है मनोबल। इन तीनों बलों में से कौन सा बल आपके पास है? मनुष्य बल की दृष्टि से आप अल्पयंख्यक ही नहीं बल्कि संगठित भी नहीं हैं। फिर संगठित नहीं, इतना ही नहीं, इकट्ठा भी तो नहीं रहते। दलित लोग गांव और खेड़ों में बिखरे हुए हैं इसी कारण से जो मनुष्य बल है भी उसका भी ज़्यादती ग्रस्त, ज़ुल्म से पीड़ित अछूत वर्ग की बस्ती को किसी भी प्रकार का उपयोग नहीं हो सकता है।धन बल की दृष्टि से देखा जाए तो आपके पास थोड़ा बहुत जनबल तो है भी लेकिन धन बल तो कुछ भी नहीं है। सरकारी आंकड़ों अनुसार देश की कुल आबादी की 55% जनसंख्याआज भी ग़रीबी की रेखा से नीचे का जीवन बिता रही है जिसका 90% दलित और अल्पसंखयक वर्ग के लोग ही हैं।
मानसिक बल की तो उससे भी बुरी हालत है। सैकड़ों वर्षों से हिन्दुओं द्वारा हो रहे ज़ुल्म, छि-थू मुर्दों की तरह बर्दाश्त करने के कारण प्रतिकार करने की आदत पूरी तरह से नष्ट हो गई है।ऐसे लोगों का आत्म विश्वास, उत्साह और महत्वकांक्षी होना, इस चेतना का मूलोच्छेद कर दिया गया है। हम भी कुछ कर सकते हैं इस तरह का विचार ही किसी के मन में नहीं आता है।
यदि मनुष्य के पास जन बल और धन बल ये दोनों हों भी और मनोबल न हो तो ये दोनों बेकार साबित हो जाते हैं। मान लीजिए आप के पास पैसा भी ख़ूब हो और आदमी भी काफ़ी हों, आपके पास बन्दूकें और अन्य सुरक्षा सामग्री भी उप्लब्ध हो लेकिन आपके पास मनोबल न हो तो आने वाला शत्रु आपकी बन्दूकें और सुरक्षा सामग्री भी छीन ले जाएगा। अतः मनोबल का होना परम आवश्यक है। मनोबल का जगत प्रसिद्ध उदाहरण आपके सामने है। ऐतिहासिक घटना है कल्पना की बीत नहीं। नेपोलियन एक बहुत साहसिक एवं अजेय सेनापति के रूप में प्रसिद्ध था, उसके नाम ही से शत्रु कांप उठते थे, लेकिन उसको मामूली से एक सैनिक ने युद्ध में हरा दिया था। विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि इस सैनिक ने यह कह कर उसे हराया था कि मैं नेपोलियन को अवश्य हराऊंगा क्योंकि मैंने उसे खेल के मैदान में हरा रखा है। और वास्तव में उसने नेपोलियन को हरा दिया। उस सैनिक ने उस महान शक्तिशाली अजेय कहे जाने वाले नेपोलियन को इसीलिए हरा दिया क्योंकि उसका मनोबल नेपोलियन के प्रति खेल के मैदान से ही बढ़ा हुआ था।
मनोबल की यह एक विशेषता है कि वह एक बार जब किसी के विरुद्ध बढ़ जाता है तो फिर उसका कम होना असंभव होता है। तभी तो नैपोलियन के पास वास्तविक भौतिक शक्ति एवं रण कौशल होने के बावजूद उसके विरुद्ध बढ़े मनोबल वाले एक मामूली से सैनिक ने उसे ऐलान करके हरा दिया। अतः यदि दलित और अल्पसंखयक वर्ग यह सोचे कि हम सिर्फ़ अपनी शक्ति के बल पर ही अत्याचारों का मुक़ाबला कर लेंगं तो यह उनकी भूल है। फिर हमें इस पहलू को हरगिज़ नहीं भूलना चाहिए कि सवर्ण हिन्दुओं का मनोबल हमारे विरुद्ध पहले से ही बहुत बढ़ा हुआ है। हम चाहें कितनी ही वास्तविक शक्ति अर्जित कर लें लेकिन वे तो यही सोचते हैं कि-हैं तो ये वे ही चमार, भंगी (या अछूत) ही है ,ये कर भी क्या सकते हैं? इसीलिए हमें मनोबल बढ़ाने की ज़रूरत है और यह उसी समय सम्भव है जब हम किसी बाहरी सामाजिक शक्ति की मदद लें जिसका मनोबल गिरा हुआ नही वरन् बढ़ा हुआ हो।
वास्तविक स्थिति का यह जो विश्लेषण किया गया है यदि यह वस्तुस्थिति है तो इससे जो सिद्धान्त निकलेगा उसको भी आप सब लोगों को स्वीकार करना होगा और वह यह है कि आप अपने ही व्यक्तिगत सामथ्र्य पर निर्भर रहेंगे तो आपको इस ज़ुल्म का प्रतिकार करना सम्भव नहीं है। आप लोगों कं सामथ्र्यहीन होने के कारण ही आप पर स्पृश्य हिन्दुओं द्वारा ज़्यादती, ज़ुल्म और अन्याय होता है इसमें मुझे किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं है।दलित की तरह यहां मुस्लिम भी अल्पसंख्यक हैं। किसी गांव में मुसलमानों के दो घर होने पर कोई स्पृश्य हिन्दू उनकी ओर आंख उठाकर भी नहीं देख सकता इसका भी कारण है ये दो घर भी एक जुट हैं तो बहुत है । आप (दलित-अस्पृश्य) लोगों के दस मकान होने पर भी स्पृश्य हिन्दू ज़्यादती, अन्याय और ज़ुल्म करते हैं। आपकी वस्तियां जला दी जाती हैं, आपकी महिलाओं से बलात्कार होता है। आदमी, बच्चे और महिलाओं को जि़न्दा जला दिया जाता है। आपकी महिलाओं, बहू और जवान बेटियों को नंगा करके गांव में घुमाया जाता है । यह सब क्यों होता है? यह एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है, इस पर आप लागों को गम्भीरता से चिन्तन और खोज करनी चाहिए। मेरी दृष्टि में इस प्रश्न का एक ही उत्तर दिया जा सकता है और वह यह है कि उन दो मुसलमानों के पीछे सारे भारत के मुसलमान समाज की शक्ति और सामथ्र्य है। इस बात की हिन्दू समाज को अच्छी तरह जानकारी होने के कारण उन दो घर के मुसलमानों की ओर किसी हिन्दू ने टेढ़ी उंगली उठायी तो पंजाब से लेकर मद्रास तक और गुजरात से लेकर बंगाल तक संपूर्ण मुस्लिम समाज अपनी शक्ति ख़र्च कर उनका संरक्षण करेगा। यह यक़ीन स्पृश्य हिन्दू समाज को होने के कारण वे दो घर के मुसलमान निर्भय होकर अपनी जि़न्दगी बसर करते हैं। किन्तु आप दलित अछूतों के बारे में स्पृश्य हिन्दू समाज की यह धारणा बन चुकी है और वाक़ई सच भी है कि आपकी कोई मदद करने वाला नहीं है, आप लोगों के लिए कोई दौड़ कर आने वाला नहीं है, आप लोगों को रुपयों पैसों की मदद होने वाली नहीं है और न तो आपको किसी सरकारी अधिकारी की मदद होने वाली है। पुलिस, कोर्ट और कचहरियां यहां सब उनके ही होने के कारण स्पृश्य हिन्दू और दलितों के संघर्ष में वे जाति की ओर देखते हैं, अपने कत्र्तव्यों की ओर उनका कोई ध्यान नहीं होता है कि हमारा कौन क्या बाल बांका कर सकता है। आप लोगों की इस असहाय अवस्था के कारण ही आप पर स्पृश्य हिन्दू समाज ज़्यादती, ज़ुल्म और अन्याय करता है। यहां तक जो विश्लेषण किया है उससे दो बातें सिद्ध होती हैं। पहली बात यह है कि बिना सामथ्र्य के आपके लिए इस ज़ुल्म और अन्याय का प्रतिकार करना संभव नहीं है। दूसरी बात यह कि प्रतिकार के लिए अत्यावश्यक सामथ्र्य आज आपके हाथ में नहीं है। ये दो बातें सिद्ध हो जाने के बाद तीसरी एक बात अपने आप ही स्पष्ट हो जाती है कि यह आवश्यक सामथ्र्य आप लोगों को कहीं न कहीं से बाहर से प्राप्त करना चाहिए। यह सामथ्र्य आप कैसे प्राप्त कर सकते हैं? यही सचमुच महत्व का प्रश्न है और उसका आप लोगों को निर्विकल्प दृष्टि से चिंतन और मनन करना चाहिए।
इस बात को ऐसे समझिए , जिस गांव में अछूत लोगों पर हिन्दू स्पृश्यों की ओर से ज़ुल्म होता है उस गांव में अन्य धर्मावलम्बी लोग नहीं होते हैं ऐसी बात नहीं है। अस्पृश्यों पर होने वाला ज़ुल्म बेक़सूरी का है, बेगुनाहों पर ज़्यादती है, यह बात उनको (अन्य धर्म वालों को) मालूम नहीं ऐसी कोई बात नहीं है, जो कुछ हो रहा है वह वास्तव में ज़ुल्म और अन्याय है यह मालूम होने पर भी वे लोग अछूतों की मदद के लिए दौड़कर नहीं जाते हैं, इसका कारण आख़िर क्या है? ‘तुम हमको मदद क्यों नहीं देते हो?’ यदि ऐसा प्रश्न आपने उनसे पूछा तो ‘आपके झगड़े में हम क्यों पड़ें ? यदि आप हमारे धर्म के होते तो हमने आपको सहयोग दिया होता’- इस तरह का उत्तर वे आपको देंगें और ऐसा उत्तर देना उनकी मजबूरी है ? इससे बात आपके ध्यान में आ सकती है कि किसी भी अन्य समाज के आप जब तक एहसानमंद नहीं होंगे किसी भी अन्य धर्म में शामिल हुए बिना आपको बाहरी सामर्थ्‍य प्राप्त नहीं हो सकता है। इसका ही स्पष्ट मतलब यह है कि आप लोगों का धर्मान्तर करके किसी भी समाज में अंतर्भूत हो जाना चाहिए। सिवाय इसके आपको उस समाज का सामर्थ्‍य प्राप्त होना सम्भव नहीं है। और जब तक आपके पीछे सामथ्र्य नहीं है तब तक आपको और आपकी भावी औलाद को आज की सी भयानक, अमानवीय अमनुष्यतापूर्ण दरिद्री अवस्था में ही सारी जि़न्दगी गुज़ारनी पड़ेगी। ज़्यादतियां बेरहमी से बर्दाश्त करनी पड़ेगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। बाबा साहब के इन विचारें से यह बात अपने आप साफ़ हो जाती है कि सामथ्र्य प्राप्त करने के लिए हमें किसी अन्य समाज का एहसानमंद अवश्य ही होना पड़ेगा किसी अन्य समाज में हमें अवश्य ही मिल जाना होगा। दलित वर्ग के जो लोग ऐसा समझते हैं कि वह स्वयं अपने संगठन और बाहूबल से ही अपनी समस्याएं हल कर सकते हैं वे सिर्फ़ यही नहीं कि ख़ुद धोखे और फ़रेब में हैं, बल्कि दलित समाज को भी ग़लत राह दिखा रहे हैं- ऐसी राह जो बाबा साहब के विचारों के बिल्कुल विपरीत है।
हिन्दू धर्म और समाज की ओर यदि सहानुभूति की दृष्टि से देखा जाए तो अहंकार, अज्ञान और अन्धकार ही दिखाई देगा। यही कहना पड़ेगा। इसका आप लोगों को अच्छा ख़ासा अनुभव है। हिन्दू धर्म में अपनत्व की भावना तो है ही नहीं। किन्तु हिन्दू समाज की ओर से आप लोगों को दुश्मनों से भी दुश्मन, गुलामों से भी गुलाम और पशुओं से भी नीचा समझा जाता है।हिन्दू समाज में क्या आपके प्रति समता की दृष्टि है?कुछ हिन्दू लोग अछूतों को कहते हैं कि तुम लोग शिक्षा लो, स्वच्छ रहो, जिससे हम आपको स्पर्श कर सकेंगे, समानता से भी देखेंगे। मगर वास्तव में देखा जाए तो अज्ञानी, दरिद्री और अस्वच्छ दलितों का जो बुरा हाल होता है वही बुरा हाल पढ़े-लिखे पैसे वाले और स्वच्छ रहने वाले तथा अच्छे विचार वाले दलितों का भी होता है।दलित वर्ग समृद्धि की पराकाष्ठा के प्रतीक तत्कालीन उपप्रधानमंत्री श्री जगजीवन रामजी को वाराणसी में श्री संपूर्णनन्द की मूर्ति का अनावरण करने पर जिस तरह से अपमानित होना पड़ा था उससे दलितों की आंखें खुल चुकी हैं कि हिन्दुओं का स्वच्छता के आधार पर समानता का बर्ताव करने का आश्वासन कितना बड़ा धोखा है। याद रहे, श्री जगजीवन राम जी द्वारा अनावरण की गई मूर्ति को गंगाजल से धोकर पवित्र किया गया था।
कुछ भाई अपने आर्थिक पिछड़ेपन ही को अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों का कारण मानते हैं। यह बात ठीक है कि ग़रीबी बहुत दुखों का कारण है लेकिन ग़रीब तो ब्राह्मण भी हैं, वैश्य भी हैं और क्षत्रिय भी हैं ग़रीबी से वे लोग भी परेशान हैं और वे ग़रीबी के विरुद्ध लड़ भी रहे हैं लेकिन हमें एक साथ दो लड़ाइयां लड़नी पड़ रही हैं- एक तो ग़रीबी की दूसरी घृणा भरी जाति प्रथा की। एक तरफ़ हम पर ग़रीबी की मार पड़ रही है और दूसरे हमारी एक विशेष जाति होने के कारण हम पिट रहे हैं। हमें जाति की लड़ाई तो तुरन्त समाप्त कर देनी चाहिए। हम भंगी, चमार, महार, खटीक आदि अछूत तभी तक हैं, जब तक कि हम हिन्दू हैं।क़ानून से आपको चाहे जितने अधिकार और हक़ दिए गए हों किन्तु यदि समाज उनका उपयोग करने दे तब ही यह कहा जा सकता है कि ये वास्तविक हक़ है। इस दृष्टि से देखा जाए तो आपको न मंदिर जाने की स्वतंत्रता है और न जीने की स्वतंत्रता है, यह आप भली-भांति जानते हैं। इसके समर्थन में अधिक तथ्य जुटाने की आवश्यकता नहीं है। यदि स्वतंत्रता की दृष्टि से देखा जाए तो हम अपने आपको एक गुलाम से भी बदतर हालत में ही पायेंगे। स्वतंत्रता, समानता एवं बन्धुत्व जो मनुष्य के विकास के लिए आवश्यक चीज़ें बताई गई हैं उनमें से आपके लिए हिन्दू धर्म में कोई भी उपलब्ध नहीं है।
आप मंथन कीजिये की क्या हिन्दू धर्म हमारे पूर्वजों का धर्म था?हिन्दू धर्म हमारे पूर्वजों का धर्म नहीं हो सकता है, बल्कि उन पर ज़बरदस्ती लादी गई एक गुलामी, दासता थी। हमारे पूर्वजों को इस धर्म में ही रखना यह एक ** क्रूर ख़ूनी पंजा** था जो हमारे पूर्वजों के ख़ून का प्यासा था। इस गुलामी से अपनी मुक्ति पाने की क्षमता और साधन उपलब्ध नहीं थे, इसलिए उन्हें इस गुलामी में रहना पड़ा। इसके लिए उन्हें हम दोषी नही ठहरायेंगे, कोई भी उन पर रहम ही करेगा। किन्तु आज की पीढ़ी पर उस तरह की ज़बरदस्ती करना किसी के लिए भी सम्भव नही है। हमें हर तरह की स्वतंत्रता है। इस आज़ादी का सही-सही उपयोग कर यदि इस पीढ़ी ने अपनी मुक्ति का तरस्ता नहीं खोजा, यह जो हज़ारों साल से ब्राह्मणी अर्थात हिन्दू धर्म की गुलामी है उसको नही तोड़ा तो मैं यही समझूंगा कि उनके जैसे, नीच, उनके जैसे हरामी और उनके जैसे कायर भी स्वाभिमान बेचकर पशु से भी गई गुज़ारी जि़न्दगी बसर करते हैं अन्य कोई नहीं होंगे। यह बात मुझे बड़े दुख और बड़ी बेरहमी से कहनी पड़ेगी।” बाबा साहब पृष्ठ 38.39” धर्म परिवर्तन करो जी बाबा साहब ने बहुत ही साफ शब्दों मे कहा यह बात की यदि आपको इंसानियत से मुहब्बत हो तो धर्मान्तर करो। हिन्दू धर्म का त्याग करो। तमाम दलित अछूतों की सदियों से गुलाम रखे गए वर्ग की मुक्ति के लिए एकता, संगठन करना हो तो धर्मान्तर करो। समता प्राप्त करनी हो तो धर्मान्तर करें। आज़ादी प्राप्त करना हो तो धर्मान्तर करो। मानवी सुख चाहते हो तो धर्मान्तर करो। हिन्दू धर्म को त्यागने में ही तमाम दलित, पददलित, अछूत, शोषित पीड़ित वर्ग का वास्तविक हित है, यह मेरा स्पष्ट मत बन चुका है। पृष्ठ 59 बाबा साहब डा. अम्बेडकर ने धर्मान्तर का मुख्य उद्देश्य स्पष्ट रूप से बाहरी शक्ति प्राप्त करना निश्चित किया था। इसे हमें कभी भी नही भूलना चाहिए, क्योंकि बाहरी शक्ति प्राप्त करने से ही दलित वर्ग पर होने वाले अत्याचारों को रोका जा सकेगा, बेइज़्ज़ातीपूर्ण जि़न्दगी से मुक्ति मिल सकेगी और हमें मिल जाएगा स्वतंत्र जीवन, सम्मानपूर्ण जीवन, इंसानियत की जि़न्दगी।
पाकिस्तान बनने के बाद सन् 1956 में बाबा साहब ने जब धर्म-परिवर्तन किया था, उस समय भारत में मुसलमानों की शक्ति तो थी ही नहीं, इसके अलावा उन दिनों हिन्दूओं के मन में मुसलमान या इस्लाम के नाम से ही इतनी घृणा थी। यदि हम लोग उस वक्त मुसलमान बनते तो हमें गांव-गांव में गाजर मूली की तरह काट कर फेंक दिया जाता। अतः यदि बाबा साहब 1956 में इस्लाम धर्म स्वीकार करते तो यह उनकी एक बहुत बड़ी आज़्माइश होती। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए उद्देश्य को पाने के लिए उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाकर अर्थात् भविष्य में बुद्धि से काम लेने का संकेत करके दलित वर्ग की मुक्ति का वास्तविक मार्ग खोल कर एक महान् कार्य किया था। लेकिन दुर्भाग्य की बात कि बाबा साहब अम्बेडकर दलित वर्ग को बौद्ध धर्मरूपी यह परम औषधि देकर केवल एक महीना 22 दिन ही 6 दिसम्बर सन्1956 को परलोक सिधार गए। इस प्रकार बाबा साहब अम्बेडकर यह देख ही नहीं पाए कि मैंने अपने इन लोगों को जो महाव्याधि से पीड़ित हैं, जो परम औषधि दी है वह इन्हें माफ़िक़ भी आयी या रिएक्शन कर रही है अर्थात् माफ़िक़ नहीं आ रही है।
बाबा साहब हमको हिदायत देने के लिए आज हमारे बीच मौजूद नहीं हैं। अब तो इस दलित वर्ग को स्वयं ही अपनी भलाई का विचार करना होगा। हम सबको मिलकर सोचना होगा कि जो बौद्ध धर्मरूपी परम औषधि हमने आज से लगभग बत्तीस वर्ष पूर्व लेनी प्रारम्भ की थी उसने हमारे रोग को कितना ठीक किया? ठीक किया भी है या नहीं? अथवा कहीं यह औषधि रिएक्शन तो नहीं कर रही है अर्थात् उल्टी तो नहीं पड़ रही है? क्या ऐसा मूल्यांकन करने का समय आज 32 वर्ष बाद भी नहीं आया है? निश्चित रूप से हमें मुल्यांकन करना चाहिए।
बोद्ध धर्म अपना कर हम अपने उद्देश्य में कितने सफ़ल हुए हैं? इस सम्बन्ध में बाबा साहब द्वारा निर्धरित किसी भी धर्म को अपनाने का उद्देश्य दलित वर्ग को बाहरी शक्ति प्राप्त करना होना चाहिए। इस प्रकार दलित वर्ग द्वारा बौद्ध धर्म अपनाने का उद्देश्य बाहरी शक्ति प्राप्त करना था। अतः हमें यह देखना है कि बौद्ध धर्म अपनाने से दलित वर्ग में बाहरी शक्ति कितनी आई? कुछ आई भी या बिल्कुल भी नहीं आई? या इस धर्म को अपनाने से हमारी मुल शक्ति में भी कुछ कमी आ गई है?
हम पाते हैं कि बौद्ध धर्म अपनाने से दलितों के अन्दर किसी प्रकार की कोई भी बाहरी शक्ति आई नहीं बल्कि उसकी मूल शक्ति में भी कमी आ गई है। सर्वप्रथम तो दलित वर्ग को जितनी बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म अपनाना चाहिए था उतनी बड़ी जनसंख्या द्वारा नहीं अपनाया गया और इसलिए नहीं अपनाया गया कि दलित समाज अधिकतर अशिक्षित समाज है। बौद्ध धर्म कहता है कि कोई ईश्वर, अल्लाह आदि नहीं है। यह बात अभी तक अच्छे पढ़े लिखे लोगों की भी समझ में नहीं आती। वह किसी न किसी रूप में ईश्वर या अल्लाह की सत्ता को स्वीकारते हैं, तब यह बात अनपढ़ अशिक्षित लोगों की समझ में कैसे आ सकती है कि ईश्वर या अल्लाह है ही नहीं। यही सबसे बड़ा कारण है जिसकी वजह से दलित वर्ग की बड़ी संख्या ने इस धर्म को नहीं अपनाया। अगर अपनाया है तो दलित वर्ग के छोटे हिस्से ने। सत्य तो यह है कि बौद्ध धर्म केवल चमार या महार जाति की कुल जनसंख्या की मुश्किल से 20 प्रतिशत ने ही अपनाया है। और उनकी भी स्थिति यह है कि जो 20 प्रतिशत बौद्ध बने हैं वे 80 प्रतिशत चमारों को कहते हैं कि ये ढेढ़ के ढेढ़ ही रहे। और 80 प्रतिशत चमार जो बौद्ध नहीं बने हैं वे कहते हैं कि ये बुद्ध-चुद्ध कहां से बने हैं?
इस प्रकार पहले जो चमारों की भी शक्ति थी वह भी 20 और 80 में ऐसा भी नहीं रहा क्योंकि बौद्ध और चमारों के बीच संघर्ष भी हुए हैं। इस प्रकार बौद्ध धर्म अपनाने से दलित वर्ग की शक्ति घटी है, बढ़ी नहीं, जबकि उद्देश्य था, बाहरी अतिरिक्त शक्ति प्राप्त करना।
अब हम उन दलितों की स्थिति पर गौर करें जिन्होंने बौद्ध अपना लिया है। क्या उनमें कुछ बाहरी शक्ति आ गई है? बिल्कुल नहीं। केवल इतना हुआ कि जो पहले चमार थे वे अब अपने को बौद्ध कहने लगे। लेकिन कुछ भी कहने मात्र से तो शक्ति आती नहीं। इस देश में पुराने बौद्ध जो हैं ही नहीं कि उनकी शक्ति इन नव बौद्धों में आ गई हो और दोनों मिलकर एक ताक़तवर समाज बना लिया हो। दूसरे बौद्ध देशों ने भी नव बौद्धों की मदद में अपनी कोई रुचि नहीं दिखाई है। और यदि बौद्ध देश मदद करना भी चाहें तो कैसे करेंगे? ज़्यादा से ज़्यादा भारत सरकार को एक विरोध-पत्र लिख भेजेंगे कि भारत में बौद्धों पर अत्याचार मुनासिब नहीं है। क्या उस विरोध-पत्र से काम चल जाएगा . । सोचिए सोचिए मंथन कीजिये संगठित हो जाइए बगल मे अब दूसरी ताकत तैयार है मिलकर संघर्ष कीजिये …मंज़िल आपकी है !!!!!!!
जारी है-जारी है
अभी लड़ाई जारी है।
यह जो छापा तिलक लगाए और जनेऊधारी है
यह जो जात पॉत पूजक है यह जो भ्रष्टाचारी है
यह जो भूपति कहलाता है जिसकी साहूकारी है
उसे मिटाने और बदलने की करनी  तैयारी है।

यह जो तिलक मांगता है, लडके की धौंस जमाता है
कम दहेज पाकर लड़की का जीवन नरक बनाता है
पैसे के बल पर यह जो अनमेल ब्याह रचाता है
यह जो अन्यायी है सब कुछ ताकत से हथियाता है
उसे मिटाने और बदलने की करनी तैयारी है।

यह जो काला धन फैला है, यह जो चोरबाजारी है
सत्ता पाँव चूमती जिसके यह जो सरमाएदारी है
यह जो यम-सा नेता है, मतदाता की लाचारी है
उसे मिटाने और बदलने की करनी तैयारी है।
जारी है-जारी है
अभी लड़ाई जारी है।

हरियाणा में दलित महिला उत्पीड़न

दलित महिलाओं पर अत्याचार और बलात्कार की रूह कंपा देने वाली घटनाओं के कारण हरियाणा एक बार फिर देश-दुनिया में शर्मसार है, जोकि बेहद चिंता एवं विडम्बना का विषय है। तीन साल पहले सामूहिक बलात्कार की शिकार भिवानी की एक छात्रा को 50 लाख रूपये में समझौता न करने पर फिर से आरोपियों द्वारा रोहतक में सामूहिक दुष्कर्म करने की हृदय विदारक घटना ने हर किसी को दहलाकर रख दिया है और महिला सुरक्षा व कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार तीन साल पहले भिवानी में पाँच दरिन्दों ने छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार किया था। तब से बलात्कारी उनसे 50 लाख रूपये लेकर समझौता करने और मुकदमा वापिस लेने का कई बार दबाव बना चुके थे। लेकिन, जब वे डराने व दबाव बनाने के हर प्रयास में नाकाम रहे तो उन्होंने छात्रा को पहले जैसा हाल करने की धमकी तक दे डाली। इस बीच छात्रा ने रोहतक के एक काॅलेज में एमकाॅम में दाखिला ले लिया और किराए के कमरे मंे रहने लगी। गत 13 जुलाई, 2016 को कार में आए पाँचों आरोपियों ने छात्रा का काॅलेज के बाहर से अपहरण करके शहर से बाहर ले जाकर फिर से सामूहिक दुष्कर्म का घिनौना कृत्य किया। उसके बाद उसे झाड़ियों में फेंककर भाग गए। बाद मंे लोगों ने उन्हें फटे कपड़ों में बेहद नाजुक व बेसुध स्थिति में देखा तो उसे पीजीआई पहुंचाया गया। मामला संज्ञान में आने के बावजूद पुलिस प्रशासन ने गम्भीरता नहीं दिखाई और लीपापोती की पूरी कोशिश हुई। एक सप्ताह बाद जब सामाजिक संगठनों ने सड़क पर उतरकर विरोध दर्ज करवाया और राजनीतिकों द्वारा दलित उत्पीड़न के मामले में प्रदेश सरकार को घेरा गया तो प्रशासन, पुलिस और सरकार हरकत में आई और तमाम वे सब कार्यवाहियां शुरू कीं, जोकि मामला संज्ञान मंे आते ही शुरू हो जानी चाहिए थीं। इस मामले की गूंज देश की संसद से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक पहुंची है और देश व प्रदेश को भारी शर्मिन्दगी उठानी पड़ी है।
यह घटना कोई अपवाद भर नहीं है, बल्कि प्रदेश में दलित महिलाओं के साथ हो रहे घोर अत्याचारों की एक नई कड़ी भर है। इससे पहले घटी घटनाओं की एक लंबी फेहरिस्त है। गत, 3 जून, 2016 को घरों में साफ-सफाई करके गुजारा करने वाली रोहतक की बाबरा मोहल्ले की दलित महिला नीतू संदिग्ध परिस्थितियों में लापता हुई और उसकी लाश 12 जून को बुरी हालत में सैक्टर तीन-चार के बीच खाली प्लाट में बरामद हुई। पोस्टमार्टम के दौरान पता चला कि इस जघन्य हत्याकाण्ड की शिकार दलित महिला के प्राईवेट पार्ट को कुत्तों ने नोंच खाया था, जिससे महिला के साथ बलात्कार की पुष्टि नहीं हो पाई। इस घटना के विरोध में दर्जनों सामाजिक संगठनों द्वारा सड़कों पर उतरकर धरने-प्रदर्शन जारी हैं, लेकिन पुलिस आज तक दलित महिला की हत्या का सुराग लगाने में कामयाब नहीं हो पाई है। एक अन्य रौंगटे खड़ा कर देने वाली घटना के तहत रोहतक जिले के कलानौर में स्कूल से लौट रही पहली वर्ष की नन्हीं मासूम बच्ची को खेरड़ी निवासी नौंवी कक्षा में पढ़ने वाले दरिन्दे छात्र ने अपनी हैवानियत का शिकार बना डाला। बेहद नाजुक हालत में नन्हीं बच्ची पीजीआई रोहतक में इस कद्र सदमें में है कि माँ के अलावा किसी भी व्यक्ति की परछाई पड़ती है तो बुरी तरह चीख उठती है। डाॅक्टर भी बच्ची की इस हालत को देखकर बेहद दुःखी एवं व्यथित हैं।
वर्ष 2014 में हिसार जिले के गाँव भगाना की चार दलित लड़कियों के साथ हुए गैंगरेप का मामला भी राष्ट्रीय सुर्खियों में आया था। 25 मार्च, 2014 को रात आठ बजे दबंग जाति के लोगों ने चार दलित परिवार की लड़कियों को घसीटकर कार में डाल लिया और दो दिन तक दर्जन भर युवक गैंगरेप करते रहे। प्राप्त जानकारी के अनुसार ये पीड़िताएं उन दलित परिवारों की थीं, जिनका गाँव के दबंग लोगों ने वर्ष 2011 से जमीन विवाद के चलते सामाजिक बहिष्कार कर रखा था और न्यायालय, मानवाधिकार आयोग एवं अनसूचित जाति आयोग के निर्देशों के बावजूद इस बहिष्कार तक समाप्त नहीं किया गया था। पीड़ित परिवार ने बहिष्कार के बावजूद गाँव नहीं छोड़ा तो गुस्से से भन्नाये दबंगों ने दलित परिवारों को सबक सिखाने के लिए उनकी चार बेटियों के साथ गैंगरेप के कुकत्र्य को अंजाम दे डाला।
25 अगस्त, 2013 को जीन्द जिले के गाँव बनियाखेड़ा की 19 वर्षीया डीएड दलित छात्रा का दुष्कर्म के बाद हत्या करके नहर के समीप झाडियों में फेंका गया शव मिला। जब पीड़ित पक्ष पुलिस की लापरवाही के खिलाफ सडकों पर उतरा तो उन पर बड़ी बेरहमी से लाठीचार्ज किया गया। अपै्रल, 2013 में भिवानी जिले के रिवासा गाँव में नन्ही बच्ची को दूध पीला रही दलित महिला के साथ दबंगों के सामूहिक बलात्कार करने की शर्मनाक घटना घटी। फरवरी, 2013 में हिसार जिले के सिरसाना गाँव में 13 साल की मासूम बच्ची के साथ कई दबंगों द्वारा सामूहिक बलात्कार जैसा घिनौना कुकत्र्य करने का मामला प्रकाश में आया। फरवरी, 2013 में भिवानी जिले के रत्तेरा गाँव में दबंगों ने एक दलित युवक की घुड़चढ़ी नहीं 3 नवम्बर, 2012 को हिसार के डाया (मंगाली) गाँव में एक दलित लडकी के साथ गैंगरेप किया गया और मामले में बलात्कार की दफा 376 तक हटा दी गई। अक्तूबर, 2012 में जीन्द जिले के सच्चाखेड़ा गाँव में पाँच दबंगों ने एक दलित लडकी के साथ सामूहिक बलात्कार किया। बाद में सभी दोषियों को सजा न मिलने से आहत होकर पीड़िता ने आत्महत्या कर ली। सितम्बर, 2012 में हिसार जिले के डाबड़ा गाँव में दबंगों ने एक दलित लडकी को गैंगरेप का शिकार बनाया। घटना से आहत पीड़िता के पिता ने आत्महत्या कर ली।
ये सब घटनाएं तो सिर्फ बानगी भर हैं। यदि सभी मामलों की सूची तैयार की जाए तो एक लंबी फेहरिस्त तैयार हो जायेगी। सभी मामलों का यदि बारीकी से अवलोकन किया जाए तो हर किसी की रूह कांप उठती है। बेहद विडम्बना का विषय है कि हरियाणा जैसे पावन एवं प्रगतिशील प्रदेश में इस तरह की अनेक घटनाएं निरन्तर घट रही हैं और पुलिस प्रणाली एवं कानून व्यवस्था पर निरन्तर गहरे सवालिया निशान लगा रही हैं। आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक वर्ष जून, 2015 से जून, 2016 के बीच 520 दुष्कर्म की घटनाएं घटी हैं और औसतन हर महीने 43 महिलाओं की इज्जत लुटी गई। इसके साथ ही छेड़खानी के 863 मामले और 801 महिलाओं के अपहरण के मामले दर्ज हुए हैं। प्रदेश में वर्ष 2009 में दलित महिलाओं के विरूद्ध अत्याचारों की 1346 शिकायतें दर्ज हुईं, जोकि वर्ष 2014 में बढ़कर 2233 हो गईं। इन आंकड़ों की गम्भीरता को सहज समझा जा सकता है।
        हरियाणा में अक्तूबर, 2012 में चले बलात्कार के अनवरत सिलसिले से खफा होकर राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष पी.एल. पूनिया ने हरियाणा को ‘बलात्कार प्रदेश की संज्ञा देने को विवश होना पड़ा था। बेहद विडम्बना का विषय है कि यह स्थिति जस की तस है। गौर करने लायक बात तो यह है कि दलितों पर जब भी कोई अत्याचार होता है तो उस घटना को दबाने की भरसक कोशिश की जाती है। जिन मामलों पर सियासत गर्म होती है, उन्हीं मामलों में पीड़ित दलितों की सुध ली जाती है। शेष मामलों में पीड़ित दलित अन्याय एवं अव्यवस्था के आगे घुटने टेकने को विवश हो जाते हैं। यह परिपाटी बेहद चिंताजनक एवं विडम्बनापूर्ण है। जब तक यह परिपाटी नहीं बदलती है, तब तक दलितों की स्थिति में सुधार आना असंभव लगता है।

Thursday, February 2, 2017

किसी समाज का विकसित होना इस बात पर निर्भर करता है

समाजों के विकास की अवधारणा व्यक्तिगत विकास की अवधारणा से अलग होती है | किसी समाज का विकसित होना इस बात पर निर्भर करता है की सामूहिक रूप से उस समाज का स्वरुप क्या है | उस समाज में सामूहिक हितसाधना के लिए क्या व्यवस्था है और समाज की प्रमुख संस्था किस प्रकार सार्वजानिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और शेक्षणिक गतिविधियों के कार्य निष्पादित करती है| समाज के लोगों का समाज में क्या योगदान है |
प्रत्येक व्यक्ति अपने समाज के विकास में योगदान देने को तत्पर रहता है लेकिन कोई अकेला व्यक्ति अपने संसाधनों से समाज विकास नहीं कर सकता | लेकिन ऐसे बहुत से व्यक्तियों द्वारा सामूहिक प्रयासों से समाज में बदलाव लाया जा सकता है | जब हम बदलाव की बात करते है तब इसका मतलब किसी बहुत बड़े बदलाव से ही हो ऐसा आवश्यक नहीं होता | ये बदलाव बहुत छोटे पर महत्वपूर्ण हो सकते हैं उदहारण के लिए समाज में होने वाले कार्यक्रम: अगर समाज में बच्चों को प्रोत्साहित करने वाले कार्यक्रम हो, अगर समाज में लोगों की वास्तविक समस्याओं को समझने के लिए वैचारिक और सार्थक बहस हो अथवा समाज के लोगों के रोजगार के साधनों को बढ़ने के सम्बन्ध में चर्चाएँ हो तब ऐसे छोटे छोटे कार्यक्रम समाज में बहुत बड़े बदलाव लाते हैं | ये छोटे छोटे कार्यक्रम लाखों रुपयों को खर्च कर के किये जाने वाले भंडारों से ज्यादा जरूरी है लेकिन ऐसे कार्यक्रम करने के लिए समाज की व्यवस्था इस तरह के कार्यों के अनुकूल होनी आवश्यक है |
यह समाज के लोगों की जिम्मेदारी है की वे अपने समाज को सही दिशा में ले जाने के लिए प्रयास करें | हमें पूर्वाग्रहों को छोड़ कर ऐसे कार्यक्रमों को सहयोग देना चाहिए जिससे समाज में सार्थक विमर्श को प्रोत्साहन मिले और हम अपने बच्चों के भविष्य के लिए बेहतर समाज का निर्माण कर सकें | ये व्यक्तिगत प्रयसों से संभव नहीं हो सकता इसके लिए समाज की संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती हैं | हमारे समाज में यूँ तो कई संस्थाएं काम कर रही हैं लेकिन ज्यादातर ध्यान केवल भंडारों पर ही केन्द्रित है | समाज में धार्मिक अनुष्ठान और भंडारे बहुत आवश्यक है लेकिन केवल इनसे समाज की समस्याओं के समाधान नहीं मिल सकते |
हमारे समाज में कई समस्याएँ है जिनका निदान बहुत आवश्यक है लेकिन इन समस्याओं के निदान के लिए गंभीर प्रयत्न होते दिखाई नहीं देते | लोग समस्याएँ गिनवाते समय बहुत जोश और उर्जावन हो जाते हैं लेकिन इनके समाधान सुझाने में किसी की रूचि नहीं है | लोग सोचते हैं की समाज का कुछ नहीं हो सकता क्यूँ की जो समस्याएँ आज हैं वह बरसों से हैं और बरसों रहेंगी | सच है की समस्याएँ बरसों से हैं लेकिन हमें यह सोचना चाहिए की क्या किसी ने इन समस्याओं के सुधारने के प्रयास किये या नहीं ?
क्या कभी उन समस्याओं पर किसी ने कोई सही मंच पर बहस की या नहीं क्यूँ कि केवल चोपालों पर बेठ कर मनोरंजन के लिए बहस करने से कोई हल नहीं होती इसके लिए लोगों को सार्थक प्रयास करने होंगे तभी हम एक मजबूत समाज बना पाएंगे |
बधाइयाँ समस्त समाज को, सभी जागरूक युवक युवतियों को, समस्त आदरणीय बुजुर्गों को, समस्त बच्चों को की आपके प्रयासों का है ये असर आज आप के हक़ की आवाज को समाज की पंचायत ने अमली जामा पहना दिया | अधिक से अधिक लोग जल्द से जल्द समाज की पंचायत के सदस्य बनें और अपने समाज को अपने हिसाब से नया, आधुनिक, विकासशील, उन्नत समाज बनाने में भागिदार बनें |
संस्था जाग्रति और रक्त सेतु के युवाओं को एवं बगीची विकास समिति के सभी सदस्यों को जिनमे युवक और बुजुर्ग भी शामिल हैं उनके अथक प्रयासों के लिए धन्यवाद | हैहैयवंशी कसेरा समाज समिति और कसेरा समाज पंचायत को धन्यवाद आपके प्रयासों के बगेर यह संघर्ष अधुरा ही था| हमारे आदरणीय सिंह जी वर्मा का बहुत आभार आपके प्रयासों और समर्थन के बिना यह स्वर्णिम अवसर आ ही नहीं सकता था

सामूहिक विवाह की कहानी

सुबह की करारी धूप सड़क के नुक्कड़ पर फैली हुई है। सभी गाड़ियों के हॉर्न पूरे माहौल में गूंजने लगे। तभी हॉर्न की आवाज़ को चीरती एक ज़ोरदार आवाज़ आई “आप सभी का स्वागत है, यहां आने के लिए आपका धन्यवाद!” गेट का गाजरी व पीला रंग धूप में निखर रहा है। मेले की रातें याद आ गई। उस आदमी की आवाज़ की और ऊंची होने लगी। नीचे ज़मीन पर चारों तरफ़ भूरे रंग की मिट्टी फैली हुई है, जो हवा के साथ मिलकर नाच रही है।
आसमान के नीचे कई परिवारों व लड़कियों के अरमान पूरे होने में अभी वक़्त है। मेहमानों व दुल्हनों की आवाजाही लगी हुई है। क़तार से सोलह पंडाल सजे हुए हैं, जिन पर ‘दुल्हन व दूल्हे’ का नाम लिखा है। उसी के नीचे ‘कन्यादान महादान’, ‘आपका आर्शीवाद चाहिए’ जैसी लाइनें बड़े ही करीने से लिखी हैं। उसी के ऊपर पता, पिता का नाम, माता का नाम – जैसी जानकारियां लिखी हुई हैं। मेहमान दुल्हे के आने का इंतज़ार कर रहे हैं।
तीन तरफ़ से बंद टेंट से बनी जगह कमरे से कम नहीं लग रही है। नीचे लाल रंग का कारपेट बिछा हुआ है। पीछे की तरफ़ ‘कंट्रोल रूम’ भी है, जिसके अंदर पंडित की खातेदारी और खातिरदारी, दोनों की जा रही है। पंडालों के बीच में ‘पूजा कक्ष’ है। दुल्हन, जो अपने घर से बिना सजे आई थी, को सजाने के लिए एक मेकअप टीम भी थी।
नीले व सफेद रंग का लहंगा पहन कर दुल्हन बाहर निकली। उम्र बाईस-तेईस साल की लग रही है। चेहरे पर शर्म के साथ ख़ुशी भी झलक रही है। उसे थामे परिवार की लड़कियां उसे पंडाल की तरफ़ ले चली। दुल्हन कभी चोरी से आंखें उठा पूरे माहौल को देख रही है, तभी उसकी दोस्त कहती है कि आगे चल, यह हमारा पंडाल नहीं है। वह मुस्कुराते हुए बोलती है, “तुम तो मुझे भगाते हुए ले जा रही हो।” तभी उसके बायीं तरफ़ चल रही लड़की अपनी लटों को संभालते हुए बोली, “अभी तो हम घूम सकते हैं!” तभी दुल्हन ने दबे होठों से कहा, “एक आइडिया है, क्यों न हम पंडाल खोजने के बहाने घूम लें।”
सामने की तरफ़ के टेंट से सफेद सा चेहरा बनाकर नीले-सफ़ेद लहंगे में एक लड़की आई, आंखें सुरमे से भरी है। होंठ लाल लिपिस्टिक से सजे हुए, उसी के पीछे-पीछे एक लड़का हाथों में बांसुरी लिए चल रहा है, जिसके सिर पर मोर पंख सजा है। वह पंख चलती हवा के रूख के साथ उड़ता चला जा रहा है। माहौल में कृष्ण भक्ति के गाने सुरीली धुन में बजने लगे। पहले राधा के बोल बजने लगे, “मैं बरसाने की छोरी न कर मोसे बलजोरी…” इसी बोल पर लहंगा पहनी लड़की अपने ठुमके लगाने लगी, उसके पीछे कृष्ण के बोल भी माहौल में पैर पसारने लगे “तोसे बांधूं प्रीत की डोरी, करता खेल नहीं…।”
गाना जैसे ही ख़त्म हुआ तो पूजा कक्ष से एक और राधा-कृष्ण की जोड़ी बाहर निकल आई। गाने के बोल तेज़ आवाज़ में बजने लगे। कैमरा लिए दो आदमी आस-पास को रिकॉर्ड कर रहे हैं। जनता टच स्क्रिन फ़ोन लिए वीडियो बनाने लगी। कृष्ण बिंदास होकर नाचने लगे, बांसुरी को घुमाकर, आँखें मटकाते कभी कूद कर राधा के दायें जाते तो कभी बायें।
पंडालों के सामने सभी के नाम सुनहरे अक्षरों में लिखे थे। पहले पंडाल पर लिखा था ‘सौ0 सागर’ और ‘चि0 रश्मि’। दुल्हन तैयार होकर सिर से पैर तक सजी हुई है। वह शर्माकर अपनी माँ से कह रही है, “मेरा काजल तो नहीं फैला है?” “नहीं बेटा सब ठीक है।” आसपास उसकी बहनें व रिश्तेदार अपने में ही बातचीत कर रहे हैं। अगले पंडाल में पता ही नहीं चल रहा है कि दुल्हन कौन है? तीन-चार लड़कियों ने लाल रंग का जड़ा लहंगा पहना हुआ है। सबके चुन्नी से ढके सिर, काजल से भरी आँखें, लिपिस्टिक से सजे होंठ! तभी एक लड़की से बगल में बैठी तीन-चार लड़कियों बोली, ‘दुल्हा…?’  यह सुन कर बीच में बैठी लड़की खुशी से उछलने लगी। उसके बग़ल में बैठी लड़की ने कहा, ‘दुल्हा अभी तक नहीं आया!’ ‘ओह, अफसोस!’ वही लड़की उसे चिढ़ाने लगी, बीच वाली लड़की ही दुल्हन है। उसका लाल लहंगा जिस पर जड़े सफेद चमकते मोती धूप की रोशनी से अपनी चाँदनी बिखेर रहे हैं।
तीसरे पंडाल में एक लड़की की आँखें पूरी तरह सजी हुई हैं। नीचे लाल व गुलाबी रंग का लहंगा, सफेद सितारों से सजा है। वह कृष्ण भक्ति के चलते गानों पर ठुमके लगाने लगी। शायद यह पहली दुल्हन होगी जो अपनी शादी के दिन भी नाच रही है।
पंडाल में लोगों व दुल्हनों की बातों का शोर सुनाई पड़ने लगा। अंत के पंडाल के पोस्टर पर एक नाम लिखा था- ‘जन्नति ख़ातून’ और ‘अरबाज़ ख़ान’। माइक पर आवाज़ें सुनाई दी “तो वह वक़्त आ गया है, जिसका लड़की वालों को इंतज़ार था। लड़के वाले व दुल्हे गेट के नजदीक आ चुके हैं, कृपया लड़की वाले दूल्हे का स्वागत करने के लिए तैयार हो जाएं!”
मैदान के गेट पर आतिशबाजी की आवाज़ें सुनाई देने लगी। आसमान में जलते बम-पटाखे हल्के-हल्के चमकते दिखाई दे रहे थे। गेट पर बैंड वालों का झुंड न जाने कौन-कौन से साज बजाने में लगे थे। पंडालों के अंदर बैठे सभी मेहमान दुल्हे राजा को देखने व पंडाल में लाने के लिए बाहर निकल आए। पंडालों में थी तो सिर्फ़ दुल्हनें जो अपने होने वाले दुल्हे के लिए पलकें बिछाए बैठी थी।
नज़रें व कान उस बारात की भीड़ में कहीं खो गए। इक्कीस दुल्हनों के इक्कीस दूल्हे बाहर घोड़ी के बढ़ते एक-एक कदम की दूरी को नज़दीक से देख रहे थे। आगे बैंड वाले क़तार में लगे हैं, उनके पीछे पहला दूल्हा गोल्डन पगड़ी पहने है, जिस पर चमकीला गोल हीरे जैसा लगा है। इसी तरह अन्य बीस दूल्हे क़तार में लगे हैं।
भीड़ देख एक पल तो ऐसा लग रहा है कि आज इक्कीस राज्यों के राजा एलान-ए-जंग में अपनी पूरी सेना के साथ जंग करने के लिए बिल्कुल तैयार हैं। बैंड वालों के हाथ में ढोल की जगह भाले, तलवार, धनुष या युद्ध में इस्तेमाल होने वाले हथियार के होने का आभास करा रहे हैं।
ज़्यादातर दूल्हों का चेहरा सेहरे से छुपा हुआ था। एक दूल्हा शेरवानी भी पहना हुआ है। पूरे पंडाल में अकेली बैठी जन्नति काले से कपड़े को सिर से लेकर घुटनों तक ढकी थी। उसकी सुरमा भरी आँखें ही दिखाई पड़ रही थी कि तभी दो औरतें आईं और उसके सामने जा खड़ी हुई। जब वह औरतें वहां से हटी तो देखा कि काले रंग के बुर्के के पीछे गुलाबी रंग की चुन्नी थी जिससे सिर ढका था। गुलाबी रंग के सूट पर छोटे-छोटे चमकीले तारे जड़े हुए थे। वह अपनी आँखें मटकाते हुए यहां-वहां देखने लगी। कुछ ही मिनटों में ख़ाली पंडाल आवाज़ों से गूँजने लगा।
धीरे-धीरे लड़के वालों व मेहमानों का जत्था वहां पहुंचा, तभी भीड़ से एक आदमी दाढ़ी को ताव देते हुए जन्नति ख़ातून के बीच में पड़े पर्दे के साइड में रखी कुर्सी पर जा बैठा। लड़की वाले लड़की की साइड में पहुंच गए और लड़के वाले लड़के की साइड में। भीड़ में सबसे आगे बैठे बुजुर्ग आये और कंधे पर टंगे सफेद थैले को संभालते हुए कुर्सी पर बैठ गए। वह अपने गले में टंगे चश्मे को नाक पर चढ़ाते हुए ठुड्डी से गले तक लटकी दाढ़ी को सहलाते हुए बोले, ‘अरबाज ख़ान’। वह लड़का उनकी तरफ़ देखते हुए बोला, ‘जी काजी हुजूर!’ काजी ने अपने थैले से कुरान शरीफ़ निकाली और उनके हाथ पेज़ पलटने में मशरूफ़ हो गए। एक पेज निकाला जिस पर हिन्दी में बड़ा-बड़ा लिखा था ‘निकाहनामा’ बाकी नीचे की तरफ़ उर्दू के शब्द लिखे थे।
काज़ी चेहरे को ऊपर करते हुए बोले, “मिठास की प्राकृतिक मिठाइयां पेश की जायें!” तभी भीड़ से दो औरतें कान के पीछे पल्लू को टिकाये निकल कर आईं और एक थाल जिस में कई तरह की मीठी चीज़ें तहज़ीब से रखी हुयी थीं, जैसे मिश्री, सौंफ, छोटी इलायची, बादाम आदि। उस थाल को उठाकर काजी के सामने पेश किया गया। तभी काज़ी बोले, “हाज़रीन कुरान के मुआवज़े के मुताबिक आज का यह दिन जश्न मनाने का है। आज के दिन बेटी जन्नति का निकाह बेटे अरबाज ख़ान के साथ हो रहा है। क्या जन्नति को ये निकाह कबूल है?” उनके इतना कहते ही सब उसकी ओर देखने लगे। वह चेहरा नीचे किए हुए बोली, “कबूल है!” “मुबारक हो” लड़की ने निकाह कबूल कर दिया अब अरबाज़ ख़ान से पूछा कि “आपको यह निकाह कबूल है?” “हां” कहते ही लड़के वाले लड़की वालों से गले मिलकर बोले ‘मुबारक हो-मुबारक हो’।
दोनों पक्षों ने हामी भर ली है, अब तो जश्न होना तय है। खामोश माहौल अचानक शोरगुल में तब्दील हो गया, तभी काजी एक औरत से बोले, “इस मौक़े पर कुदरती मिठाई सबको बाँट दी जाए!”
उसके बगल वाले टैंट में वरमाला डाली जा चुकी थी। दूल्हा-दुल्हन के हाथों में तोहफ़े दिए जा रहे हैं। दूल्हे ने सेहरे वाली पगड़ी पहनी है। सफेद रंग की शेरवानी व काली पाजामी पहनी है। उसके बगल में बैठी दुल्हन पिंक रंग की चुन्नी व लाल व पर्पल रंग का लहंगा पहनी है। मंजर को चीरते हुए एक लड़का, जिसके गले में बड़ा सा कैमरा टंगा है, आकर बोला, “चलो टाइम नहीं है मेरे पास, जल्दी दोबारा से माला डालो, फोटो खींचनी है।” उसकी बात सुनकर सबकी बातें थम गई। बातों का माहौल शांत हो गया। तभी एक महिला बोली, “जी यह अच्छा नहीं होगा! एक वरमाला पहना दी तो पहना दी, अब दोबारा नहीं होगा।” इतना कह कर वह रूक गई। फोटोग्राफर भी मानने वालों में से नहीं था। वह बोला, “जी मुझे कुछ नहीं पता, आपको दोबारा माला पहनानी पड़ेगी, हमें सबूत देना है कि पार्टी ने शादी करवाई है। इक्कीस जोड़ों की फोटो चाहिए!” “ओह हो… हमारी फोटो चाहिए, कोई बात नहीं खिंचवा लेते हैं।”
पहले दूल्हे ने दुल्हन की माला उतारी फिर दुल्हन ने दुल्हे के गले से माला उतारी और एक-दूसरे को दोबारा पहनाई। फोटो वाले ने जल्दी से बटन दबाकर दो फोटो खींचें और चला गया।
समाज की तरफ से आयोजित सामूहिक विवाह सम्मेलन में शिरकत करते हुए सामूहिक विवाह आयोजनों को समाज की सोच में बदलाव के लिए काफी अहम बताया । नविवाहित जोड़ों को शुभकामनाएं देते हुए उन्होने कहा कि सामूहिक विवाह सिर्फ एक विवाह का आयोजन भर नहीं हैं अपितु इसके प्रभाव और समाज हित में लाभ बड़े दूरगामी हैं। 
किसी कमजोर, जरूरतमंद या असहाय परिवार की कन्या का विवाह कराने से बढ़कर कोई पुण्य नहीं है। सामाजिक संस्थाएं सामूहिक विवाह जैसे सामाजिक पुण्य कार्य में अपनी सराहनीय भूमिका निभा रही हैं। उन्होने कहा कि सामूहिक विवाह का बढ़ता प्रचलन समाज के भले के लिए काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे समय की बर्बादी, दान-दहेज और फिजूलखर्ची जैसी कुरीतियों से भी समाज को मुक्ति मिल सकती है।
विपुल गोयल ने पढ़े लिखे नौजवानों से अपील करते हुए कहा कि दहेज प्रथा के खिलाफ अभियान में योगदान दें । उन्होने कहा कि अभी हाल ही में हरियाणा की शान पहलवान योगेश्वर दत्त ने बिना दहेज के शादी कर समाज के सामने मिसाल पेश की है। हमें इस पहल का अनुसरण करने की जरूरत है तभी बेटियों को बराबरी का अधिकार मिल पाएगा।

रविवार को एक सामूहिक विवाह कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें उन जोडों ने अपने जीवन साथी के साथ सात फेरे लेकर सात जन्मों तक एक साथ जीने- मरने की कसमें खाईं। इस कार्यक्रम में देश के अलग- अलग राज्यों से आए 101 जोड़े का समाज की सरफ से शादी कराई गई। जिसमें पूरे रीति-रिवाज के साथ सभी जोड़ों का विवाह कराया गया। सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा इन जोड़ों को गृहस्थ का सामान भी वितरित किया गया।

आदर्श सामूहिक विवाह

सामूहिक विवाह समाज के भगीरथ बंधुओ द्वारा समाज हित में एक सार्थक सोच व अंगद कदम हैं। सामूहिक विवाह मात्र एक विवाह का आयोजन भर नहीं हैं अपितु इसके प्रभाव व समाज हित में लाभ बड़े दूरगामी हैं।
मोटे-मोटे तौर पर सामाजिक प्रभावो में हम इस पहल से शादियो की दिन ब दिन बढती फिजूल खर्ची को आइना दिखा रहे हैं वहीँ समाज के आर्थिक रूप से कमजोर तबके की सहायता भी कर रहे हैं। हालाँकि सामाजिक स्तर पर सब समान हैं। फिर भी यह एक जमीनी सच्चाई हैं की सामूहिक विवाह की अवधारणा के विकास में एक आधारभूत तत्व यह भी था की समाज के आर्थिक रूप से कमजोर परिवारो से शादी रूपी खर्चे के पहाड़ का बोझ कम किया जाये। हालाँकि अब समाज में यह भी पहल हो रही हैं की आर्थिक रूप से सम्पन्न उच्च व मध्यम तबके को भी इसमें अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवानी चाहिए। पर यह सब स्वेच्छा से हो तो सोने पर सुहागा होगा क्योंकि वर्तमान में मैं समाज पर किसी तरह के प्रतिबंध की असार्थक कल्पना नहीं कर सकता। और मेरे स्वविचारो में शादी पूर्णतः निजी समारोह हैं और निजी रूप से ही प्रत्येक को इसके आयोजन का अधिकार भी हैं।
दूरगामी परिणाम देखे तो सामूहिक विवाह की पहल से हम कन्या भूर्ण हत्या पर भी एक हद तक सोच बदलने में कामयाब होंगे और दहेज़ रूपी दानव का भी निवारण कर रहे हैं। कन्या भूर्ण हत्या में एक अहम् किरदार माँ बाप के मन उसकी शादी के खर्चे का भी होता हैं जिसका हम इस पहल से निदान कर रहे हैं।
पर यह सब होते हुए भी मेरे मन में एक शंका या उलझन अब भी बरक़रार हैं। समाज के बुद्धिजीवी और न्यायप्रिय तो अवगत ही हैं की दहेज़ प्रथा समाज के लिए सबसे अनैतिक, असामाजिक और जहरीली समस्या हैं। हालाँकि सच्चाई यह भी हैं की इस कुप्रथा का हमारे समाज में इतना जहर देखने को नहीं मिला। फिर भी ताने देने के रूप मे हो या परिवार में माया का असर दिखाने के लिए अब भी ये समाज में विद्यमान हैं। पर इसे निर्मूलन करने के लिए बढ़ते कदम और समाज की चेतना का इसके प्रति कड़े रुख से में अभिभूत हूँ। लेकिन समाज के एक कदम से में स्तब्ध हूँ की दहेज़ प्रथा की शैशव अवस्था को हम अनोपचारिक रूप से सामूहिक विवाह में बढ़ावा दे रहे हैं। निमंत्रण पत्रिका, निर्देश पत्रिका में इसका प्रसार-प्रचार हो रहा हैं। समाज के भामाशाहो से विनती व आह्वान होता हैं की वे अपनी इच्छानुसार वस्तुए व आभूषण भेट दे सकते हैं।
क्या हम दहेज़ को पिछले दरवाजे से वैधानिक बना रहे हैं। अगर हम ये माने की ये सब भेट दहेज़ नहीं हैं और दहेज़ को हम कदापि बढ़ावा नहीं दे रहे हैं तो इन उपहारों और भेटो का फिर स्वरूप् क्या हैं। प्राचीन काल में दहेज़ प्रथा भी मात्र उपहारों और भेंटों का एक मिश्रण भर थी जिसे परिवार वाले अपनी बेटी को सहायतार्थ स्वरूप् विदाई के अवसर पर देते थे। कालान्तर में इसने अनिवार्यता का चोला ओढ़ लिया और गंभीर समस्या बन गयी। मुझे डर हैं क्या हम सामाजिक स्तर पर भी इस और बढ़ रहे हैं? अगर हाँ तो फिर इसके परिणाम गंभीर होंगे। हालाँकि एक तर्क यह भी हैं की यह तो समाज की और से उपहार स्वरुप भेट हैं पर तब मेरा प्रश्न यह होगा की माँ बाप के उपहारों और भेट को भी जायज ठहराना होगा। अगर यह सर्वउचित हैं तो वह भी परमउचित होना चाहिए। हम बुराई का आकलन इस तरह नहीं कर सकते की यह मात्र 10% घातक हैं और दूसरी 100% हैं। और अगर फिर हमारा मानक यह ही हैं तो हमें आत्मनिरीक्षण की जरुरत होगी की हम कहा खड़े हैं और चलने की दिशा क्या हैं।
सोभाग्य से इस वर्ष गोडवाड़ में संपन्न सामूहिक विवाह में मुझे शामिल होने का सुअवसर मिला। मेरा बहुत बहुत साधुवाद हैं उस आयोजन के आयोजको को जिन्होंने बहुत ही बेहतरी से समाज के पर्व को सम्पन्न किया था। निबोरनाथ में सड़क किनारे एक चाय की दुकान पर चाय की चुस्किया ले रहा था पास में समाज की कुछ बहनें और माताये भी बातों में व्यस्त थी। उनकी एक बात ने मुझे अंदर से झकझोर कर रख दिया। सोचा की क्या हमारी स्थिति “नो दिन चले अढ़ाई कोस” वाली हो रही हैं ?
उनकी बातो में एक मुद्दा यह भी था की इस सामूहिक विवाह में जो भेंटे और उपहार आये हैं उससे अधिक तो फलाणे सामूहिक विवाह में आये थे। हालाँकि मात्र यह एक चर्चा की बात हो सकती हैं और इसे आयी गयी भी कर सकते हैं पर क्या हम ऐसा माहोल भविष्य के लिए बना रहे जहा समाज में कुछ ऐसे बोल भी प्रचलन में आने लगेंगे जहाँ एक बेटी के घरवालो को ये सुनने के लिए भी विवश किया जायेगा की आप से तो बेहतर सामूहिक विवाह में दिया जा रहा हैं।
एक और यक्ष प्रश्न मेरे जेहन में हैं की अगर….अगर भविष्य में खुदा न खास्ता शादी किसी कारणवस टूट जाये तो इन भेंटों और उपहारों पर किसका अधिकार होगा….वरपक्ष या वधूपक्ष का? और किसी एक का होगा तो आधार क्या होगा।
सच्चाई यह भी हैं की सामूहिक विवाह में समारोह स्थल पर पहुचने के लिए किये गए वाहन का खर्च आज भी प्रमुख खर्च के रूप में दोनों पक्षो का होता हैं और ऐसेमें इन उपहारों और भेट के कारण एक और वाहन की भी व्यवस्था करनी होती हैं।
सामूहिक विवाह न्यूनतम में अधिकतम के सिद्धान्त पर हो तो और भी बेहतर परिणाम होंगे।
आयोजन समितिया भी अपनी संरचना और संगठन में बदलाव करके और भी बेहतर कर सकते हैं। वर्तमान में मौजूद सभी सामूहिक विवाह आयोजक समितिया अगर अपने पदों में एक पद दूसरी आयोजक समितियों के प्रमुख या अध्यक्ष को एक आमंत्रित पदाधिकारी के रूप में लेकर उनसे भी महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा और उनके अनुभवो का लाभ ले तो परिणाम उम्मीदों से भी आगे होंगे। एक दूसरे का अनुभव बेहतर के लिए प्रभावी होगा।