Sunday, February 19, 2017

बलात्कार के बाद सामाजिक प्रताड़ना

‘तहलका’ के नूतनताकांक्षी संवाददाताओं ने दिल्ली के 23 थानों में जा कर और 30 से ज्यादा पुलिसवालों से बातचीत कर जिस सत्य से साक्षात्कार किया है, वह है तो ठोस, लेकिन काश उसमें कुछ नया भी होता। बलात्कार या यौन प्रताड़ना में स्त्री की भूमिका पर दो-चार को छोड़ कर सभी पुलिसवालों ने जो राय प्रगट की है, वह उतनी ही पुरानी है जितने कि हमारे पुराण। विश्वामित्र ने मेनका पर धावा नहीं बोला था, मेनका ने ही उन्हें अपने ऋषित्व को खंडित करने को बाध्य कर दिया था। दूसरी ओर, एक सीता भी तो थीं, जो कई महीनों तक लंका की रमणीय अशोक वाटिका में रहीं, पर महाबली रावण उनके शील का तिनका तक नहीं तोड़ सका। अगर आज पुलिसवाले भी ऐसा ही सोचते हैं तो इसमें उनका कोई दोष नहीं है। वे बेचारे न तो विद्वान हैं, न विचारक और न ही सभ्यता समीक्षक। पुलिस व्यवस्था की भीतरी संरचना में वे अपनी ही इज्जत (जिसका एक अनिवार्य अंग है, स्वाभिमान) बचा लें, यही बहुत है।
दिल्ली के पुलिसवाले जो सोचते हैं, वही ज्यादातर पुरुष भी सोचते हैं। इनमें से जो जिम्मेदार पदों पर हैं, वे अपना मत सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने से भी नहीं चूकते। बलात्कारी को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए, इस पर पूरी सर्वसहमति है। बहुत से स्त्री-हितैषी यह सोचते हैं कि जिस पर बलात्कार का केस साबित हो जाए, उसकी पुरुषेंद्रिय को काट कर फेंक देना चाहिए। लेकिन इस पर सर्वसहमति नहीं तो बहुमत है ही कि बलात्कार की घटनाओं के लिए अकेले पुरुष ही जिम्मेदार नहीं हैं, इसमें स्त्री की भी भूमिका है। वह अपनी पोशाक, मेकअप, चालढाल, व्यवहार आदि से पुरुष को उत्तेजित क्यों करती रहती है? जो स्त्रियां अपने चाल-चलन में शील और संयम का परिचय देने में खुद असमर्थ हैं, उन्हें यह शिकायत करने का नैतिक अधिकार नहीं है कि पुरुष ने खुद पर नियंत्रण खो कर अनैतिक कार्य किया है। कानून की निगाह में, अपराधी ही नहीं, उसे अपराध करने के लिए उकसाने वाला भी सजा का हकदार होता है।
ऐसे तर्क स्त्रीवादी वर्ग को सरासर कुतर्क लगते हैं, तो यह उतना ही नैसर्गिक है जितना सूरज का पूरब से निकलता। इस वर्ग का आरोप है कि यह स्त्री की आजादी को कटघरे में खड़ा करने का व्यापक षड्यंत्र है। बलात्कार या बलात्कार की धमकी सिर्फ एक कामुक क्रिया नहीं है, यह स्त्री को उसकी परंपरागत और संकीर्ण दुनिया में वापस धकेलने की सुचिंतित रणनीति है। हर छेड़छाड़ या बलात्कार ऊंची आवाज में की गई मुनादी है: खबरदार, बाहर निकली, तो तुम्हारे साथ यही होगा। फैशन करोगी, तब भी तुम्हारे साथ यही होगा। गैर-मर्दों के साथ घूमोगी-फिरोगी, देर रात तक उनके साथ रहोगी, खुलेआम शराब या हुक्का पियोगी तब तो तुम्हारे साथ यह होगा ही। इस चेतावनी में स्त्री के लिए कहीं प्रच्छन्न संकेत यह भी है कि जब तुमने सारी आजादियों का लुत्फ उठाने का फैसला कर लिया है, तो तुम्हें पुरुष (यानी उसकी वासना) के प्रति भी उदारता से पेश आना चाहिए। मर्दों की दुनिया में जीना है, तो मर्दों को नाराज रख कर कितनी दूर जा सकती हो, बेबी? आधुनिक या उत्तर-आधुनिक जीवन शैली और परंपरागत जीवन मूल्य, ये दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते।
पुलिसवादी तर्क में कई और भी झोल हैं। इस तर्क से बलात्कार या यौन प्रताड़ना की अनेक घटनाओं की व्याख्या नहीं होती। घरेलू नौकरानियां कितनी भड़कीली पोशाक पहनती हैं? अधेड़ और बुजुर्ग औरतों में कितनी सेक्स अपील होती है? कोई कार अचानक रुकती है और सड़क पर अकेली जा रही लड़की को दबोच कर उसके भीतर खींच लिया जाता है। क्या इस कार में बैठे युवक उस लड़की की अदाओं पर लट्टू हो कर अचानक आपा खो बैठे थे? थानों में जिन औरतों के साथ छेड़छाड़, मारपीट या सीधे बलात्कार होता है, क्या वे फैशनेबल कपड़े पहने हुए होती हैं या ब्यूटी पार्लर से निकल कर सीधे थाने जाती हैं? भिखारियों और पागल महिलाओं के साथ कौन बलात्कार करता है? छोटी-छोटी बच्चियों पर, जिन्हें कामुकता का क भी नहीं मालूम, कौन हमला करता है? स्पष्ट है कि स्त्री के साथ यौन जुल्म के कई एक पहलू हैं। बिपाशा बसु या विद्या बालन के साथ बलात्कार नहीं हो सकता, लेकिन मुहल्ले की किसी नाचीज-सी औरत के सिर पर यह खतरा हमेशा मंडराता रहता है।
इन सब सीधे-साधे तथ्यों के बावजूद या उनसे अपनी संपूर्ण सहमति प्रगट करने के बाद मैं निवेदन करना चाहता हूं कि पुलिसवादी तर्क सौ फीसदी निस्सार नहीं है। वह सिर्फ हिमशिला के ऊपरी हिस्से का एक टुकड़ा भर देख पा रहा है। अगर पूरी हिमशिला का ढांचा उसकी निगाह के दायरे में आ पाता, तो वह अपनी स्थापना से खुद स्तंभित हो जाता। ज्यादा बड़ा सच यह है कि बलात्कार का निमंत्रण आकर्षक ढंग से सजी-धजी और वर्जनामुक्त जीवन शैली की ओर बढ़ रही स्त्री नहीं दे रही है, यह निमंत्रण उस संस्कृति की ओर से दिन-रात, प्रतिपल जारी किया जा रहा है जिसकी मान्यता यह है कि देह का स्थान दिल और दिमाग से ऊपर ही नहीं, बहुत ऊपर है। विज्ञापनों की आक्रामक दुनिया पर तीन-चार दिनों तक गौर करने के बाद जरा यह बताइए कि दिल और दिमाग को समृद्ध करने का जरिया बताने वाले विज्ञापन आपने कितने देखे और देह को छरहरा, सुंदर, कोमल, सम्मोहक और यहां तक कि मारक बनाने के नुस्खे बताने वाले विज्ञापन कितने देखे। दिल काला हो तो चलेगा, दिमाग के भीतर रूसी ही रूसी हो, तब भी चलेगा, पर गाल तो गोरे ही होने चाहिए, बालों को भी रेशम के धागों की तरह लहराना चाहिए और दांत तो वही दांत कहलाने के काबिल हैं जो मोती की तरह जगमगाते रहें। जब कामुकता के कारखानों में बना हुआ माल, लागत से सौगुना ज्यादा तक कीमत का टैग लगाए हुए, बेचने के लिए किसी सुंदरी या सुंदर को टीवी के परदे पर उतारा जाता है, तो मेरे मन में खूंखार विचार पैदा होने लगते हैं। किराए के ये सभी टट्टू सामान्य स्त्री-पुरुषों का, उनके घर के भीतर ही, उनकी नाक के सामने, अपमान करते हैं और अपना बैंक बैलेंस बढ़ाते हैं।
लेकिन क्या कीजिएगा। ईसा मसीह के शब्दों में यही कहा जा सकता है कि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं। कामुकता की संस्कृति का प्रसार करने के लिए इनसे विष-पुरुषों या विष-कन्याओं का काम लिया जा रहा है। इनकी अपनी जिंदगी तो मौज-मस्ती में बीतती होगी- या क्या पता, जूता कहां गड़ रहा है, यह उसे पहनने वाला ही जानता है, पर इसकी मार पड़ती है साधारण स्त्री जाति पर जो उनका अंध अनुकरण करने के लिए कुछ भी उठा नहीं रखना चाहती। इससे कामुकता का जो सघन वातावरण बनता है, वही पुरुष के कान में फुसफुसाता रहता है: पौरुष स्त्री की रक्षा करने में नहीं, उसे जलील करने में है।
- राजकिशोर, वरिष्ठ हिंदी विचारक

बलात्कार और समाज

जो कुछ हो रहा है, भयावह है। लग रहा है जैसे सती-युग लौट आया है। चैनल खबर चला रहे हैं- संसद सदमे में। सदमे में तो हम हैं। स्त्री अब क्या करेगी, कैसे जिएगी, कैसे अपना मुंह सबको दिखाएगी- ये कैसे सवाल हैं? लोग रो रहे हैं, दुखी हैं, और कह रहे हैं अब तन ढकने से क्या, बेचारी का जो था सो तो सब लुट गया। इज्जत सरेआम रौंद डाली गई। अब तो बेचारी तिल-तिल कर घुट-घुट कर मरेगी। यह सब क्या है। यह कैसी सहानुभूति है, जो बलात्कार का शिकार हुई स्त्री को स्वाभाविक जीवन जीता देखना गवारा नही करती।
संसद में बैठी शक्तिशाली स्त्रियां नहीं जानतीं कि रोजाना सार्वजनिक वाहनों में सफर करना महिला के लिए कैसा अनुभव होता है? वे नही जानतीं कि सड़क पर चलना क्या होता है। एक सामान्य पुरुष साथी की तरह खुली हवा में सांस लेने, कभी-कभार फिल्म-पिकनिक की मौज-मस्ती के लिए स्त्री को मानसिक रूप से कितना तैयार होना पड़ता है। चाहे वे जया बच्चन हों, गिरिजा व्यास, सुषमा स्वराज या सोनिया गांधी-अपनी पहचान छोड़ कर सामान्य स्त्री का जीवन एक दिन के लिए जीकर देखें तो शायद इस संसद-रुदन की जरूरत न पड़े।
शक्तिमान महिलाओं को विलाप करते देखना अजीब लगता है। जिनके पास सत्ता की ताकत है, कानून बनाने और उसे क्रियान्वित करने की क्षमता है, जिन्हें अपनी इस जिम्मेदारी को कब का पूरा कर देना चाहिए था उनकी आंखों में सिर्फ आंसू आ रहे हैं, वे सिर्फ मार्मिक भाषण दे रही हैं, वे नम आंखों से निहार रही हैं, वे आक्रोश प्रदर्शित कर रही हैं। अरे ये सारे काम तो संसद से बाहर बैठी महिलाएं भी कर रही हैं, फिर संसद की क्या जिम्मेदारी है?
इस अपराध पर त्वरित कार्रवाई करवाने में सक्षम लोग कार्रवाई करवाने की जगह आंसू बहा रहे हैं, संवेदनशील भाषण कर रहे हैं। कमाल है- संसद रो रही है, संसद सदमे में जा रही है। आपको याद होगा, हमारे एक पूर्व प्रधानमंत्री के कार्यकाल में तो इस लुटी इज्जत के लिए बाकायदा ‘बलात्कार बीमा योजना’ तक लाने पर चर्चा हुई थी। महिला संगठनों और बुद्धिजीवियों की कड़ी आलोचना के बाद उस शर्मनाक प्रस्ताव को वापस ले लिया गया।
इस कांड पर गमगीन सिर्फ महिलाओं को दिखाया गया। तमाम चैनल महिला सांसदों के आंसू और भाषण दिखाते रहे। ज्यादातर पुरुष सांसद इस घटना पर मौन थे या चैनलों ने उन्हें दिखाना जरूरी नहीं समझा। यह भी अजीब है। महिला के साथ अपराध हो तो उस पर महिलाओं का ही नजरिया दिखाया जाएगा। क्यों भाई, पुरुषों का क्यों नहीं? क्या यह एक सामाजिक अपराध नहीं है? क्या इससे पुरुष प्रभावित नहीं होता? क्या ऐसे समाज में पुरुष निश्चिंत होकर सो सकता है?
क्या बलात्कार के लिए फांसी देने से बलात्कार रुक जाएगा, जैसी कि लगातार मांग बनाई जा रही है? बलात्कारी के शिश्नोच्छेद की मांग हो रही है। ऐसी मांग का क्या अर्थ है? फांसी दो-फांसी दो के उन्माद में कोई बुनियादी सवाल सुनने तक को तैयार नहीं है। फांसी की भूखी भीड़ को कुछ लाशें चाहिए ही चाहिए जिससे उसकी क्षुधा कुछ देर को शांत हो। फिर उन्माद का कोई और मुद््दा आ जाएगा। क्या मृत्युदंड से इन घटनाओं को काबू किया जा सकता है?
बलात्कारी मानता है कि शील भंग के बाद पीड़िता किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं बची, उसकी ‘इज्जत’ लुट गई, वह बरबाद हो गई, अब तो उसका जीना मरने से भी बदतर है। इन्हीं मूल्यों के कारण पुरुष बदला लेने के लिए भी बलात्कार को अस्त्र के रूप में इस्तेमाल करते हैं। बलात्कारी को मृत्युदंड या शिश्नोच्छेद की मांग करने वालों के भी मूल्य यही हैं कि अब स्त्री के पास बचा ही क्या। शील गया तो सब गया। शर्म, हया, लाज। इज्जत, शील, चरित्र। ये सब वर्जिन वर्जाइना के पर्याय बना दिए गए हैं। अब लड़की कैसे सिर उठा कर जिएगी। सुषमा स्वराज के रुदन में कहें तो अब उसका जीना-मरना एक समान है।
यह हमारे समाज का सोच है कि अगर पीड़ित स्त्री बलात्कार के दंश से उबरना भी चाहे तो हम वैसा नहीं होने देंगे। बलात्कार तो शरीर पर गहरी चोट है जो देर-सबेर भर जानी है। पर मन की कभी न भरने वाली चोट कौन देता है? कौन इस जख्म को लगातार कुरेद कर नासूर बनाने के लिए जिम्मेदार है। यह कैसा समाज है, जो बलात्कारी के ही दृष्टिकोण से सोचता है। बलात्कारी मानता है उसने स्त्री का ‘सब कुछ’ लूट लिया और समाज भी यही मानता है कि स्त्री का सब कुछ लुट गया। और ‘लुटी हुई इज्जत’ कभी वापस नहीं आ सकती। जिसके लिए स्त्री बस एक यौन अंग है जिसके अवैध (बिना शादी) इस्तेमाल से वह अंग सड़ जाता है, हमेशा के लिए अपवित्र हो जाता है। उस समाज में पुन: प्रवेश के अयोग्य हो जाता है।
क्या यह यों ही है कि इसी सोच से खाप पंचायतें संचालित होती हैं, जहां अपनी मर्जी से शादी करने वाले जोड़ों को खापपंचायतों के समर्थन से काट कर फेंक दिया गया। आॅनर किलिंग के अनगिनत मामले हमारे सामने हैं। लड़की की इसी इज्जत के ‘अपवित्र’ हो जाने पर सामंती परिवार लड़कियों को मार डालते हैं और इस ‘इज्जत को खराब’ करने वाले को भी।
तब क्या बलात्कार के अपराध को कुछ कम करके देखना चाहिए? नहीं! यह जघन्य है और हमें इसे संपूर्णता में देखना होगा। स्त्री की इच्छा के बिना उसका जीवन साथी भी संबंध बनाए तो कानूनन यह भी अपराध है। पति द्वारा किया गया बलात्कार भी आपराधिक दायरे में है। स्त्री हो या पुरुष, अपने शरीर पर पहला अधिकार आपका ही होना चाहिए। बंद कमरों में बच्चों और बच्चियों के साथ घर के ही जाने-पहचाने लोगों द्वारा किए गए दुराचार, कार्य-स्थलों पर स्त्रियों के साथ दुराचार, सार्वजनिक वाहनों में और सड़कों पर राह चलती लड़कियों पर रोजाना होती छींटाकशी और अभद्रताएं भी इसी जघन्य अपराध की सैकड़ों कड़ियां हैं। यह हमारा समाज है जिससे हमें लड़ना भी है और इसे बेहतर भी बनाना है।
भारत में ही कई ऐसे समाज हैं जहां बलात्कार नहीं होते, बच्चियों की भ्रूण हत्याएं नहीं होती, जहां अपराध की दर तथाकथित सभ्य माने जाने वाले समाज की तुलना में न के बराबर है। आप तिब्बती समाज, आदिवासी समाज, मणिपुर सहित पूर्वोत्तर के राज्यों को देखिए और इसी के बरक्स दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा के समाजों के अपराध देखिए। अपराध न हो इसके लिए बेहतर मूल्यों वाला समाज भी रचना होगा, जहां हर जगह महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। इस समय जहां इस गंभीर मुद््दे पर समग्र नजरिए से बहस की जरूरत है, इस पर सारे विचार, सारी बहसों को बस फांसी दो-फांसी दो तक लाकर उन्मादी बना दिया गया है। राजनेताओं के लिए भी यह मांग करना और इसे लागू करना-कराना सुविधाजनक है। जहां सदन में कई जनप्रतिनिधि अपने मोबाइल पर नंगी तस्वीरें देखते पकडेÞ जाएं, वहां समाज को बदलने की बात कौन करना चाहता है?
मीडिया का जब से कॉरपोरेटीकरण हुआ है, अद््भुत खेल देखने को मिल रहे हैं। खेलों तक में यौन आकांक्षाएं पूरी करने को ‘हॉट गर्ल’, ‘ग्लैमर गुड़िया’ ढूंढ़ने का अभियान मीडिया चला रहा है, सिर्फ खेल देखना हो तो खेल लड़कियां दिखा ही रही हैं। बड़े लोगों का मन विश्व सुंदरियों से नहीं भरा तो अब खेलों में भी सुंदरी खोज रहे हैं। इसमें प्रिंट और दृश्य, दोनों मीडिया शामिल हैं। यही चैनल वाले रात-रात भर पॉवरप्राश, शक्तिप्राश और यौन-शक्तिवर्धक दवाओं के अश्लील विज्ञापन दिखाते हैं, फिर दिन भर बलात्कारियों को फांसी पर एसएमएस मंगवा कर ऊंची कमाई करते हैं। रात में प्रचार से कमाई और दिन में उसके विरोध से कमाई!
वियाग्रा जैसी दवा क्या स्वस्थ समाज की जरूरत है? मर्दानगी की सारी अवधारणाएं किस समाज की हैं? पॉवरप्राश जैसे विज्ञापनों में एक लड़का कई-कई लड़कियों के साथ बाकायदा हमबिस्तर दिखाया जाता है, परफ्यूम के विज्ञापनों में मर्दानगी का पागलपन दिखाया जाता है। लगभग हर विज्ञापन में स्त्री को देह, उपयोग और उपभोग की चीज बना कर परोसा जाता है, हर चैनल पर हिंसा और अपराध की कथाएं मनोरंजक बना कर चटखारे लेकर परोसी जाती हैं, जिनमें अपराध का न तो विश्लेषण किया जाता है और न उसे गंभीर समाजशास्त्रीय नजरिए से प्रस्तुत किया जाता है। सभी चैनल मनोहर कहानियां का विजुअल संस्करण बन गए हैं। दिन-रात चैनलों पर हिंसा, हत्या ,बलात्कार देख कर जाहिर है एक हिंसक, मानसिक रूप से विकृत और कुंठित समाज ही बनेगा।
बहुत संकट की स्थिति है। ‘यौनांगों की पवित्रता’ हमारे समाज की बीमारी है। स्त्री के साथ यौन शुचिता का मूल्यबोध जोड़ा गया है, वह खंडित होता है। अब चूंकि शुचिता तो वापस आ नहीं सकती, शुचिता के आईने की किरचें बिखर जाती हैं, जो किसी हाल में नहीं जुड़ सकतीं। इसलिए तूफान आ जाता है। अपराध को अपराध की तरह ही देखा जाना चाहिए वरना अपराध के लज्जा, अपमान, आत्महत्या तक होते हुए समाज न जाने कहां पहुंचेगा।
ये घातक स्थितियां हैं और इन्हें हमारा समाज ही निर्मित करता है। स्त्री की यौन-शुचिता को लेकर समाज इतना दुराग्रही है कि उससे आजाद होना बहुत मुश्किल दिखता है। बलात्कारी को तो फांसी दे देंगे लेकिन जो लोग यह सोचते हैं कि अब बेचारी लड़की कैसे जिएगी, क्या करेगी, उसका जीवन तबाह हो गया, उनके इस सोच को फांसी कैसे देंगे? स्त्री बलात्कार के बाद जीना भी चाहे तो इस मानसिकता की वजह से उसकी पढ़ाई-लिखाई, उसका व्यवहार सब परे हटाकर समाज उसे एक यौन-अंग में तब्दील कर देखेगा कि इसका सब कुछ छिन गया। अब इसके पास बचाने को क्या है?
जहां इस बात पर बहस चलती हो कि लड़की कैसे कपडेÞ पहनती है, किस समय बाहर जाती है, लड़कों से दोस्ती रखती है, जोर-जोर से हंसती है, वहां सामान्य इंसान के रूप में स्त्री को स्वीकार किया जाना अभी बाकी है। इस कुंठित मनोवृत्ति को फांसी दें! स्त्री को मेहरबानी कर जीने दें, उसे खुली हवा में सांस लेने दें, उसे अपनी जिंदगी के सपने पूरे करने दें। उसे बलात्कार पीड़िता की पहचान में न बदलें!
- संध्या नवोदिता
(जनसत्ता से साभार)

Thursday, February 16, 2017

दिल्ली के राजनीतीज्ञ

रैगर समाज बहुत लम्‍बे समय से पिछड़ा हुआ रहा है । जिसको मेहनत मजदूरी कर अपना पेट रोजाना भरना पड़ता था । लेकिन अब धीरे-धीरे स्थिति सुधरने लगी है । आज हमारे समाज ने अपनी राजनैतिक जड़े मजबूत कर ली है ओर रैगर समाज के बंधुओं ने ग्राम पंचायत से लेकर मंत्री पद तक अपनी दावेदारी साबित की है और समाज का गौरव बढाया है । 
       स्‍वतंत्रता प्राप्‍ति से पूर्व श्री भोलाराम तोंणगरिया हैदराबाद (सिंध) में म्‍युनिसिपल कमिशनर रह चुके हैं । श्री खूबराम जाजोरिया दिल्‍ली चीफ कमिशनर के सलाहकार तथा श्री सूर्यमल मौर्य अजमेर चीफ कमिशनर की सलाहकार समिति के सदस्‍य रह चुके हैं । श्री कज्‍जूलाल जाजोरिया सन् 1964 में जोबनेर नगरपालिका के अध्‍यक्ष निर्वाचित हुए हैं । कई रैगर राजस्‍थान में विभिन्‍न नगरपालिकाओं के पार्षद रह चुके हैं तथा कई वर्तमान में सदस्‍य हैं । श्री बंशीलाल आर्य (जोधपुर), श्री मिश्रीलाल मालवीय (जोधपुर), श्री भीकाराम फलवा‍ड़िया (बाड़मेंर), श्री बसंतीराम बाकोलिया (बाड़मेर), श्री छगनलाल जाटोलिया (बाड़मेर), श्री मिश्रीलाल चौहान (पीपाड़), श्री मिश्रीलाल खटनावलिया (पीपाड़), श्री भीमराज नवल (पाली), श्री मगाराम (चुरू) त‍था श्री केशरीमल जाटोलिया (बालोतरा) नगरपालिका के सदस्‍य रहे हैं । श्री केशरीमल जाटोलिया 27 वर्षों तक नगरपालिका बालोतरा के सदस्‍य समिति के अध्‍यक्ष रहे हैं । कई ग्राम पंचायतों के सरपंच भी निर्वाचित हुए हैं । रामचन्‍द्र धोलखेड़िया-बीकानेर, श्री सीताराम मौर्य-भाण्‍डारेज, श्री गिरधारीलाल मौर्य खरकड़ा, श्री जगन्‍नाथ मोरलिया-देवली तथा श्री प्रभुदयाल सबल कोटड़ी ग्राम पंचायत के सरपंच चुने जा चुके हैं । इस तरह रैगर जाति के लोग सरपंच से लेकर केबीनेट मंत्री तक रहे हैं ।

दिल्‍ली महानगर परिषद/विधानसभा 
(Delhi, Metropolitan Council/State Assembly)

वर्ष नाम पार्टी सदस्‍य/मंत्री
1952-1955श्री दयाराम जलुथरिया कांग्रेससदस्‍य
1967-1972 श्री शिवनारायण सरसुनियाभारतीय जनसंधसदस्‍य
1972-1977 श्री मोतीलाल बाकोलिया कांग्रेससदस्‍य
1977-1982 श्री मोतीलाल बाकोलियाकांग्रेससदस्‍य
1977-1982श्री भौरेलाल शास्‍त्री कांग्रेससदस्‍य
1977-1982श्रीमती सुन्‍दरवती नवल प्रभाकरकांग्रेससदस्‍य
1983-1988 श्री मोतीलाल बाकोलियाकांग्रेससदस्‍य
1993-1998 श्री सुरेन्‍द्रपाल रातावाल भाजपा मंत्री
1998-2003श्री मोतीलाल बाकोलियाकांग्रेससदस्‍य
2003-अब तकश्री सुरेन्‍द्रपाल रातावालभाजपा विधायक

दिल्‍लीनगरपालिका / नगर निगम पार्टी सदस्‍य
1954-1957श्री गौतम शक्‍करवालकांग्रेससदस्‍य
1957-1962श्री दयाराम जलुथरियाकांग्रेससदस्‍य
1962-1967श्री खूबराम कांग्रेससदस्‍य
1967-1975श्री गोपालकृष्‍ण रातावालजनसंधसदस्‍य
1975-1980श्री लक्ष्‍यमणसिंह अटलजनसंधसदस्‍य
1983-1988श्री खुशालचन्‍द मोहनपुरियाकांग्रेससदस्‍य
1985-1990श्री हेमचन्‍द्र माहनपुरियाकांग्रेससदस्‍य
1997-2002श्रीमती मीरां कंवरियाभाजपा महापौर
1997-2002श्री धर्मपाल अटलभाजपा सदस्‍य
2002-अब तकश्री योगेन्‍द्र चांदोलियाभाजपा अध्‍यक्ष
2002-2012श्री तुलसीराम सबलानियाकांग्रेसनिगम पार्षद
2006-2007श्रीमती मीरां कंवरियाभाजपामहापौर
2007-अब तकश्री सुरज कुमार कुर्डियाभाजपानिगम पार्षद, करोलबाग जोन के अध्‍यक्ष
2007-2012श्री हरिश सुवासियाकांग्रेसनिगम पार्षद
2012-अब तकश्रीमति भूमि रछोयाकांग्रेसनिगम पार्षद
2012-अब तकश्रीमति पार्वती दिगवालबी.एस.पी.निगम पार्षद
       श्रीमती मीरां कंवरिया रैगर समाज की पहली महिला है जो सन् 1997-2000 में दिल्‍ली नगर निगम की महापौर रही है । 
       श्री मोतीलाल बाकोलिया रैगर समाज के पहले व्‍यक्ति हैं जो दिल्‍ली महानगर परिषद तथा दिल्‍ली विधान सभा के कुल मिलाकर चार बार सदस्‍य रहे हैं ।

Friday, February 10, 2017

सन्देश प्रेस matter

समाज सेवा में रूचि, विनम्र व सौम्य व्यक्तित्व, समस्याओं को सुलझाने का मसला हो या कार्यक्रम संयोजन का हो, बेहतर परिकल्पना शक्ति से योजनाबद्ध एवं चरणबद्ध तरीके से बगैर सहयोगियो से उलझे सफल समाधान/आयोजन कर अन्तिम परिणाम पर पहुँच कर ही रुकना इत्यादि जिनकी प्रमुख विशेषता है।
हम बात कर रहे है"सामूहिक नेतृत्व" कीअवधारणा को प्रेरित करने वाली विचारधारा,विचारधाराओं का सम्मान एवं बिन्दु विशेष पर विभिन्न विचारधाराओं मे सामंजस्य स्थापित कर एक कामन विचारधारा का निरूपण करने वाले ............की l 
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रैगर समाज ने धीरे धीरे ही सही राजनीती मैं पैर ज़माने शुरू कर दिए है , रैगर दर्पण  की कोशिश रही है की वो अपने सभी ऐसे सफल रैगरो की जानकारी आप तक पहुंचाता रहे I
इसी क्रम मैं रैगर समाज मीरा TONGARIA को कांग्रेस पार्टी ने दिल्ली प्रदेश का महिला सभा की प्रदेश सचिव मनोनीत किया है I रैगर दर्पण रैगर  मीरा जी को शुभकामनाये देता है
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धर्मेन्द्र  का चयन NDA (नेशनल डिफेन्स अकादमी) में हो गया है. धर्मेन्द्र  ने प्रथम प्रयास में ही ये सफलता हासिल की है, साथ ही साथ इसने CBSE 12th में भी 90% अंक लाकर रैगर समाज को गौरान्वित किया है.
धर्मेन्द्र श्रीमती प्रेमवती और श्री रघुबीर के पुत्र है और दिल्ली मैं ही रहते है , रैगर दर्पण धर्मेन्द्र और उनके पुरे परिवार को शुभकामनाये देता है
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कक्षा 10 सीबीएसई के नतीजों में सेंट्रल स्कूल पश्चिम विहार  की लकी सिंह ने कक्षा 10 में 100% अंक प्राप्त किये है रैगर दर्पण  सोशल मीडिया प्रभारी  रघुबीर से बात करते हुए उनके पिता श्री धर्मेन्द्र  जी तथा माताजी रजनी जो एक टीचर है ने बताया की लकी ने ये सफलता अपनी मेहनत और लगन से प्राप्त की है लकी  को पढ़ाई के साथ साथ पैन्टिन्ग में भी रूचि रखती है और भविष्य में वे आईएएस बनकर देश के सेवा करना चाहती है! रैगर दर्पण उनके उज्जवल भविष्य की कामना करते हुय ढेर सारी शुभकामनाये देता है

प्रेस matter


किसी भी समाज के विकास एवं उत्थान में महिलाओं का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान होता है। बिना महिलाओं के योगदान के किसी भी समाज का विकास सम्भव नहीं है,चाहे वह कायस्थ जैसा बौद्धिक समाज ही क्यो न हो। वक्त की रफ्तार के साथ तादात्म्य न कर पाने के कारण पिछड गए हमारे कायस्थ समाज को आगे ले जाने के लिए सक्रिय कायस्थ महिलाओं का धनात्मक सहयोग अपेक्षित था, है और सदैव रहेगा।
ऐसे मे जब बडी संख्या मे कायस्थ महिलाये अपने समुदाय के प्रति उदासीन हो एवं शेष अपने समुदाय की अपेक्षा सम्पूर्ण समाज हेतु कार्य करने मे अत्यन्त सहजता की अनुभूति करती हो। इन परिस्थितियो मे जब कभी एकाध कायस्थ महिला अपने समाज को एक एवं विकसित करने के लिये प्रयासरत दिखती हो उसके बेडियो व संघर्षो की कल्पना सहज ही की जा सकती है
हम बात कर रहे है कुशल गृहिणी, मृदभाषी,मधुर वक्ता और कायस्थ समाज के लिए पूर्ण मनोयोग से काम करने वाली कायस्थ महिला लखनऊ की श्रीमती रमन सिन्हा जी की।
कायस्थ नेत्री के रूप में वे हमारे समाज की अन्य महिलाओं जो समाज तो छोडिये ,पडोस भी छोडिये अपने परिवार मे भीे सामंजस्य स्थापित नही कर पाती है ,के लिए अनुकरणीय उदाहरण हो सकती है।
उनका योगदान इसलिये भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि अनावश्यक चर्चा से दूर केवल कायस्थ महिलाओ को संगठित करना ही उन्होने अपना परम लक्ष्य बनाये रखा है।
व्यवहारिक धरातल पर कायस्थ महिलाओं को जोडने के प्रयास के साथ सोशल मीडिया पर "कायस्थवृन्द महिला संगठन"का सफलता से संघटन एवं संचालन उनके कौशल को बयां कर जाता है। "कायस्थखबर-संचालनमण्डल" द्वारा प्रदत्त अधिकारो का प्रयोग करते हुये मै
धीरेन्द्र श्रीवास्तव सक्रिय कायस्थ महिला लखनऊ की श्रीमती रमन सिन्हा जी को कायस्थ समाज हेतु उनके योगदानो को दृष्टिगत करते हुये उन्हे "कायस्थखबर-सक्रियकायस्थ" घोषित करता हूं।
बधाई हो रमन साहिबा। हमारी कामना है कि आपके द्वारा किये गये कार्य अन्य कायस्थों विशेषतया महिला कायस्थो के लिये उदाहरण बने।
यही "कायस्थखबर",
"जय चित्रांश आन्दोलन" है
एवं "कायस्थवृन्द " का लक्ष्य है।
हमे श्रीमती रमन सिन्हा जी से बहुत कुछ प्रेरणा मिलती है व हम उनसे बहुत कुछ सीखना चाहेंगे ।
श्रीमती रमन जी आपको आपके कुशल नेतृत्व की बधाइयां।
।।साधुवाद।।
आपका शुभेच्छु
यह आपातकाल नहीं, बल्कि लोकतंत्र की शक्ति की आहट है। यह शक्ति लोकतान्त्रिक है या नहीं, यह अलग प्रश्न है।
इंटरनेट भी क्या चीज है। सोशल मीडिया आने के पहले यदा-कदा कुछ वेबसाइट पर पाठकों के कमेंट मिला करते थे। जाहिर है वो पाठक थोड़े अध्ययनशील और शांत हुआ करते थे । उनके द्वारा उठायी गई आपत्तियों के जबाब बड़े लेखक शायद ही कभी देते ।
सोशल मीडिया ने इन पाठकों को एक स्थान दिया। वो आपस में लिखने समझने लगे। यहाँ भी वो कभी न जबाब देने वाले बड़े लेखक मौजूद थे। असल बदलाव आया जब संचार क्रांति के तहत मोबाइल और इंटरनेट गाँव-कस्बों से लेकर सुदूर क्षेत्रो तक पहुंच गए। गाँव के लल्लन के पास भी फेसबुक अकाउंट होने लगा । जाहिर है देश स्तर पर होती हर चर्चा को लेकर उसकी अपनी उत्सुकता होती। इस उत्सुकता को शांत किया विभिन्न समूहों द्वारा तैयार किये प्रचार साहित्य ने। वो प्रचार को सत्य समझने लगे। इसी तरह देशभक्त, देशद्रोही जैसे गाँवों की शब्दावली से गायब रहनेवाले शब्द नवपीढ़ी के दिलोदिमाग पर छा गए। प्रचारों के इसी परिणाम पर अब चुनाव लड़े जाने लगे। यह हथियार बन चुके हैं। जमीन पर असर दिखना भी स्वाभाविक ही है।
ऋषि मुनि कभी तपस्या करने हिमालय पर जाया करते थे। यहाँ भी हो सकती थी तपस्या पर वह शांति नहीं थी। कितने चिंतकों के भविष्य घरेलु झंझटों की वजह से बिगड़ गए। आज माहौल अलग है। अब सामाजिक, राजनैतिक श्रेणियों के चिंतक होने लगे हैं जिनको रहना इसी समाज में है। इनकी अपनी दुनिया थी जिसमे सारे इन्हीं के जैसे थे। सोशल मीडिया ने यह दुनिया विस्तृत कर दी। इस विस्तृत होती दुनिया में जब प्रचारजनित एकोन्मुखी इकाइयों का प्रवेश हुआ तब इनकी सीमित दुनिया में खलबली मचना स्वाभाविक था। इन इकाइयों की भाषा भी भदेश थी जो इनके सर्किल में नहीं चलती। इसी खलबली ने असहिष्णुता का रूप धारण किया। स्वयं में प्रतिक्रियावश जन्मी असहिष्णुता दूसरे में दिखने लगी जो वास्तव में थी पर जिनके विरुद्ध यह प्रतिक्रिया थी, उनके लिए यह सामान्य था। प्रचारतंत्र उनकी इसी सामान्य लगनेवाली असहिष्णुता का ही लाभ उठाते हैं।
यही दबाब है जो स्वतंत्र सोंच को रोकता है । कुछ बोलने से रोकता है। वास्तव में यह एक अक्षमता है जो भीड़ के समक्ष विवश है। ऐसे में आपातकाल न होते हुए भी आपातकाल प्रतीत होना स्वाभाविक है।
वास्तव में आपातकाल अब लग ही नहीं सकता, प्रतीत मात्र हो सकता है।
यह लोकतंत्र है जो निश्चित ही लोकतान्त्रिक नहीं। हो भी नहीं सकता। जिम्मेवारी से कोई अछूता नहीं। यही इसकी नियति है जिसे किसी एक सरकार पर थोपा नहीं जा सकता।
कुछ अन्य पहलुओं पर विचार फिर कभी
कांस्पीरेसी थ्योरी में यकीन नहीं।
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एनसीआर खबर डेस्क I गौतमबुद्ध नगर की नॉएडा विधानसभा की सीट पर जैसे ही कल भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह का ऐलान हुआ वैसे ही चारो और से खशी कम विरोध ज्यदा होने लगा I गौतम बुध नगर की राजनीती को थोडा सा भी समझने वाले लोगो की पहली प्रतिक्रया यही थी की आखिर पंकज ही को क्यूँ ? क्या पंकज सिंह नॉएडा के लिए इतने बेगाने हैं की लोग उनसे कनेक्ट नहीं कर पा रहे है या फिर ये सिर्फ भाजपा में राजनाथ सिंह और डा महेश शर्मा के अधिकार की लड़ाई है ? इसको समझने से पहले ज़रूरी है की नॉएडा विधान सभा सीट का एक आंकलन समझा जाए
नोएडा की लोकेशन
हिंडन और यमुना नदी के बीच बसे दोआब इलाके में बड़े संवेदनशील वोटर हैं। यहां फ्लो पॉपुलेशन रहती है। 50 पर्सेंट वोटर ऐसे हैं जो दिल्ली में काम करते हैं और नोएडा में रहते हैं। लगभग 40 पर्सेंट वोटर ऐसे हैं जो दिल्ली में रहते हैं और नोएडा में सिर्फ काम करने आते हैं। ऐसे माहौल में नोएडा के वोटरों पर दिल्ली व राष्ट्रीय राजनीति की छाप हावी है। केंद्रीय सेवाओं में काम करने वाले या रिटायर कर्मचारियों से जुड़े परिवारों की तादाद नोएडा में करीब 2 लाख है। इसी तरह सैन्य सेवाओं से जुड़े 5 हजार परिवारों के 25 से 30 हजार वोटर भी इन चुनावों में अहम भूमिका निभाएंगे। इसके एक तरफ इंदरापुरम जैसा इलाका तो दूसरी तरफ दक्षिण दिल्ली व पूर्वी दिल्ली का बॉर्डर आता है।
नॉएडा की राजनीती 
नोएडा जिले के अंतर्गत आने वाली विधानसभा संख्या 61 और सदर सीट है नोएडा। साल 2012 के आंकड़ों के मुताबिक इस विधानसभा क्षेत्र में कुल मतदाताओं की संख्या  4 लाख 28 हजार 259 है। जिसमें पुरुष मतदाताओं की संख्या 2 लाख 49 हजार 289 है। जबकि महिला मतदाताओं की संख्या 1 लाख 78 हजार 970 है। सीट पर पहली बार विधानसभा चुनाव साल 2012 में हुए। जिसमें बीजेपी के वर्तमान सांसद और केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा ने जीत दर्ज की थी। लेकिन महेश शर्मा ने 2014 में सीट छोड़ दी। और राष्ट्रीय राजनीति में चले गए। केंद्र में उन्हें मंत्री बना दिया गया। वे यहां के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं।
नोएडा विधानसभा का जातीय गणित 
एक आंकलन के अनुसार नोएडा विधानसभा एरिया के लगभग 50 पर्सेंट वोटर शहरी, करीब 50 पर्सेंट ग्रामीणइलाके व झुग्गी एरिया में रहते हैं। इनके बावजूद यहांं 23 % ब्राह्मण, 8 %ठाकुर, 5 % वैश्य, 4 %सिख, 7 % मुस्लिम, 16 % गुर्जर, एक 1% जाट, 6 % यादव, 3 % सैनी, 3 % ईसाई, 4 % कायस्थ  व १% कुम्हार के अलावा आधा-आधा पर्सेंट नाई-धोबी, 12 पर्सेंट एससी-एसटी व 6 पर्सेंट अन्यजातियां शामिल हैं।
कौन कौन है मैदान में , क्या है गणित 
नॉएडा में मुख्य रूप से 3 दलों की लड़ाई है जिनमे भाजपा अब तक १ लाख के करीब वोट पाती रही है वही समाजवादी पार्टी से सुनील चौधरी उम्मीदवार है, सपा को पिछले दो चुनावों में ४२ हजार के करीब वोट मिले थे I वही बसपा से रविकांत मिश्रा मैदान में है I बसपा कभी भी तीसरे स्थान से आगे नहीं बढ़ी हैं लेकिन ब्राह्मण वोट अगर ब्ज्पा से बसपा जाए और ठाकुर वोट सपा  और भाजपा में बटेगा तो पंकज सिंह को भाजपा को मिलने वाले १ लाख वोट को पाना आसान नहीं रहेगा
बदले हालत से क्या होगा 
मौजूदा हालात में पंकज सिंह के लिए जीत मायने रखती है I नॉएडा में शहरी वोटर भाजपा का समर्थक है I लेकिन १ लाख ब्राह्मण वोट के लिए पंकज सिंह को डा महेश शर्मा पर निर्भर रहना पड़ेगा I २०१२ से ही डा महेश शर्मा ने नॉएडा की राजनीती में अपनी पकड़ बनाए रक्खी है ,इसलिए बिना उनके सीट पर आगे आ पाना इतना आसान नहीं होगा I पंकज सिंह की जीत से नॉएडा के नेताओं के भविष्य पर भी एक सवाल खड़ा होगा क्योंकि ब्राह्मण और ठाकुर की राजनीती में पंकज अगर इस जीत से आगे निकलेंगे तो ये बाकियों के लिए पचा पाना आसान नहीं होगा I संजय बाली , कैप्टन विकास गुप्ता जैसे चेहरों को साधाना भी पंकज सिंह के लिए एक महत्वपूर्ण घटक होगा I हालाँकि पिटा राजनाथ सिंह की मजबूत छवि का प्रभाव उन्हें इनको साधने में आसानी दे एकता है I लेकिन बेहद कम समय में नॉएडा की स्थानीय कैडर का कितना साथ पंकज को मिल पायेगा ये वक्त ही बताएगा
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गाँव  में एक अहम् पंचायत हुई, जिसमें भाजपा प्रत्याशी के खिलाफ वोट करने का निर्णय लिया गया। पंचायत का आयोजन राम के आवास पर उनके ही आह्वान पर किया गया। ग्रामीणों ने श्याम  पर आरोप लगाया कि गाँव के कई मामलो में उन्होंने असामाजिक तत्वों का समर्थन किया है, उन्होंने यह भी आरोप लगाये कि बीजेपी प्रत्याशी गलत प्रवृत्ति के लोगों को भी संरक्षण प्रदान करते हैं।
हालाँकि पंचायत में इस बात पर कोई चर्चा नहीं हुई कि किस प्रत्याशी को समर्थन दिया जाये। पंचायत में राम प्रधान, छोटे  ठेकेदार, दया, सतेंद्र, भगवत, सहित दर्जनों गांववासी मौजूद रहे।
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रैगर समाज

इतिहास गवाह है कि सामाजिक सुधार एवं उत्थान सदैव धन एवं पद विहीन लोगों ने ही किया है. हमारे सभी महापुरुष मेधा में अद्वितीय पर साधन विहीन ही थे. उनका संबल सिर्फ समाज था.
रैगर समाज में मिश्रित संस्कृति है जिसके कारण कोई एक धारा हमारे समाज में स्थान नहीं बना पायी है इसलिए जातिगत स्वाभिमान इसमे कहीं परिलक्षित नहीं होता. जातिगत स्वाभिमान बोलने से नहीं, व्यवहार से परिलक्षित होता है. और हमारा सामाजिक व्यवहार ही हमें कमजोर बना रहा है. हमें पहले इस व्यवहार को बदलना पड़ेगा तभी हम मजबूत होंगे और हमारा संगठन मजबूत होगा.
एक बहुत ही सरल बात कहता हूँ. इंजेक्शन शरीर के किसी एक भाग में दी जाती है पर उसका प्रभाव पुरे शरीर पर होता है. यह बात महासभा पर अक्षरशः सही उतरती है. कायस्थ महासभा के पिछले 15 वर्षों का कार्यकाल जिनके हाँथ में रहा उनका इंजेक्शन समाज को जहरीला बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा. हर स्तर पर गिरावट का पर्याय बन गया महासभा.
इसके भंडाफोड़ करने का श्रेय अगर किसी को जाता है, तो वह महासभा के 2010 से 2014 तक राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में अध्यक्षता कर रहे व्यक्ति को जाता है, जो आज भी केस में उलझे हैं. उनको इस स्थिति में पहुँचानेवाले कोई अन्य नहीं, उन्ही के सहयोगी रहे. जाति से रैगर , कर्म से रैगर तथा उनके तथाकथित कर्मठ सहयोगी. मैं स्वयम भी पुरे एक वर्ष तक इस छल का शिकार रहा.
अभी व्हाट्स एप्प पर महासभा के ऊपर कुछ विचार एवं प्रतिक्रियाएं पढ़ी. सभी के अपने-अपने विचार हैं. मेरा मानना है की कमेन्ट करने के लिए कमेन्ट नहीं करना चाहिए. सुधार के तरफ कदम बढाए. विचारधारा को जन्म देते-देते विचारों के मकडजाल में फंसा व्यक्ति भ्रम के सिवा समाज को कुछ नहीं दे सकता.
 मै बराबर यह कहता रहा हूँ और मेरी यह पञ्च लाइन रही है कि “सामाजिक सेवा के कंटीले पथ पर चलने के लिए गलत को गलत कहने का सामर्थ्य पैदा करो.” तभी सच्ची समाज सेवा हो सकती है. मेरे x ray मशीन पर कई लोग चढते रहे हैं और भविष्य में भी चढते रहेंगे, अगर गलत करने वाले लोग मेरी नजर में आये तो.
        “बैंगन में कोई गुण नहीं, इसलिए उसका नाम बेगुन अर्थात बैंगन पड़ा और बैंगन सभी सब्जियों का राजा है इसलिए उसके सर पर ताज है” कहने वाले के अपने-अपने चश्मे हैं. हालांकि संगठन में जुड़े सभी लोग एक जैसे नहीं होते. महासभा में पूर्व एवं वर्तमान में अधिकतर लोग बहुत ही अच्छे, विनम्र, कुशल एवं सक्षम लोग भी हैं. कुछ तो निकल लेते हैं और कुछ तथाकथित मर्यादा के चादर ओढ़ सोये रहते हैं, जो मेरे दृष्टि से उचित नहीं है.
जागिये, संभलिये और संभालिए अपने विरासत को, कुल धर्म को, समाज को एवं आने वाली अगली पीढ़ी को.

Thursday, February 9, 2017

भारतीय समाज में फैले जातिवाद और छुआछुत

18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब अंग्रेज भारत में अपना पैर जमा चुके थे; भारतीय समाज एक नए प्रकार की सोच में ढलने लगा. मध्यकालीन परम्पराएँ व रीति-रिवाज अपने प्रभाव खोने लगें क्योकि वे बदलते समाज की आवश्यकता के अनुसार नही बदल रहे थे और वे समाज में जड़ बन गये. अतः उन्हें परिवर्तित कर समाज को आधुनिक मूल्यों व विचारधारा पर आधारित करने के लिए अनेक महापुरुषों ने उन सामाजिक-धार्मिक रिवाजों में सुधार का बीड़ा उठाया और धार्मिक- सामाजिक मूल्यों की सही और प्रासंगिक व्याख्या प्रस्तुत की. इस सामाजिक-धार्मिक सुधार की प्रक्रिया में जहाँ कुछ महापुरुषों ने समाज के गलत व अवैज्ञानिक परम्पराओं की आलोचना की और उनमे सुधार की आवश्यकता बताई; वही कुछ विद्वानों ने धर्म और समाज के अच्छे मूल्यों और परम्पराओं को उभारकर धर्म को प्रतिस्थापित किया. सामाजिक सुधार की इस प्रक्रिया पर ब्रिटिश शासन का भी प्रभाव पड़ा क्योकि उनके आने के बाद कुछ भारतीय लोग यूरोपीय आधुनिक संस्कृति से अवगत हुए और भारत में आधुनिक शिक्षा का प्रसार हुआ. 19वीं शताब्दी में भारत में सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलनों की एक श्रृंखला शुरू हुई जिसका उद्देश्य भारतीय समाज को आधुनिक मूल्यों के के अनुरूप ढालना था. ये सुधार आन्दोलन औपनिवेशिक भारत में उभर रहे मध्यम वर्ग की बढ़ती सामाजिक आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति थे. 19वी शताब्दी तक भारतीय समाज में फैले धार्मिक व सामाजिक अंधविश्वासों, रूढियों और असमानता की प्रवृत्तियों को ब्रिटिश सरकार के आने के बाद उभरे भारतीय मध्यम वर्ग ने जो आधुनिक शिक्षा और विचारों से परिपूर्ण हो गया था; ने एक कठिन चुनौती पेश की. उसने सामाजिक व धार्मिक सरंचनाओं को समानता, स्वतंत्रता व न्याय के आधुनिक मूल्यों के अनुरूप ढालने के लिए आन्दोलनों का सहारा लेना शुरू किया.
 भारतीय समाज में प्रमुख समस्या महिलाओं की समाज में दयनीय स्थिति को लेकर थी. 19वीं शताब्दी के भारतीय समाज में महिलाएं सती प्रथा, कन्या बालिका हत्या, बाल विवाह और विधवाओं के विवाह पर रोक जैसी अनेक शोषणकारी परम्पराओं और रीति-रिवाजों की शिकार थी.इसके अलावे उन्हें पर्दा प्रथा और शील रक्षा जैसी खोखली नैतिकता की परिधि में अपना जीवन व्यतीत करना पड़ता था. झूठी प्रतिष्ठा और खोखली परम्पराओं की रक्षा के नाम पर भारतीय समाज में महिलाओं के ऊपर अनेक प्रकार की बंदिशे और प्रतिबन्ध लगाए गये थे और उन्हें घर की चारदीवारी के अन्दर कैद होकर रहना पड़ता था. इससे उनके जीवन के विकास की गति रुक गयी थी. अतः महिलाओं को झूठी और तर्कहीन परम्पराओं से मुक्त कर उन्हें समाज की मुख्य धारा में शामिल करने के लिए 19वीं शताब्दी में अनेक समाज सुधारक आगे आए. इनमे से ब्रह्म समाज, आर्य समाज, प्रार्थना समाज, अलीगढ आन्दोलन, सिंह सभा इत्यादि प्रमुख थे. इन संगठनों ने जहाँ एक तरफ महिलाओं के खिलाफ होने वाले अमानुषिक व्यवहारों और शोषण की प्रवृति का विरोध किया वही दूसरी तरफ इसने भारतीय समाज में फैले जातिवाद और छुआछुत के आधार पर होने वाले भेदभाव व असमानताओं के विरुद्ध भी आवाज़ उठाई और इन परम्पराओं को धार्मिक व वैज्ञानिक आधार पर गलत ठहराया. भारत में समाज और धर्म हमेशा से एक-दूसरे से जुड़े रहे हैं और यहाँ की सामाजिक परम्पराएँ और रुढियों का आधार धार्मिक व्याख्या है; अतः सामाजिक परिवर्तन और सुधार के लिए यह अति आवश्यक था कि धार्मिक मूल्यों और मान्यताओं की सही व तर्कपूर्ण व्याख्या की जाये ताकि उसके आधार पर समाज में वांछित सुधार लाये जा सके. इसके लिए धार्मिक क्षेत्र में फैली अनेक बुराइयों व अंधविश्वासों यथा-मूर्ति पूजा, देवदासी प्रथा, बहुदेववाद और धार्मिक रुढ़िवावादिता का अंत कर धर्म को तर्कशील बनाना अति आवश्यक था. जब अंग्रेज भारत में आये तो उन्होंने एक वैज्ञानिक व तर्कपूर्ण शिक्षा प्रणाली को देश में लागु किया ताकि उन्हें एक अंग्रेजी शिक्षित मध्यम वर्ग मिल सके जो उनकी प्रशासनिक काम-काज में सहायता कर सके. भारत में अंग्रेजी शिक्षा का प्रभाव यह हुआ कि कुछ इने-गिने लोग ही सही पर एक वर्ग में पश्चिमी वैज्ञानिक विचारों का प्रसार हुआ और वे अपने समाज के मान्यताओं व मूल्यों का पश्चिमी लोकतान्त्रिक परम्पराओं के साथ तुलना करने लगे. इससे उन्हें अपने समाज में फैली रुढिवादिता और खोखली परम्पराओं का ज्ञान हुआ जो मूलतः कुछ वर्गों द्वारा अन्य पिछड़ी वर्गों के शोषण पर आधारित थी और कुछ विशिष्ट वर्गों की स्वार्थपूर्ति का साधन थे. पश्चिमी लोकतान्त्रिक मूल्यों यथा- स्वतंत्रता, समानता,न्याय और बंधुता के भारत के कुछ पढ़े-लिखे वर्गों के मध्य प्रसार होने से भारतीय जनता पर इसका महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा. कुछ विचारकों ने भारतीय समाज में इन मूल्यों को स्थापित करने के लिए सुधार आन्दोलनों का सहारा लिया. इन मूल्यों को भारतीय समाज में स्थापित करने के लिए सरकार द्वारा उपयुक्त विधायी सहयोग की आवश्यकता थी.
ब्रिटिश सरकार भारतीय सामाजिक और धार्मिक मामलों में अनेक कारणों से हस्तक्षेप नही कर रही थी. पहला इस कारण कि वे जानबूझ कर भारतीय सामाजिक व धार्मिक मूल्यों को यथावत रखना चाहती थी; जिससे कि उन्हें अपनी संस्कृति व मूल्यों को उच्च और भारतीय संस्कृति व मूल्यों को निम्न दिखाने का मौका मिलता था और इसी के आधार पर वे भारतीयों को सभ्य बनाने के तर्क का सहारा लेकर अपनी शासन को वैधता प्रदान करते थे. इसके अतिरिक्त इसाई मिसिनरी जानबूझ कर भारतीय समाज को नीचा दिखने चाहते थे ताकि हिन्दू धर्म की बुराइयों को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने और उसे शोषण पर आधारित दिखने से निम्नवर्गीय जनता को ईसाइयत की तरफ मोड़ा जा सके. अंग्रेज सरकार भारतीय सामाजिक व धार्मिक मूल्यों में इस कारण से भी कोई हस्तक्षेप और सुधार कार्यक्रम नही चला रही थी; क्योकि उसे भय था कि ऐसा करने से उसे उच्च वर्गीय रूढ़िवादी लोगों के विद्रोह व असंतोष का सामना करना पड़ सकता था. और अपने शासन के प्रारंभिक दौर में वह ऐसे किसी सामाजिक व धार्मिक प्रतिरोध का सामना नही करना चाहती थी जो उसके शासन के लिए खतरा पैदा करे. इसीलिए ब्रिटिश सरकार भारत में एक ऐसे देशी वर्ग का उदय चाहती थी; जो आगे बढ़कर समाज में फैली कुरीतियों व शोषण के खिलाफ आवाज उठा सके ताकि उनके मांग के अनुरूप सरकार सुधार की प्रक्रिया शुरू कर सके. अगर अंग्रेज सरकार खुद पहल कर सामाजिक व धार्मिक सुधार करने का प्रयास करती तो भारत के रूढ़िवादी बहुत आसानी से ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय समाज में हस्तक्षेप बताकर जनता को इसके खिलाफ गोलबंद कर सकते थे. इसीलिए न सिर्फ सरकार ने किसी भी प्रकार के सामाजिक और धार्मिक हस्तक्षेप से खुद को दुर रखी बल्कि यूरोपियन ईसाई मिशनरियों को भी भारत में धर्म प्रचार करने की अनुमति नही दी. लेकिन इसाई मिसिनरी भारत में चुपके-चुपके धर्म प्रचार करते रहे. चार्ल्स ग्रांट जैसे अंग्रेज का मानना था कि भारत में अंग्रेजों का वास्तविक वर्चस्व पश्चिम के उन श्रेष्ठतर नैतिक जीवनमूल्यों के प्रयत्न से ही संभव था, जो उसके इसाई विरासत में व्यक्त हो रहे थे. उसके अनुसार भारतीय जनता में इसाई धर्म के मूल्यों को समाहित करने से जनता द्वारा ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध विद्रोह की संभावना काफी कम हो सकती थी, क्योकि यह मूल जनता को उसके बहुदेववादी हिन्दू धर्म से मुक्त करती और उसको उपनिवेशवाद की आत्मसाती परियोजना का अंग बनाती.(विश्वनाथन 1989 : 71-74)