Friday, September 4, 2015

रेगर समाज अपनी स्वतंन्त्र पहचान नही बना पाया

विकास के दौर मे जहां लोग चांद सितारे छुने की बात करते है वहीं आज भी हम पुराने रीति रिवाजों से जकडे हुये है। विकास के नाम पर सिर्फ और सिर्फ बातें व एक दूसरे पर छिटाकशी के सिवाय कुछ नही।
भारतीय समाज मे रेगर समाज अपनी स्वतंन्त्र पहचान नही बना पाया, रेगर समाज का कई समूह में विभाजित होना। जिसमे कुछ कारण निम्न हैे।
१. सरकारी व गैरसरकारी कामकाजी लोग रोजी रोटी व परिवार को छोड सामाजिक सेवा नहीं देते।
२. शिक्षित नोजवान जिसे पढाई से ही समय नही निकल पाते।
३. धनी, उच्च शिक्षित, उच्च पद आसीन व जागरूक बन्धु अपनी हैसियत बनाने मे व्यस्त है और जो समाज से जुडे वह केवल महासभा के चुनाव तक सिमित रहे।
४. एक तबका रेगर विकास के नाम पर कुछ लोग ऐसे भी है जो केवल साल में एक दिन (दोज) व सामुहिक सम्मेलनो से अपनी राजनेतिक रोटियां सेकने मे मगन है। रेगर विकास से की ए.बी.सी-डी नही पता बस अपना विकास करना जानते है।
५. अशिक्षित बन्धु जो कुछ अपनी बात कहने व समाज का विकास करने में कमजोर हे।
६ आर्थिक स्थिती से कमजोर बन्धु अपनी रोजी रोटी कमाने मे व्यस्त है।
७. संधर्षवान जो कुछ समझता है और करना चाहता है लेकिन उसे किसी प्रकार का साथ नही मिलता और वो हारकर हताश हो जाता है।
लेकिन इसके बावजूद रेगर समाज में कुछ शेर दिल समाज सुधारक ऐसे भी है जो हार नही मानते और समाज को नई उचाईयो पर ले जाने के लिए संघर्ष कर रहे है। हमारे संत समाज सुधारक इसमें अहम भूमिका निभा रहे है, साथ ही समाज के नौजवान समाज को विकासशील बनाने के लिए संघर्ष करने को तैयार है। समाज के सभी संघर्ष कार्य कर्ताओ को मेरा नमन।
आप इस विषय पर अपनी राय रखना चाहै जरूर लिखे।

Saturday, August 29, 2015

raghubir singh gadegaonlia

रघुबीर सिंह गाड़ेगांवलिया 

Monday, July 6, 2015

ढोला, ढोल मंजीरा ओ ढोला ढोल मंजीरा बाजे रे

ढोला, ढोल मंजीरा
ओ ढोला ढोल मंजीरा बाजे रे
काळी छींट को घाघरो, निजारा मारे रे
ए ढोला ढोल मंजीरा बाजे रे
काळी छींट को घाघरो, निजारा मारे रे
ढोला ढोल मंजीरा बाजे रे हो
ए ए ए ए, साँठ कळी को घाघरो जी, कळी कळी में घेर
साँठ कळी को घाघरो जी, कळी कळी में घेर
पहर बजारा निकळी, रुपिया रो हो ग्यो ढेर
ढोला, ढोल मंजीरा
ओ ढोला ढोल मंजीरा बाजे रे
काळी छींट को घाघरो, निजारा मारे रे
ए ढोला ढोल मंजीरा बाजे रे हो हो
ए ए ए ए, मैं ढोला थने घणी कही के परदेशाँ मत जाय
मैं ढोला थने घणी कही जी परदेशाँ मत जाय
परदेशाँ री पर नारीयाँ सुं नैणों मति लगाय
ढोला, ढोल मंजीरा
ओ ढोला ढोल मंजीरा बाजे रे
काळी छींट को घाघरो, निजारा मारे रे
ए ढोला ढोल मंजीरा बाजे रे हो हो
ए ए ए ए, चार चौमाखी सोरती जी, रेल गाँव को हात
चार चौमाखी सोरती जी, रेल गाँव को हात
बेगा आजो सायबा मैं जो रही छुन बाट
ढोला, ढोल मंजीरा
ओ ढोला ढोल मंजीरा बाजे रे
काळी छींट को घाघरो, निजारा मारे रे
ए ढोला ढोल मंजीरा बाजे रे हो हो
ए ए ए ए, डूंगर ऊपर डूंगरी जी, सोनू घडे सुनार
डूंगर ऊपर डूंगरी जी, सोनू घडे सुनार
याँ घड दे म्हारी बाझणी, कोई पायल री झणकार
ढोला, ढोल मंजीरा
ओ ढोला ढोल मंजीरा बाजे रे
काळी छींट को घाघरो, निजारा मारे रे
ए ढोला ढोल मंजीरा बाजे रे हो हो
ए ए ए ए, बारा का बाजार में कोई बुढो रान्दे खीर
बारा का बाजार में कोई बुढो रान्दे खीर
दाडी दाडी जळ गई, कोई मुन्छ्यों को तकदीर
ढोला, ढोल मंजीरा
ओ ढोला ढोल मंजीरा बाजे रे
काळी छींट को घाघरो, निजारा मारे रे
ए ढोला ढोल मंजीरा बाजे रे
काळी छींट को घाघरो, निजारा मारे रे
ढोला ढोल मंजीरा बाजे रे
काळी छींट को घाघरो, निजारा मारे रे
ढोला ढोल मंजीरा बाजे रे
काळी छींट को घाघरो, निजारा मारे रे
ढोला ढोल मंजीरा बाजे रे

Friday, December 26, 2014

समाज सुधारक संत महात्‍मा

रैगर समाज की गौरवगाथा बहुत लम्‍बी है । हमारे समाज में अनेकों मनिषियों का जन्‍म हुआ जिन्‍होंने हमारे समाज के गौरव को चार चाँद लगाए और समाज को गौरवान्वित किया है । उनकी यशो गाथाऐं सदा-सदा के लिए अमर रहती है, अतीत के सुनहरे कल को आज जिन्‍होने प्रेरणा स्‍त्रोत के रूप में दिखाया, ऐसी महानआत्‍माओं को हम कोटी-कोटी प्रणाम करते है जिनके सदकर्मों से समाज गोरवान्वित हुआ है । ऐसे हमारे समाज के महात्‍माओं ने हमारी आने वाली पीढ़ि के मार्गदर्शन एवं प्रेरणा स्‍त्रोत बनकर समाज को और गौरवशाली बनाते हुए एक आदर्श व अनुपम उदाहरण प्रस्‍तुत किया है । हमारे समाज में अनेको ऐसी विभुतियों हुई है जिन्‍होंने समाज के साथ-साथ देश के लिए भी अपना बलिदान दिया है । हमारे समाज के बन्‍धुओं ने ऐतिहासीक कार्य किए जिन्‍हें आज मिसाल के तोर पर देखा जाता है । हमारे समाज में समाज सुधारक ऐसे कई संत महात्‍मा हुए है उनमें अनुभव के आलोक, आदर्श जीवन की प्रतिभा धर्मगुरू स्‍वामी ज्ञानस्‍वरूपजी महाराज और आदर्श प्रतिभा के धनी त्‍यागमूर्ति स्‍वामी आत्‍मारामजी लक्ष्‍य ने अपना पूरा जीवन सम्‍पर्पित कर दिया ।  रैगर समाज का नाम रोशन किया है जो समाज के लिए गर्व की बात हैं । ऐसी हमारे समाज की महान आत्‍माओं एवं महात्‍माओं ने हमारी आने वाली पीढ़ि के मार्गदर्शन एवं प्रेरणा स्‍त्रोत बनकर समाज को और गौरवशाली बनाते हुए एक आदर्श व अनुपम उदाहरण प्रस्‍तुत किया है ।

ईश-वन्‍दना


वह शक्ति हमें दो दयानिधे, कर्त्तव्‍य मार्ग पर डट जाएं ।
पर सेवा पर उपकार में हम, निज जीवन सफल बना जाएं ।।
हम दीन दु:खी निबलों विकलों, के सेवक बन सन्‍ताप हरें ।
जो हैं अटके भूले-भटके, उनको तारें खुद तर जाएं ।।
छल दम्‍भ द्वेष पाखंड झूँठ, अन्‍याय से निशि-दिन दूर रहें ।
जीवन हो शुद्ध सरल अपना, शुचि प्रेम सुधा रस बरसाएं ।।
निज आन मान मर्यादा का, प्रभु ध्‍यान रहे अभिमान रहे ।
जिस देश जाति में जन्‍म लिया, बलिदान उसी पर हो जाएं ।।

Saturday, November 29, 2014

भीख नहीं, वंचितों का अधिकार है आरक्षण

इस समय देश में पदोन्नति में आरक्षण को लेकर एक गंभीर बहस छिड़ी हुई है। कैबिनेट ने प्रस्ताव पास कर दिया कि अनुसूचित जाति/जनजाति को पदोन्नति में आरक्षण दिया जाना चाहिए। बसपा ने इसका समर्थन किया और समाजवादी पार्टी ने विरोध। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री ने 21 अगस्त को सर्वदलीय बैठक बुलाई थी और उसमें भी तय हुआ कि पदोन्नति में आरक्षण को लेकर संवैधानिक संशोधन की जरूरत है। संसद में 51 पार्टियां हैं, जिनमें सपा को छोड़कर सभी ने पदोन्नति में आरक्षण का समर्थन किया है।

2006 में सुप्रीम कोर्ट ने एम. नागराज के मामले में फैसला दिया था कि तीन शर्तो को पूरा करने के बाद ही पदोन्नति में आरक्षण दिया जाए। सवर्णो में जलन है कि कम योग्यता पर अनुसूचित जाति/जनजाति के लोग नौकरी में आ जाते हैं और साथ ही पदोन्नति में आरक्षण भी ले लेते हैं।

कई जगह पर भ्रम है कि आरक्षण की व्यवस्था 10 साल के लिए ही की गई थी। सच्चाई यह है कि राजनीति में आरक्षण 10 साल के लिए है, न कि सरकारी नौकरी में। आरक्षण पूरा ही नहीं हो पाया है तो यह कहना कि कब तक इन्हें आरक्षण मिलता रहेगा, भेदभाव की सोच है।

भारत सरकार में 149 सचिव हैं जिनमें एक भी अनुसूचित जाति का नहीं। 108 अतिरिक्त सचिव में केवल दो अनुसूचित जाति के हैं। 477 कनिष्ठ सचिव हैं, जिसमें केवल 31 अनुसूचित जाति के हैं। इस तरह से 590 निदेशकों में से 17 इस वर्ग से हैं। कौन नहीं जानता कि सारे नीतिगत फैसले सचिव एवं अतिरिक्त सचिव के हस्ताक्षर पर ही होते हैं। फिर प्रशासनिक क्षमता के लिए कौन जिम्मेदार है-दलित या जो उच्च पदों पर हैं?

आरक्षण विरोधी बताएं कि आजादी के बाद से लेकर अब तक 15 प्रतिशत आरक्षण पूरा क्यों नहीं हो पाया है? क्या कभी उन्होंने दलितों को अपना ही भाई समझकर मांग की कि आरक्षण अभी तक पूरा क्यों नहीं हो पाया? केवल चतुर्थ श्रेणी में कोटा पूरा ही नहीं, बल्कि थोड़ा ज्यादा ही है और उसका कारण है कि सफाई के काम में सवर्ण भर्ती नहीं होते।

शिक्षा जगत में स्थिति और भी खराब है। कुल 1864 प्रोफेसरों में से 14 अनुसूचित जाति और 11 जनजाति के हैं। इस तरह से रीडर के पद पर 38 अनुसूचित जाति के और 23 जनजाति के हैं, जबकि कुल संख्या है 3533। प्रवक्ता के पद पर भी स्थिति आरक्षण के अनुपात में दयनीय है। कुल 6688 प्रवक्ताओं में से 372 अनुसूचित जाति के और 223 जनजाति के हैं। जिस तरह से नौकरशाही में फैसला लेने के स्तर पर दलित-आदिवासी नहीं हैं उसी तरह से शिक्षा जगत में भी स्थिति है। फिर शिक्षा जगत में गिरावट के लिए कौन जिम्मेदार है? इसी वर्ष कार्मिक विभाग ने यह जानकारी दी कि उसे यह नहीं पता कि अनुसूचित जाति/जनजाति के कितने पद हैं।

जो आरक्षण का विरोध करते हैं उन्हें पूना पैक्ट के बारे में पता होना चाहिए। अंग्रेजी हुकूमत ने दलितों को पृथक मताधिकार अर्थात् दो वोट देने का अधिकार दिया था। एक सामान्य उम्मीदवार को और दूसरा दलित उम्मीदवार को। गांधीजी को यह नागवार गुजरा और उन्होंने पूना के यरवदा जेल में रहते हुए अनशन शुरू कर दिया। 22 दिन के लंबे उपवास के कारण डॉ. अंबेडकर के ऊपर दबाव बना कि वह पृथक मताधिकार की मांग ���ोड़ दें। देश में हाहाकार मच गया था। अंत में डॉ. अंबेडकर और गांधीजी के बीच में समझौता हुआ, जिसे पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है। जाहिर है, आरक्षण समझौते का प्रतिफल था। एक बार जब पृथक मताधिकार लागू हो जाता तो बहुत संभव था कि आजादी के समय देश के दो हिस्से ही नहीं, बल्कि तीन भी हो सकते थे। दलितों को अगर आरक्षण मिला है तो देश की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए।

अब जगह-जगह पर दलितों में आक्रोश पैदा हो रह��� है और वे कह रहे हैं कि आरक्षण भीख नहीं अधिकार है। सवर्णो और अन्य के साथ रहने के एवज में आरक्षण मिला है। निजीकरण एवं भूमंडलीकरण की वजह से सरकारी नौकरियां दिन-प्रतिदिन समाप्त हो रही हैं। अनुसूचित जाति/जनजाति की तरक्की जो भी हुई है वह राजनीति एवं सरकारी सेवाओं में आरक्षण की वजह से। निजी क्षेत्र अब बहुत बड़ा हो गया है, जिसमें इनकी भागीदारी नहीं के बराबर है। ऐसे में आरक्षण पर आपत्ति जताने वालों को देश के बारे में एक बार सोचना पड़ेगा। क्या इतनी बड़ी आबादी को राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग करके अखंड और मजबूत देश बनाया जा सकता है?

सुप्रीम कोर्ट का नजरिया यहां उचित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि जो तीन शर्ते उसने लगाई हैं उसकी जरूरत नहीं है। संवैधानिक संशोधनों ने पदोन्नति में आरक्षण के लिए कहीं अगर-मगर नहीं लगाया गया, फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने शर्ते लगा दीं। सुप्रीम कोर्ट की पहली शर्त है कि यह जांच की जाए कि ये पिछड़ हैं कि नहीं। दूसरी शर्त के अनुसार आरक्षण से दक्षता पर असर नहीं पड़ना चाहिए। अभी तक ऐसा प्रमाणित करने वाला उदाहरण देश में देखने को नहीं मिला। तमिलनाडु में आरक्षण 69 प्रतिशत तक है। शायद इसी वजह से वह कानून एवं व्यवस्था, शिक्षा एवं स्वास्थ्य, आदि के मामलों में आगे है। तीसरी शर्त के मुताबिक प्रतिनिधित्व की जांच करने के लिए कहा गया है। आंकड़े खुद बताते हैं कि आरक्षण पूरा हुआ ही नहीं तो सीमा लांघने की बात कहां पैदा होती है? सरकार को संवैधानिक संशोधन करके पदोन्नति में आरक्षण देना चाहिए। इससे देश की एकता और अखंडता मजबूत होगी, क्योंकि यह सबकी भागीदारी का मामला है।

अब सवाल उठता है कि आरक्षण कब तक? हजारों वर्ष की जाति व्यवस्था का अन्याय इतने कम सालों में खत्म नहीं होने वाला है। दलित, आदिवासी, पिछड़े आरक्षण छोड़ने के लिए तैयार हैं बशर्ते समान शिक्षा व्यवस्था हो जाए और जाति समाप्त कर दी जाए। वर्ना जब तक जाति रहे, आरक्षण मिलते रहना चाहिए। 

- साभार: डा0 उदित राज (राष्‍ट्रीय दैनिक मे छपे सम्पादकीय से अवतरित)
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/pratyuttar/entry/%E0%A4%AD-%E0%A4%96-%E0%A4%A8%E0%A4%B9-%E0%A4%B5-%E0%A4%9A-%E0%A4%A4-%E0%A4%95-%E0%A4%85%E0%A4%A7-%E0%A4%95-%E0%A4%B0-%E0%A4%B9-%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%95-%E0%A4%B7%E0%A4%A3

आरक्षण क्यों

आरक्षण क्यों
आरक्षण के संदर्भ में यह बात शुरू से ही उठती रही है कि आखिर आरक्षण की आवश्यकता क्या है. क्या पिछड़े लोगों को सुविधाएं देकर उन्हें मुख्य धारा में नहीं लाया जा सकता है. यह सवाल जायज हो सकता है, लेकिन ऐसे सवाल करने वालों को पहले यह जानना होगा कि आरक्षण दिया क्यों गया है.
आरक्षण दिए जाने के पीछे न्याय का सिद्धांत काम करता है, यानी राज्य का कर्तव्य है कि वह सभी लोगों के साथ न्याय करे. न्याय को दो अर्थों में देखा जा सकता है. पहला कानून के स्तर पर और दूसरा समाज के स्तर पर. कानून के स्तर पर न्याय दिलाने के लिए न्यायपालिका का गठन किया गया, जिसमें खामियां हो सकती है, लेकिन उन खामियों को सुधारा जा सकता है, जिससे न्याय सभी को मिल सके. उसी तरह समाज के स्तर पर न्याय का अर्थ है, वितरणमूलक न्याय से यानी समाज में प्रतिष्ठा, राजनीतिक शक्ति और आर्थिक संसाधानों का वितरण ऐसे हो जिससे किसी वर्ग या समुदाय को ऐसा नहीं लगे कि उसके साथ अन्याय हो रहा है, उसे सही मौका नहीं मिल रहा है.
सामाजिक अन्याय भारत में सदियों से होता रहा और अभी भी जारी है. भारत में सामाजिक अन्याय का सबसे बड़ा कारण जातिय व्यवस्था रही और इसके कारण सामाजिक प्रतिष्ठा कर्म के आधार पर नहीं, बल्कि जाति के आधार पर मिली. जाति के आधार पर कुछ वर्गों ने आर्थिक संसाधनों पर कब्जा किया और कुछ को आर्थिक संसाधनो से वंचित रखा गया. आर्थिक संसाधनों की कमी के कारण योग्यता प्रभावित हुई और योग्यता के अभाव में पिछड़ापन आया और असमानता कम होने के बजाय बढ़ता ही गया. इसी असमानता को कम करने के लिए विकल्प की तलाश की गई. इस असानता को कम करने के लिए तीन विकल्प मौजूद थे. पहला विकल्प सुविधाओं का था यानी शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण आदि की सुविधाएं उन वर्गों को  दी जाएं जिसे अभी तक उपलब्ध नहीं हुआ है. लेकिनcके पास इतना संसाधन नहीं था और न ही है कि वह सभी लोगों को इतनी ज्यादा और अच्छी सुविधाएं दे सके ताकि वह शारीरिक और मानसिक तौर पर उन वर्गों का मुकाबला कर सके, जिनके पास अपना संसाधन है, जो खुद के संसाधन से अपना विकास करने के योग्य हैं. राज्य ने वंचित वर्गों के लिए सुविधाएं दी है, लेकिन उस स्तर तक नहीं दे पायी है, जिस स्तर की सुविधाएं उच्च वर्गों के संसाधन युक्त लोगों को प्राप्त है. एक दूसरी बात यह भी है कि भारतीय समाज में निम्न जातीय लोगों को मानसिक तौर पर भी इतनी प्रताडऩा मिली है कि वे सामान्य वर्ग के लोगों के साथ समान सुविधाओं के साथ प्रतिस्पर्धा करने में पूरी तरह सक्षम नहीं थे और शायद उस समय तक नहीं हो पाएंगे, जब तक जातीय दंभ की भावना निम्नतम स्तर पर नहीं होगी. इसलिए सुविधाओं से समानता का सवाल ही नहीं उठता.
दूसरा विकल्प वरीयता है, यानी दो समान योग्यता वाले लोगों में पिछड़े को वरीयता दी जाए, जैसाकि अमेरिका आदि कई देशों में दी गई. लेकिन वरीयता समान योग्यता के बाद दी जा सकती है, जबकि यहां समान योग्यता तक पहुंचाने का रास्ता ही इतना कठिन है कि इसमें दशकों लग जाने के बाद भी मुश्किल से समान योग्यता आती क्योंकि यह सदियों से हो रहे शोषण का परिणाम रहा है. इसलिए भारत में इस विकल्प को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता था.
तीसरा विकल्प आरक्षण का था, जिसे भारत सरकार ने स्वीकार किया, क्योंकि सामाजिक न्याय दिलाने के लिए, कोई अन्य विकल्प नहीं था. हालांकि आरक्षण से योग्यता का ह्रास जरूर होता है और कुछ वर्गों के साथ इसे अन्याय भी कहा जा सकता है, लेकिन यह अन्याय उस अन्याय की अपेक्षा काफी कम है, जो हजारों सालों से होता रहा है और जिसके परिणाम स्वरूप इस व्यवस्था को अपनाया जाना नितांत जरूरी हो गया. यह भी सच है कि आरक्षण से सवर्ण हिंदुओं में विद्रोह की भावना पनपती है, लेकिन अगर आरक्षण नहीं  दिया गया तो इससे उन वर्गों में इससे काफी तीव्र विद्रोह की भावना पनपेगी और जो विस्फोटक रूप धारण कर सकता है, क्योंकि उनके पास सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक संसाधनों का अभाव है, जबकि सवर्णों के पास सामाजिक प्रतिष्ठा भी है और अपेक्षाकृत आर्थिक संसाधन भी इन लोगों से अधिक है. इसलिए आरक्षण की आवश्यकता पर किसी तरह का कोई संदेह होना ही नहीं चाहिए.
किसके लिए हो आरक्षण
आरक्षण से संबंधित सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर आरक्षण किसे दिया जाना चाहिए और इसका आधार क्या हो. आरक्षण लागू करने का मुख्य कारण सामाजिक अन्याय या वितरण मूलक अन्याय को कम करना रहा है. इसलिए यह जरूरी है कि इसे देने से पहले इस बात को समझा जाए कि आखिर अन्याय हुआ किसके साथ है. संविधान में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को इसके दायरे में रखने की बात की गई है, जिसे आधार बनाकर पिछड़े वर्ग के प्रतिनिधि यह तर्क देते हैं, कि आर्थिक आधार पर आरक्षण देना संविधान विरोधी है. लेकिन यहां इस बात को समझना जरूरी है कि क्या भारतीय संविधान में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ों की बात कही गई है, तो इसमें आर्थिक पिछड़ापन नहीं जोड़ा जा सकता है. भारतीय संविधान का स्वरूप लचीला है, इसमें संशोधन किया जा सकता है और किया भी गया है. इसलिए संविधान में अगर आर्थिक पिछड़ापन के आधार पर आरक्षण की बात नहीं की गई है, तो इसमें संशोधन कर इसे जोड़ा जा सकता है. अत: यह तर्क सही नहीं है. फिर आर्थिक आधार पर आरक्षण क्यों नहीं दिया जाना चाहिए. इसके पीछे का कारण कुछ और है. पिछड़ापन दो कारणों से होता है. पहला कारण स्वयं अपनी क्षमता का विकास समय की मांग के अनुसार नहीं करना और दूसरा उस क्षमता के विकास को समाज और शासन द्वारा अवरूद्ध कर दिया जाना. जिन लोगों के पिछड़ेपन का कारण स्वयं वह है, उसे आरक्षण देना एक बड़ी भूल होगी क्योंकि इससे विकास करने की भावना प्रभावित होगी और कोई भी व्यक्ति आरक्षण का लाभ उठाने के लिए अपने आर्थिक संसाधनों में कमी कर सकता है. इसलिए आरक्षण उन वर्गों को दिया जाना चाहिए, जिसके पिछड़ेपन का कारण समाज रहा है. भारत में दलितों, आदिवासियों तथा पिछड़ी जातियों के पिछड़ेपन का कारण समाज तथा शासन रहा है, क्योंकि जाति के आधार पर बंटे समाज में जाति को पेशा का आधार बनाया गया और कुछ जातियों को वैसे कामों से वंचित रखा गया, जिससे उसका सामाजिकआर्थिक विकास हो सकता था. इस जाति व्यवस्था को स्थापित करने तथा कुछ वर्गों को विकास करने से रोकने में शासन का भी बराबर का योगदान रहा है, क्योंकि राजशाही में इस व्यवस्था को कठोरता से लागू किया गया. इसलिए भारत में आरक्षण का आधार जाति ही हो सकता है, क्योंकि उच्च जाति के किसी व्यक्ति के विकास में न तो समाज रोड़ा बना है और न ही शासन.
आरक्षण का स्याह पक्ष
भारत की वर्तमान आरक्षण व्यवस्था पर समय-समय पर यह सवाल उठता रहता है कि आरक्षण का लाभ उन लोगों को कम मिल रहा है, जो इसके वास्तविक हकदार हैं, बल्कि उन लोगों को अधिक मिल रहा है, जिन्हें अब इसकी जरूरत नहीं रह गई है. भारत में आरक्षण का राजनीतिकरण हो गया है और इसे वोट बैंक का आधार बना लिया गया है, जिसके कारण सही तरीके से इसकी समीक्षा नहीं हो पाती है और इसके दायरे में आने वाले वर्गों की संख्या तो लगातार बढ़ायी जा रही है, लेकिन इसमें कटौती नहीं की जा रही है. यह संदेह जायज है और इसमें कोई दो राय नहीं है कि इसका राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा है. लेकिन इसके साथ यह भी समझना होगा कि आरक्षण का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत लाभ देना नहीं है और न ही केवल आर्थिक उद्धार है. आरक्षण का एक सबसे बड़ा उद्देश्य प्रदर्शनात्मक प्रभाव उत्पन्न करना है, जिससे उस वर्ग के लोगों को प्रोत्साहन मिले, जिस वर्ग का व्यक्ति आरक्षण का लाभ उठाकर शासन में बड़े पदों पर पहुंचा है. इससे उस वर्ग के लोगों का शासन के प्रति भरोसा बढ़ता है और उसमें मेहनत की प्रवृति का विकास होता है, जिसका लाभ उस वर्ग के अन्य सदस्यों को कम या अधिक जरूर मिलता है.
हालांकि आरक्षण में निहित दोषों को दूर करना निहायत जरूरी है और इसके लिए समय-समय पर इसकी समीक्षा की जानी चाहिए ताकि सही लोगों को इसका ज्यादा से ज्यादा फायदा मिल सके. इसके लिए राजनीति से प्रत्यक्ष तौर पर जुड़े लोग कदम नहीं उठाएंगे, क्योंकि उन्हें इससे वोट खिसकने का खतरा महसूस होता है, इसलिए यह जरूरी है कि दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के उन प्रतिनिधियों को आगे आकर इसके लिए आवाज उठाना पड़ेगा. उच्च वर्गीय लोगों के ऐसे सवालों से आरक्षण के लाभार्थी वर्गों को इसमें उनका अपना स्वार्थ दिखाई देता है, इसलिए उन्हीं के वर्ग के जागरूक लोगों को इसकी जिम्मेदारी उठानी होगी और अनुसूचित जाति-जनजाति में भी क्रीमिलेयर की अवधारणा लागू करने, केवल एक बार आरक्षण का लाभ मिलने, आरक्षण में आरक्षण दिए जाने जैसे मुद्दों को उठाना होगा ताकि आरक्षित वर्गों में इसके लाभ से वंचित लोग एक मंच पर आ सकें और राजनीतिक दलों पर इसका दबाव पड़े.
क्रीमीलेयर
क्रीमीलेयर का मतलब होता हैमलाईदार परत यानी आरक्षण पाने वाले वर्गों के वे लोग जो सरकार के द्वारा बनाए गए मापदंड( आय तथा सरकारी नौकरी में उच्च स्थान) के अनुसार आरक्षण के अधिकारी नहीं है. पिछड़े वर्ग में तो क्रीमीलेयर का प्रावधान हैलेकिन अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति में इसका प्रावधान नहीं हैजिसे लागू करने की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि आरक्षण का लाभ कुछ लोगों तक सीमित न रह पाए.
एक बार आरक्षण
एक बार आरक्षण से तात्पर्य है कि अगर किसी व्यक्ति को एक बार आरक्षण मिल चुका हैतो उसके बेटा या बेटी को आरक्षण न मिले क्योंकि आरक्षण का लाभ उठा लेने के बाद व्यक्ति की स्थिति सामान्य वर्ग के लोगों की तरह हो जाती है और उसे सुविधाएं दी जा सकती हैआरक्षण नहीं. इससे उस वर्ग के दूसरे लोगों को आरक्षण का लाभ मिलेगा और आरक्षण के मूल उद्देश्यों की प्राप्ति की संभावना बढ़ जाएगी.
आरक्षण में आरक्षण
आरक्षण में आरक्षण का तात्यपर्य यह है कि जिन वर्गों को आरक्षण दिया जा रहा है, उसमें भी यह देखा जाए कि कौन सी जाति ज्यादा पिछड़ी है और कौन कम. इसके बाद यह व्यवस्था की जाए कि अनुसूचित जाति या पिछड़े वर्ग(ओबीसी) के अंतर्गत जिन जातियों की स्थिति ज्यादा खराब है, उन्हें उसके अंदर ज्यादा आरक्षण दिया जाए ताकि इसका लाभ भी आनुपातिक तरीके से वितरित हो और आरक्षण का लाभ सही लोगों को मिल सके.