Tuesday, December 20, 2016

आलोचना और प्रशंसा

प्रशंसा अच्छी लगती है। प्रशंसा यथार्थ में कुछ नहीं होती। केवल शब्द संयोजन ही होती है। लेकिन प्रशंसा के साधारण शब्द भी मनोहर संगीत प्रतीत होते हैं और निन्दा के एक दो शब्द भी सुख छीन लेते हैं। मैं राजनैतिक कार्यकर्ता हूं। यहां दिन भर प्रशंसा या निंदा का बतरस चलता है। इस क्षेत्र में स्वयं भी अपनी प्रशंसा करनी होती है। शील, संकोच धरे रह जाते हैं। चुनाव में आम जनता के बीच अपना प्रशस्तिगान स्वयं करना पड़ता हैं समर्थक ताली पीटते हैं। जोश होश में नहीं रहने देता।
आत्म प्रशंसा में कहे गए शब्द भी हमारे व्यक्तित्व से चिपक जाते हैं और हम स्वयं को महान समझने लगते हैं। समर्थक प्रशंसक होते हैं। प्रशंसक ही सच्चे समर्थक कहे जाते हैं। तमाम शुभचिन्तक गल्तियों की ओर भी ध्यान आकर्षित करते हैं। वे ही सच्चे समर्थक होते हैं लेकिन उन्हें कोई भाव नहीं देता। राजनैतिक क्षेत्र में विपक्षी की कठोर निन्दा भी एक बड़ा गुण है। जो जितना बड़ा आक्रामक निन्दक वही उतना ही बड़ा वीर पराक्रमी।
भारतीय चिन्तन में प्रशंसा और निन्दा दोनों ही बुरे हैं। दोनो बांधते हैं। दोनो उन्मुक्त ज्ञान प्राप्ति में बाधक हैं। हम निन्दक के प्रति शत्रुभाव रखने लगते हैं। शत्रुभाव शत्रुता निर्वहन के लिए उकसाता है। इसी तरह प्रशंसक के प्रति मित्रभाव बढ़ता है। पक्षपातपूर्ण मित्रभाव भी अन्याय की ओर प्रेरित करता है। मनुष्य एकाकी जन्म लेता है। वह समाज का भाग बनता है। सामाजिक संचालन के अपने नियम व आचार शास्त्र होते हैं। समाज देशकाल के अनुसार इनमें संशोधन भी करता है। समाज व्यवस्था से असंतुष्ट लोग तमाम नियमों, परम्पराओं को चुनौती देते हैं। कई बार वे सफल भी होते हैं। उनके हस्तक्षेप से रूढि़यां छूटती हैं। नवाचार का विकास होता है।
समाज संचालन की दृष्टि से बहुत कुछ करणीय होता है। बहुत कुछ बार-बार करणीय। किए जाने योग्य कर्म ही कर्तव्य कहे जाते हैं। उनके बड़े भाग का अनुकरण होता है। वे अनुकरणीय हो जाते हैं। अनुकरणीय प्रशंसनीय होता है। समाज स्वाभाविक ही इसकी प्रशस्ति करता है। बोधयुक्त महानुभाव प्रशंसा में तटस्थ रहते हैं। वे अप्रिय सत्य भी बोलते हैं। निन्दा पाते हैं। वे निन्दा के प्रति भी तटस्थ रहते हैं। कर्तव्य, करणीय और अनुकरणीय के प्रति निष्ठा ही भारतीय चिन्तन का सार है। निन्दा और यश में तटस्थ भाव को भरतभूमि में प्रशंसनीय कहा गया है। लेकिन निन्दा में भी तटस्थता कष्ट साध्य है। प्रशंसा में प्रसन्नता छिपाई जा सकती है लेकिन निन्दा की बेचैनी और कसमसाहट के प्रति सामान्य रहना बहुत कठिन है। तटस्थता आसान नहीं। प्रशंसित व्यक्ति को सुख मिलता है और निन्दित को दुख।
प्रशंसा करने वाले को भी सुख मिलता ही होगा। लेकिन निन्दा का रस निश्चित ही गाढ़ा है। निन्दा करने वाले अपनी बात को सही बताते हैं। वे स्वयं के सत्य वक्ता होने का दावा करते हैं। परपीड़ा में रस लेते हैं। वे अपनी बात के समर्थन में तर्क के साथ कुतर्क भी देते हैं। निन्दा करना सामान्यतया सद्गुण नहीं है। लेकिन गलत की निन्दा से समाज अपना दृष्टिकोण देता है। अनेक कर्म निन्दित भी हैं। उनकी निन्दा न करना और चुप रहना भी निन्दनीय है। निन्दा का भी सदुपयोग है। इससे निन्दित कर्मो को हतोत्साहित किया जा सकता है। सामान्यजन प्रायः शक्तिशाली अपराधी की निन्दा नहीं करते। शक्तिशाली का भय उन्हें मौनव्रत में ले जाता है।
अत्याचार के विरूद्ध न बोलने और मौन रहने वाले लोग समाज की अन्तर्निहित ऊर्जा कमजोर करते हैं। अत्याचारी के निन्दक समाज को शक्ति देते हैं। गलत की निन्दा वस्तुतः सामाजिक अपयश बढ़ाती है। निन्दित व्यक्ति और कर्म के प्रति बहिष्कार और दण्ड की संभावनाएं बढ़ाती है। जान पड़ता है कि निन्दा की शुरूवात सामाजिक हितसंवर्द्धन के लिए ही हुई थी। स्वस्थ लोकमत निर्माण ही मूल उद्देश्य था। अध्यात्मिक चेतना के विकास के साथ निन्दा प्रशंसा के प्रति तटस्थ भाव को श्रेष्ठता मिली। तटस्थ मन असंभव है। ऋग्वेद के अनुसार दक्ष या स्वयं प्रशिक्षित किए गए मन से ही चित्त प्रशान्त होता है। पतंजलि योग सूत्रों में इस विषय का विस्तार से विवेचन है लेकिन सामान्य उपाय भी मन को प्रशान्त दशा की ओर ले जाते हैं। इसकी शुरूआत प्रशंसा के अवसरों से की जा सकती है। हमारे किसी काम की प्रशंसा हो सकती है। मान लें कि इसी आलेख की प्रशंसा। क्या हम सोच सकते हैं कि प्रशंसित कार्य में हमारे द्वारा पढ़ी गई पुस्तकों का योग ज्यादा है?
पूर्वजों अग्रजों का मार्गदर्शन ही इस प्रशंसा का सही अधिकारी है। क्या संपादकीय टीम की अनुकम्पा को श्रेय नहीं जाता? वे परिश्रम न करते, गल्तियों न सुधारते क्या तो भी यह कार्य सुंदर ही होता? यही बात कविता, कला, सृजन के अन्य क्षेत्र सहित सभी कार्यो पर लागू होती है? अंतिम बात और भी है। प्रशंसा करने वाले व्यक्ति भी गहराई से मीन मेख निकालते तो भी क्या प्रशंसा संभव थी? प्रशंसा वस्तुतः हमारी उपलब्धि है ही नहीं। सभी कार्यो में अनंत सृष्टि ही हिस्सा लेती है। कोई भी कार्य व्यक्तिगत कर्म का परिणाम नहीं होता। प्रशंसित कार्य में मिली प्रशंसा के प्रति ऐसी दृष्टि अपनाने से तटस्थ भाव की प्राप्ति संभव है। प्रशंसा के प्रति तटस्थ भाव के विकास के साथ निन्दा के प्रति भी ऐसा ही भाव साथ-साथ बढ़ता है। निन्दा और प्रशंसा में उत्तेजना के तल मन की तटस्थता का अपना उपयोग है। प्रशांत चित्त के अपने आनंद हैं।

निन्दा और स्तुति के प्रति तटस्थता अच्छी बात है लेकिन समाज में व्याप्त तमाम उपद्रवों के प्रति तटस्थ रहना उचित नहीं कहा जा सकता। गीता का संदेश अनूठा है। गीता दर्शन में योग साधना है। योग साधना से बने तटस्थ मन में मेरा और तेराके पक्षपात नहीं होते। जय-पराजय, लाभ-हानि, यश-अपयश और निन्दा-स्तुति में समभाव वाला मन श्रेष्ठ उपकरण बनता है। तब निन्दा-स्तुति से मुक्त और दक्ष मन से सामाजिक बुराईयों के प्रति संघर्ष और युद्ध भी आनंददायी हो जाते हैं। तटस्थ मन ही भारतीय चिन्तन का लक्ष्य नहीं है। सुंदर समाज, सुन्दर राजव्यवस्था और सुन्दर जीवन ही लक्ष्य हैं। ऐसी आनंदमगन जीवनशैली के निर्माण और गतिशीलता में तटस्थ मन का उपयोग है।

तटस्थ मन से की गई निन्दा भी बुरी नहीं होती और स्तुति या प्रशंसा भी चापलूसी नहीं होती। निन्दा और स्तुति दोनों ही उपयोगी अस्त्र हैं। निन्दा का उपयोग बुराई रोकने में है और प्रशंसा का उपयोग सामाजिक स्वास्थ्य का मूल रस लोकमंगल है। लोकमंगल की मूल साधना स्वस्थ लोकमत का निर्माण है। सत्य, शिव और सुन्दर के प्रति लोकमत बनाते रहना वास्तविक सामाजिक कार्य है। प्रभावी लोकमत व्यक्ति को गलत से रोकता है और सही के लिए प्रेरित करता है। सत्य, शिव और सुंदर प्राप्त किए जाने योग्य हैं ही। इसलिए सत्य, शिव और सुन्दर की प्रशंसा सबका कत्र्तव्य भी है। इसी तरह असत्य, अशिव और अभद्र की निन्दा का लोकमत बनाना जरूरी है। प्रशंसा या निन्दा स्वाभाविक सत्कर्म है। लोमंगल की स्थापना के लिए की गई प्रशंसा या निन्दा स्तुति योग्य है। जैसे बुद्धि का निजी हित में किया गया प्रयोग चतुराई है और लोकहित में किया गया प्रयोग विवेक है वैसे ही निन्दा या स्तुति का निजी हित में प्रयोग निन्दनीय है और लोकहित में किया गया प्रयोग सदासर्वदा मंगल भवन है और अमंगलहारी है।
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इंग्लैंड के राजा कैन्यूट के दरबार में ऐसे लोगों का जमघट लगने लगा था जो उसकी प्रशंसा के पुल बांध कर उससे ओहदा व धन पाना चाहते थे। एक दिन एक दरबारी ने राजा से कहा-'आपकी कीर्ति पूरे संसार में फैल चुकी है। आप तो धरती पर साक्षात ईश्वर हैं। आपका आदेश तो समुद्र भी नहीं टाल सकता।' एक संत को जब यह पता चला तो उन्होंने राजा को सावधान करते हुए कहा-'इन लोगों से बच कर रहो। तुम्हें ईश्वर बता कर ये तुम्हारा अहंकार बढ़ा रहे हैं। इनकी जिह्वा पर लगाम कसो।'
कैन्यूट ने अगले ही दिन उसे ईश्वर बताने वाले उस दरबारी को बुलाया और उसे समुद्र तट पर घुमाने के लिए अपने साथ ले गया। तट पर पहुंच कर राजा ने उस दरबारी से कहा-'मैं ईश्वर होने के नाते तुम्हें आदेश देता हूं कि तुम समुद्र की लहरों में कूद पड़ो। यदि तुम डूबने लगोगे तो मैं समुद्र को आदेश दूंगा। उसकी लहरें तुम्हें तट पर छोड़ देंगी।' राजा के ये शब्द सुनते ही मृत्यु के भय से वह दरबारी पसीने-पसीने हो गया। राजा ने कहा-'तुम चापलूसों की चाल मैं अच्छी तरह जानता हूं। मुझे ईश्वर बता कर लाभ उठाना चाहते हो? आज से मेरे पास आने का दुस्साहस न करना वरना सारा जीवन जेल में गुजारना पड़ेगा।'
सम्राट कैन्यूट ने तो उसी दिन चापलूसों से मुक्ति पा ली, लेकिन हमारी राजनीति और सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग आज तक उनसे मुक्त नहीं हो पाए हैं। स्वामी विवेकानंद ने ठीक कहा है कि अगर कोई बार-बार सुंदर व बहुत अच्छा कहे, तो सावधान हो जाएं नहीं तो चापलूस आपका नुकसान कर डालेगा। चापलूसों से मुझे हमेशा डर लगता है।
अनावश्यक प्रशंसा से व्यक्ति में मिथ्याभिमान भी उत्पन्न होता है और वह प्रशंसा चापलूसी के स्तर की बन जाती है। प्रशंसा और चापलूसी में वही अंतर है जो अमृत और विष में। प्रशंसा से व्यक्ति को प्रोत्साहन मिलता है और वह उत्कर्ष की ओर बढ़ने लगता है जबकि चापलूसी व्यक्ति में मिथ्याभिमान जगा देती है। वह उसे पतन के गर्त में धकेल देती है।
महान लेखक टॉल्सटॉय ने कहा है कि चापलूस व्यक्ति आपकी चापलूसी इसीलिए करता है क्योंकि वह खुद को अयोग्य समझता है। लेकिन आप उसके मुंह से अपनी प्रशंसा सुन कर फूले नहीं समाते। यही इंसान की कमजोरी है और चापलूस व्यक्ति इसी का फायदा उठाता है।
कमियां और विशेषताएं सभी में होती हैं। सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोग भी पूर्णतः निर्दोष या समस्त विशेषताओं से युक्त नहीं होते। उनके लिए आवश्यक है कि उन्हें प्रशंसा से प्रोत्साहन तो मिले पर उनमें उसके कारण अहंकार न जागे। क्योंकि प्रशंसा व्यक्ति को अभीष्ट दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।

हर व्यक्ति अपने द्वारा किए गए छोटे-बड़े सभी कामों की प्रशंसा सुनना चाहता है।

यह बईमान दुनिया है, यह अनैतिक दुनिया है, यह भ्रष्ट दुनिया है, यह दांव-पेंच वाली दुनिया है, यह लुटेरों की दुनिया है। यहां 100 में 95 बईमान है, यहां 100 में 95 अनैतिक है, यहां 100 में 95 भ्रष्ट है, यहां 100 में 95 दांव-पेंच वाले है, यहां 100 में 95 लुटेरे है। नैतिकता और शिष्टाचार लगभग विलुप्त होता जा रहा है। जनता से लेकर नौकरशाही, राजनेता और न्यायविद् तक बईमान हो चुके हैं, अनैतिक हो चुके हैं, भ्रष्ट हो चुके हैं, दांव-पेच वाले हैं, लुटेरे हैं। ऐसी स्थिति में कोई भी ईमानदार, नैतिक और जनकल्याण कारी नीति लागू करना कितना मुश्किल काम है, यह समझ सकते हैं़। यही कारण है कि हमारे देश में कोई भी ईमानदार, नैतिक और जनकल्याणकारी नीतियां और योजनाएं अर्थविहीन हो जाती है, लक्ष्य से भटक जाती है और भ्रष्टाचार में डूब जाती है। कोई भी ईमानदार सरकार अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को लागू कराने में असमर्थ होती हैं। आखिर क्यों। जब हम इस प्रश्न का चाकचैबंद और निष्पक्ष उत्तर देखेंगे तो साफतौर पर पायेगे कि सरकार की ईमानदार,नैतिक और जन कल्याण कारी योजनाओं व नीतियों का समर्थन व सहयोग जनता व नौकरशाही से मिल ही नहीं पाता है, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि निश्चित तौर पर न्यायविद् भी किसी न किसी रूप से अनैतिक, बईमान, भ्रष्ट लोागों का रक्षाकवच बन खडे हो जाते हैं। क्या यह सच नहीं है कि सरकार की सभी नीतियों और कार्यक्रमों की न्यायिक समीक्षा होती है, भ्रष्ट और बईमान लोगों को सजा देने का अंतिम अधिकार न्यायपालिका को है। हमारा लोकतंत्र  दुनिया का सर्वश्रेष्ट माॅडल है और इस पर गर्व भी हम करते हैं पर सच्चाई यह है कि लोकतंत्र के विभिन्न खंभों में तालमेल का अभाव और उनमें जिम्मेदारी का अभाव, कदाचार और अनैतिक लोगों के भरमार के कारण अपराधी, धनपशु और देश के अन्य लुटेरे लाभाथी बन जाते हैं।
हमारा देश एक लोकतांत्रिक देश है और चूँकि हम लोग अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति बेहद जागरूक हैं और हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हासिल है तो हम हर मुद्दे पर अपनी अपनी प्रतिक्रिया देते हैं और किसी भी फैसले अथवा वक्तव्य को विवाद बना देते हैं  , यही हमारे समाज की विशेषता बन गई है।
संसार का हर व्यक्ति अपने द्वारा किए गए छोटे-बड़े सभी कामों की प्रशंसा सुनना चाहता है। वह निंदा का एक भी शब्द सुनना पसंद नहीं करता। प्रशंसा व्यक्ति के अंदर छिपे उत्साह एवं लगन को जाग्रत कर देती है। भगवान बुद्ध के पास जब भी कोई व्यक्ति आता थावे उसकी अच्छाइयों की प्रशंसा करने लगते थे। अच्छाइयों के प्रकाश में बुराइयों का अंधकार स्वत: ही दूर हो जाता था।
बच्चों में भावनात्मक आवेश वयस्कों की तुलना में अधिक होता है। विद्यालय में शिक्षक द्वारा प्रशंसा या पुरस्कार से उनके अंदर उत्साहलगन एवं खुशी की लहर पैदा होती है। प्रतिस्पर्धा में सफल होने वाले छात्र आगे चलकर दुगने उत्साह एवं लगन से कार्य करते हैं। विद्यालय में छात्रों के हर अच्छे कार्य के लिए उनकी प्रतिभा की सराहना एवं पुरस्कार देनाउनके सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक माना गया है। पुरस्कार और प्रशंसा पाकर बच्चों के अंदर कुछ कर गुजरने की तमन्ना जागती है और दूसरे बच्चे उनका अनुकरण करके प्रोत्साहित होते हैं। इस प्रकार प्रशंसा बच्चों के विकास और उनकी सफलताओं में संजीवनी बूटी का कार्य करती है।
संसार का हर व्यक्ति चाहे वह किसी भी उम्र का होप्रशंसा सुनना चाहता है। मार्ग में आने वाले सभी अवरोधों एवं कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति देने वाली यह प्रशंसाअंदर छिपी शक्ति को पहचानने का एक माध्यम है। लेकिन जब कोई महान या ऊंचे पद पर बैठा व्यक्ति किसी छोटे व्यक्ति के कार्यों की प्रशंसा कर उसे पुरस्कृत करता हैवह खुशी के मारे अपने को साधारण से ऊंचा समझकर अहंकार का शिकार हो जाता है। फिर वह अपने आसपास के लोगों से ठीक से बात ही नहीं करना चाहता। हर अच्छे कार्य की प्रशंसा होनी चाहिए। क्योंकि बुरे कार्यों की अवहेलना एवं निंदा भी जरूरी है। यदि व्यक्ति प्रशंसा के द्वारा या मनोवांछित पुरस्कार प्राप्त होने पर अपने भीतर अहंकार नहीं पैदा होने देतो वह भी महानता के शिखर तक पहुंच सकता है।
छलकपटधोखाधड़ी एवं भ्रष्टाचार से घिरी व्यवस्था में बहुत से व्यक्ति बड़े-बड़े अधिकारियों एवं मंत्रियों की प्रशंसा करते दिखलाई देते हैं। झूठी प्रशंसा के द्वारा ऐसे चाटुकार लोग अधिकारियों एवं मंत्रियों को प्रसन्न करते हैं और अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। प्रशंसा एवं चाटुकारिता से घिरे ऐसे लोग अपनी आत्मा में झांकने की कभी कोशिश नहीं करते। चाटुकारिता से घिरे अधिकारी एवं मंत्री समय बीत जाने परजब उनकी पद प्रतिष्ठा समाप्त हो जाती हैइन्हीं चाटुकारों की निंदा करते हुए पछताते नजर आते हैं। स्वार्थ पूरा होने पर चाटुकारी लोग उनका साथ छोड़ देते हैं। इस प्रकार मिथ्या प्रशंसा कष्टप्रद होती है।
प्रशंसा उस पीपल या बट वृक्ष की जड़ों के समान होती है जो सीमेंट या पत्थर को फोड़कर छतों की दीवारों में अपना स्थान बना लेती हैदूसरे बड़े वृक्षों के तनों में प्रवेश करके सारे वृक्ष को हरा भरा रखती है। प्रशंसा करने वाला व्यक्ति कठोर से कठोर हृदय को पिघलाने की शक्ति रखता है। यदि हम किसी व्यक्ति के व्यवहार से बहुत असंतुष्ट हैंयदि वह हमारे सामने आकर हमारी अच्छाइयों का बखान करने लगे तो हमारा गुस्सा शांत होने लगता है।
प्रशंसा चाहे शारीरिक सौन्दर्य की होचारित्रिक गुणों की होचाहे किसी भी अच्छे कर्म की होव्यक्ति के अंदर खुशी की लहर पैदा करती है। प्रशंसक प्रशंसा द्वारा सामने वाले का दिल जीत लेता है। कभी-कभी माता-पिता प्रेम के वशीभूत होकर अपनी संतानों के गलत कार्यों की भी प्रशंसा करने लगते हैं। मेरे पुत्र ने जो कुछ कियाअच्छा किया। यह प्रशंसा उनके एवं उनकी संतानों के लिए घातक सिद्ध होती है। बच्चे माता-पिता का गलत संरक्षण पाकर बिगड़ जाते हैं। माता-पिता के संकीर्ण मिथ्या प्रेम से उत्पन्न यह प्रशंसा उनके ही पतन का कारण बनती है। दक्षिण भारत के महान संत कवि वेमना ने कहा है, 'मूर्खों की प्रशंसा मूर्ख ही करते हैं। सुअर कीचड़ की प्रशंसा करता हैन कि गुलाबजल की।व्यक्ति को अपने छोटे-छोटे कार्यों के लिए प्रशंसा का भूखा नहीं होना चाहिएबल्कि निंदा-स्तुति से पूर्णत: निलिर्प्त महान आदर्शों को धारण करते हुए कर्तव्य के प्रति समपिर्त रहना चाहिए। प्रशंसा वही भली होती है,जो अपने आप पीछे-पीछे दौड़ती है।
भाषा का अपना द्वंद्व होता है। इसका सीधा संबंध शब्दों से होता है। मनुष्य जीवन में शब्दों का बड़ा प्यारा प्रयोग है - प्रशंसा और आलोचना। कोई कितना ही मौन साधे इन दो स्थितियों से बच नहीं सकता। हमारी भाषा कैसी हो यह एक कला है। सार्वजनिक जीवन में तो ठीक है, लेकिन परिवार में भाषा और शब्द, कलह और प्रेम का कारण बन जाते हैं। जब किसी की प्रशंसा करनी हो तो सबके सामने करिए और आलोचना करनी हो तो एकांत में करिए। आइए, पहले प्रशंसा को समझ लें। प्रशंसा में दो गड़बड़ हो सकती है। सामने वाला भ्रम में डूब सकता है, अहंकार में गिर सकता है या फिर हमें चापलूस मान सकता है, इसलिए प्रशंसा में उसके कार्य को अधिक फोकस करें। हम व्यक्ति की प्रशंसा करने लगते हैं। उसके काम को भी तीन भागों में बांटकर प्रशंसा करें।
एक, यह काम उन्होंने किया कैसे? हमें भी इसकी समझ होनी चाहिए, इसलिए बिना जाने किसी की प्रशंसा न करें। दो, अब ऐसे प्रशंसनीय कार्य कौन-कौन कर गए, इस तरह के कार्य की प्रशंसा करें। इसमें व्यक्ति की बात भी आ जाएगी और व्यक्तित्व की तुलना भी हो जाएगी। तीन, इस कार्य से अन्य लोगों को क्या फायदा होगा। ऐसा दर्शाने से उनका कार्य सेवा में बदल जाएगा। सामने वाले को महसूस होगा कि प्रशंसा उसके व्यक्तित्व की नहीं, उसके सेवा-कार्य की हो रही है। इससे वह अहंकार से बच जाएगा और वह जान जाएगा कि हर प्रशंसा करने वाला चापलूस नहीं होता। अब बात करते हैं आलोचना की। जब आलोचना करनी ही पड़ जाए तो सार्वजनिक रूप से बचें। व्यक्ति कितना ही बड़ा या छोटा क्यों न हो उससे अकेले में ही बात करें। सार्वजनिक रूप से की गई आलोचना अपमान में बदल जाती है और एकांत में की गई आलोचना अच्छी सलाह बन जाती है।

Monday, December 19, 2016

संस्था का विधान

To,

The Registrar of Societies,
plot no.419,Udog Sadan
Patparganj ,industrial Area,
Delhi-110092

Sub-Regarding the Registration of the society named "............."

Sir,
I the undersinged applicant am submitting herewith the neccessary
documents in respect of registration of the ................. society
such as:-

1.Memorandum of Regulation (in duplicate).
2.Rule and Regulation (in duplicate).
3.Affidavit of No-relationship.
4.Affidavit / N.O.C. regarding to use the premises for the
registered office of the said society.
5.Proof of Possession & ownership of the property.
6.Proof of Address of the member.

IT IS THEREFORE,requested that the above named society may
please be registred under the society ,Registration Act of 1860 ,
as applicable to the all india basis.


Thanking you, Your Faithfully

PLACE-DELHI ( PRESIDENT )
DATE- 

(President ) (General Secretary) (Treasurer)

शपथ - पत्र
1- संस्था का नाम - "........................"
2- पंजीकृत कार्यालय सदैव राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में ही रहेगा और वर्तमान में यह इस पते पर स्थापित है- ..............
...................................................................।
3-संस्था का कार्यक्षेत्र संपूर्ण भारत होगा ।

4- संस्था के उद्देश्य एवं लक्ष्य :-
जिन उद्देश्य के लिए संस्था की स्थापना की गई है वे निम्न प्रकार है :-
1-संस्था के सदस्यों द्वारा आम आदमी में बंधुत्व,सहयोग, भाईचारा और राष्ट्र प्रेम की भावना को बढ़ावा।
2-समाज को संगठित करना तथा समाज के विकास व सुख शांति कायम करने के लिए हर संभव प्रयास करना।
3-समाज में अच्छी शिक्षा का प्रसार करना तथा समाज के लोगों के जीवन स्तर को सुधारने का प्रयास करना
4-समाज में बढ़ते अपराध को रोकना । सरकारी नियमानुसार ।
5-भारतीय संविधान में प्रदत्त सामाजिक न्याय,शिक्षा और आर्थिक उत्थान के लिए प्रयास करना तथा शैक्षिक संस्थाऐं खोलना और प्रबंध व्यवस्था आदि करना ।
6-महिलाओं और बच्चों के विकास के लिए कार्य करना तथा गरीब परिवार की कन्याओं की शादियां करवाना और उनकी आर्थिक सहायता करना।
7-समाज में बढ़ती कुरीतियों को समाप्त करना और बचत के प्रति लोगों को जागरुक करना।
7-(अ)-समाज में बढ़ते भष्ट्राचार एवं उपभोक्ता सरंक्षण के प्रति जागरुकता एवं भष्ट्राचार निवारण में सहायता करना ।सरकारी नियमानुसार ।
8-समाज के आर्थिक विकास के लिए एक कोष की स्थापना करना जिसमें कि प्रत्येक सदस्य से हर माह संस्था के सदस्यों को जरुरत पड़ने पर ऋण उपलब्ध करवाना तथा ब्याज राशि को संस्था के उद्देश्यों में लगाना और समाज का जीवन स्तर उंचा उठाने का प्रयास करना।
9-समाज की भलाई हेतु सांस्कृतिक शैक्षिणिक कार्यक्रमों का आयोजन करना।
10-समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों जैसे छोटी उमर में शादी,दहेज व्यवस्था के खिलाफ कार्यक्रम को लागू करने में सरकार की सहायता करना तथा अन्य कल्याणकारी कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के लिए सामाजिक संगोष्ठी करना।
11-समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों जैसे दहेज प्रथा,बाल विवाह ,रुढ़िवादिता ,बालश्रम,नशा,आपसी रंजिश इत्यादी को रोकना एवं इसके अलावा अन्य गैर कानूनी कार्य अपराध में लिप्त होने को रोकने के संबंध में आवश्यक प्रभावशाली व कानूनी प्रयास करना।
12-संस्था के माध्यम से समाज के सभी वर्गों में धार्मिक ,सामाजिक और राष्ट्रप्रेम की भावना को बढ़ावा देना तथा समाज में राष्ट्र के विकास के लिए कार्य करना ।
13-समाज में विकास के लिए टंकण(टाईपिंग),कला क्राफ्ट,पेंटिंग,संगीत,नृत्य,शारिरिक शिक्षा और योग आदि की शिक्षा देने के लिए विभिन्न केन्द्र स्थापित करना व इन प्रशिक्षण केन्द्रों को आर्थिक मदद करना उनका सुचारु रुप से संचालन करना ।
14-नशा मुक्ति केन्द्र की स्थापना करना तथा समाज को नशा मुक्त बनाने का प्रयास करना ।समय समय रक्तदान शिविरों का आयोजन करना ।बहुजन सुखाय की नीति की अपनाकर समाज को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास करना ।
14(अ)-आंतकवाद के विरुद्ध जागरुकता पैदा करना ।
15-पर्यावरण की सुरक्षा के लिए हर संभव प्रयास करना तथा शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरुकता पैदा करना ।
16-सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का लाभ आम जनता तक पहुंचाना तथा सरकारी भागीदारी योजना के अन्तर्गत सरकार से आर्थिक सहायत प्राप्त करना ।
17-समाज से बेरोजगारी एवं गरीबी के उन्मूलन हेतु लघु उद्योगों एवं हस्तकलाओं की स्थापना करना एवं संचालन करना ।
18-आम जनता के उपयोग के लिए कम्युनिटी हॉल ,बारातघर ,वृद्धाश्रम ,महिलाश्रम ,हैल्थकेयर सेंटर,संगीतालय ,नृत्यालय,अनाथालय,बालवाड़ी ,आंगनवाड़ी,शिशुगृह(जच्चा बच्चा केन्द्र),वाचनालय,पुस्तकालय,डिस्पेंसरी,अस्पताल,स्टेडियम स्टूडियों और रात्रि निवास आदि का निर्माण करना तथा विभिन्न सार्वजनिक सामाजिक विकास के कार्यक्रम चलाना व संचालन करना।
19-भारतीय संस्कृति ,सांस्कृति धरोहरों ,आदि के संरक्षण एवं पुर्नउत्थान में योगदान देना।
20-बजट के अनुसार धार्मिक एवं तीर्थ स्थलों की यात्रा एवं भण्डारे ,जागरण और सत्संग इत्यादी का व्यवस्था करना ।
21- गरीब असहाय व्यक्ति की मदद के लिए सदैव तैयार रहना ।
22-निर्धन और असहाय लोगों के लिए निशुल्क एंबुलैंस की व्यवस्था करना।
23-गरीब एवं जरुरतमंदों को कानूनी मदद निशुल्क उपलब्ध कराना ।
24-लोगों को केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजानाओं से अवगत कराना और जागरुक करना ।
25-संस्था के सदस्यों और आम जनता के हितों व अधिकारों की रक्षा के लिए संबधित विभागों से पत्र व्यवहार करना व आवश्यकता पड़ने पर न्यायालयों में जाना तथा संबधित अधिकारियों से मुलाकात करना ।
26-पाकृतिक आपदाओं जैसे -बाढ़ ,सूखा,भूकंप,या तूफान आदि के समय पीड़ितों को चिकित्सा ,भोजन,आवास ,यातायात,व अन्य सामग्री उपलब्ध कराना और हर संभव सहायता प्रदान करना ।
27-ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल(प्याऊ)आदि का निर्माण करना व व्यवस्था और रख रखाव का प्रबंध करना,उद्यान आदि का निर्माण एवं व्यवस्था तथा इन सबसे संबधित संस्थाओं का सहयोग लेना-देना ।
28-शिक्षा ,सांस्कृतिक व अन्य सामाजिक गतिविधियों के विकास के लिए विभिन्न कार्य योजना व कार्यक्रम चलाना -जैसे प्रौढ़ शिक्षा ,निबंध प्रतियोगिता,प्रदर्शनी,जलसे सेमिनार,सांस्कृतिक कार्यक्रम,प्रेस कांफ्रेंस आदि ।
29-सरकार द्वारा विशेष स्वास्थ्य सेवाओं का प्रचार प्रसार करना,क्षयरोग ,कैंसर,एड्स,जैसी घातक बीमारियों के प्रति लोगों को जागरुक करना एवं लोगों को बीमारियों के बारे में सरकारी योजनाओं को बताया एवं चिकित्सा सुविधा हेतु सही मार्गदर्शन करना ।
30-विकलागों के सेवार्थ विभिन्न योजनाएं बनाना एवं संचालन करना ।
31-संस्था के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संस्था के नाम जमीन और भवन आदि खरीदना और किराये पर लेना देना ।
32-लोगों को घर मुहैया कराने के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मकान इत्यादी बनवाना ।
33-संस्था की समस्त आय आयकर के अधिनियम की धारा 11(5)1964 के तहत जमा की जाएगी ।
34-संस्था द्वारा अर्जित आय सामाजिक ,धार्मिक और प्राणीमात्र के विकास में लगाई जाएगी,संस्था के माध्यम से समस्त कार्य करना जो संस्था के उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सहायक हो और संस्था द्वारा करने के लिए आवश्यक हो।संस्था की चल अछल संपत्ति से प्राप्त समस्त आय व कमाई ज्ञापन पत्र में उल्लेखित संस्था के उद्देश्य वे लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु पूर्णत प्रयोग की जाएगी और लगायी जाएगी तथा इसका कोई भी लाभ संस्था के वर्तमान या निर्वतमान सदस्यों के माध्यम से दावा करने वाले किसी एक या किसी कोई सदस्य संस्था की चल अचल संपत्ति पर कोई व्यक्तिगत दावा नही करेगा। या इसकी सदस्यता के आधार पर किसी प्रकार का लाभ प्राप्त नही करेगा ।



अध्यक्ष महासचिव कोषाध्यक्ष

5-कार्यकारिणी
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में तथा प्रभावी पंजीकरण अधिनियम 1860 की धारा 2 के अन्तर्गत तथा अपेक्षित कार्यकारिणी जिसकी संस्था द्वारा संस्था का प्रबंध सौंपा गया है,इन वर्तमान सदस्यों के नाम, पते ,व्यवसाय व पदनाम इस प्रकार है:-
क.सं. नाम व पता व्यवसाय पद 
1- पत्रकार अध्यक्ष
2.
3.
4.
5.
6.
अध्यक्ष महासचिव कोषाध्यक्ष

6-इच्छुक व्यक्ति
अनुसरण में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के ज्ञापन पत्र के यथा प्रभावी पंजीकरण
अधिनियम 1860 अधीन " .............. "नामक संस्था बनाने के इच्छुक है ।

क.सं नाम व पता व्यवसाय
1.

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3.
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7.


अध्यक्ष महासचिव कोषाध्यक्ष


संस्था के नियम व उपनियम

संस्था के नियम व उपनियम:-
संस्था का नाम :- " ................ "
(i)-सदस्यता-शपथ पत्र में उल्लेखित सभी सदस्य,कार्यकारणी के सभी सदस्य और वो हर व्यक्ति जो संस्था के नियमों और उद्देश्यों को मानता हो और जिसे की कार्यकारिणी सदस्य के रुप में स्वीकार करें,वो संस्था का सदस्य बन सकता है..धर्म ,जाति या लिंग के आधार पर सदस्यता के लिए कोई बंदिश नही होगी ।अन्य योग्यताएं इस प्रकार होगी:-
(1)कोई भी व्यक्ति (पुरुष या महिला) जिसकी आयु 18 वर्ष से अधिक हो वह संस्था का सदस्य बन सकता है
(2)-वह किसी प्रकार से नैतिक दोषी न हो तथा किसी अपराध में न्यायालय से किसी प्रकार दण्डित न किया गया हो ।
(3)-संस्था के उद्देश्यों में अपनी पूर्ण आस्था रखता हो तथा नियम व उपनियम का पालन करने को वचनबद्ध हो।
(4)-देशहित व सामाजिक कार्य करने का जज्ब़ा रखता हो।

(ii)सदस्यता शुल्क:- साधारण सदस्य बनने के लिए सदस्य शुल्क10/-(दस रुपये)सालाना है।जो नियत समय पर संस्था में जमा कराना आवश्यक होगा।
(iii)सदस्यता सीज़ होना:- किसी भी सदस्य की सदस्यता मत्यु,अयोग्य पाए जाने पर,नैतिक आचरण का दोषी पाए जाने पर,या
फिर छुट्टी के लिए प्रार्थना पत्र दिए बगैर लगातार तीन बैठकों से अनुपस्थित रहने पर,या कार्यकारिणी के ग्यारह में से छह पदाधिकारी सदस्य के व्यवहार से संतुष्ट ना हो,पागल होने की दशा में ,संस्था के उद्देश्यों अथवा हितों के खिलाफ कार्य करते पाए जाने पर,या फिर सदस्य के रुप में उससे जिस कार्य की अपेक्षा ना हो,इन दशाओं में कार्यकारिणी सदस्यता सीज़ करने का अधिकार रखती है।
(iv)सदस्यता रद्द होना :-संस्था की कार्यकारिणी किसी भी व्यक्ति ,सदस्य की उपरोक्त कारणों से सदस्यता रद्द कर सकती है..कार्यकारिणी सदस्य की सदस्यता रद्द करने का रिकार्ड अपने पास रखेगी।

संस्था की कार्यकारिणी:-
(i) संस्था को सुचारु रुप से चलाने के एक कार्यकारिणी का गठन किया जाएगा..कार्यकारिणी में सदस्यों की न्यूनतम और स्थायी संख्या 11 पदाधिकारी और कार्यकारिणी द्वारा नियुक्त सदस्यों की संख्या 16 से अधिक नही होगी..पदाधिकारियों को चुनने के लिए गुप्त मतदान प्रणाली का प्रयोग किया जाएगा।
चुनाव :-
1-संस्था का चुनाव हर पांच साल बाद होगा ।
2-चुनाव संस्था के छह पद अध्यक्ष(एक),उपाध्यक्ष(तीन),महासचिव(दो),सचिव (चार) और कोषाध्यक्ष के एक पद के लिए होगा,सदस्यों की नियुक्ति का अधिकार चुनी गयी कार्यकारिणी के पदाधिकारियों को होगा ।
3-चुनाव का संचालन एक चुनाव कार्यसमिति करेगी जिसमें संस्था से संबधित पूरे भारत में राज्य के अध्यक्ष सदस्य होगे ।
4-सदस्य चुनाव के दिन स्वयं या पत्र या ईमेल ,एसएमएस के माध्यम से मत कर सकेंगे ।
5.संस्था का कोई भी व्यक्ति 11 प्रस्तावकों की सहमति के साथ चुनाव लड़ सकेंगा ।
6-चुनाव में नामांकन के लिए कार्यकारिणी जो शुल्क निर्धारित करेगी (अधिकतम पांच सौ रुपये) वो शुल्क सदस्य को नामांकन फार्म के साथ जमा कराना होगा।
7-एक सदस्य एक ही पद के लिए चुनाव लड़ सकता है ।
8-चुनाव में मत देने का अधिकार उसी सदस्य को होगा जिसके पास संस्था का पहचान पत्र और मतदाताओं की लिस्ट में नाम होगा ।
9-चुनाव लड़ने से पहले सदस्य को संस्था का बकाया (यदि कोई हो)चुकाना होगा ।कोषाध्यक्ष की अनुमति के बाद ही नामांकन स्वीकार किया जाएगा ।

(ii)-कार्यकारिणी के सदस्यों का कार्यकाल:-
कार्यकारिणी के सभी पदाधिकारी पांच साल के लिए चुनें जाएगें..कार्यकाल उनके निर्वाचित होने के तिथि से शुरु होगा।चुने गये पदाधिकारी को पुन नियुक्त किया जा सकेगा ..कार्यकारिणी किसी पदाधिकारी को उसका कार्यकाल खत्म होने बाद अगले पदाधिकारी के निर्वाचन होने तक अपने पद पर बने रहने को मंजूरी दे सकती है इसके अलावा आपात स्थिति में कार्यकारिणी का कार्यकाल आगे बढ़ाया जा सकता है लेकिन इसे केवल एक साल के लिए ही आगे बढ़ाया जा सकेगा और इसके लिए आम सभा के 2/3 सदस्यों की अनुमति अनिवार्य होगी किसी भी हालत में कार्यकाल इससे ज्यादा नही बढ़ाया जा सकेगा।कार्यकारिणी के 16 सदस्य जिनकों कार्यकारिणी नियुक्त करेगी उनका कार्यकाल भी पांच साल के लिए होगा सदस्यों में से किसी को अय़ोग्य पाए जाने पर कार्यकारिणी को सदस्य को हटाने का अधिकार होगा लेकिन इसके लिए ग्यारह में से छह सदस्यों की अनुमति आवश्यक होगी यहीं नियम अस्थाई सदस्यों पर लागू होगा।अस्थाई सदस्यों का कार्यकाल एक साल का होगा इसे केवल कार्यकारिणी की अनुमति से केवल एक साल के लिए ही और बढ़ाया जा सकेगा ।

(iii)-कार्यकारिणी में रिक्तियां:-अगर किसी कारण से कार्यकारिणी का कोई सदस्य अपने पद से इस्तीफा दे देता है ,या किसी सदस्य की मत्यु हो जाती है,सदस्यता निलंबित होने की दशा में ,या किसी अन्य कारण के कार्यकारिणी का कोई पद खाली होता है तो कार्यकारिणी में संतुलन बनाए रखने के लिए कार्यकारिणी नॉमिनेशन के जरिए उस पद को भर सकती है।
(iv)-कार्यकारिणी की शक्तियां :-विधिक शक्तियों को छोड़कर कार्यकारिणी के पास संस्था को सुचारु रुप से चलाने और संस्था के उद्देश्यों की पूर्ती के लिए कार्यकारिणी के पास असीमित शक्तियां होगी।
(a) कार्यकारिणी संस्था के धन को सुरक्षित रखने के लिए किसी बैंक या संस्थान में संस्था के नाम से एक अकाउंट खोल सकती है..और संस्था के दो सदस्य अध्यक्ष और कोषाध्यक्ष इस अकाउंट का परिचालन करेगें।
(b) संस्था के कार्यों के लिए धन जारी करना या संस्था के उद्देश्यों से मेल खाती संस्थाओं को मदद करना।
(c) संस्था का वो धन जिसकी अभी तुरंत आवश्यकता नही हो संस्था के लाभ के लिए कार्यकारिणी उस धन का कहीं निवेश कर सकती है।
(d) सोसाईटी के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए कार्यकारिणी किसी बैंक अथवा संस्थान से लोन ले सकती है ..या सोसाईटी की संपत्ति को गिरवी रख सकती है।

(e) कार्यकारिणी किसी भी श्रेणी के कर्मचारियों की संस्था के लिए नियुक्तियां कर सकती है या कर्मचारियों को निकाल सकती है
किसी भी प्रकार की नियुक्ती के लिए नियम बना सकती या किसी नियम को रद्द कर सकती है

(f) कार्यकारिणी सभा संस्था के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संस्था की शाखा या उपशाखा(भारत या विदेश में )का गठन कर सकेगी संस्था के राज्यों के अध्यक्ष कार्यकारिणी की अनुमति के बाद की किसी शाखा या उपशाखा (केवल अपने राज्य में ) का गठन कर सकेंगे। ..और संस्था के किसी सदस्य को उसकी जिम्मेदारी दे सकती है कार्यकारिणी की मदद के लिए कार्यालय में जिन स्टॉफ की नियुक्ति होगी उनको स्वतंत्र रुप से कोई अधिकार नही होगा वे कार्यकारिणी के आदेश और संस्था के नियमों के मुताबिक कार्य करेंगे।

(g)अस्थायी नियुक्तियां:-कार्यालय के लिए या संस्था से संबधित किसी व्यक्ति या उप -संस्था की नियुक्ति की आवश्यकता पड़ती है तो कार्यकारिणी अध्यक्ष की अनुमति से नियुक्ति करेगी।.दिल्ली से बाहर नियुक्ति के लिए राज्यों के अध्यक्ष नियुक्ति करेंगे लेकिन इसकी पूर्व सूचना कार्यकारिणी को देंगे ।बिना कार्यकारिणी की अनुमति के कोई भी नियुक्ति वैध नही मानी जाएगी।

(h)आय का स्रोत :-
(क)चंदे के द्वारा ।
(ख)सदस्यता शुल्क द्वारा ।
(ग)भारत सरकार,समाज और अन्य के अनुदान द्वारा ।
(घ)संस्था यदि सदस्य/अन्य के लिए मकान इत्यादी बनाती है तो उससे होने वाले मुनाफे के द्वारा।
(च)न्यूज पेपर या मैगजीन निकालकर
(छ)धर्मशाला से दान या शुल्क के रुप में।

(v) कार्यकारिणी के सदस्यों की बैठक:-संस्था की कार्यकारिणी की बैठक एक माह में एक बार होनी अनिवार्य होगी।इसके लिए सात दिन पहले सदस्यों को सूचना देनी जरुरी होगी ।आपातकाल बैठक तुरंत बुलाई जा सकेगी ।या किसी बैठक के लिए कार्यकारिणी के तीन सदस्य मांग करें।
(vi)बैठक के लिए नोटिस :-
कार्यकारिणी की बैठक के लिए सदस्यों को सात दिन पहले सूचना देनी अनिवार्य होगी।लेकिन आपात या अन्य किसी जरुरी स्थिति में अध्यक्ष कार्यकारिणी की बैठक तुरंत करने की इजाजत दे सकता है
(vii) मीटिंग के लिए कोरम:-कार्यकारिणी के बैठक के लिए एक तिहाई सदस्यों का बैठक में उपस्थित होना जरुरी होगा।
(viii)निर्णय:- कार्यकारिणी में बहुमत के आधार पर निर्णय पारित माने जाएगें..प्रत्येक सदस्य का एक वोट होगा अगर मामला टाई रहता है तो उस स्थिति में अध्यक्ष को निर्णायक मत करने का अधिकार होगा।
(ix)प्रस्ताव पारित होना- कोई भी प्रस्ताव कार्यकारिणी में बहुमत के आधार पर पारित होगा और प्रस्ताव पर अंतिम स्वीकृति अध्यक्ष की होगी।अध्यक्ष की अनुमति और सहमति के बिना कोई प्रस्ताव पास नही माना जाएगा।पास प्रस्ताव पूरे भारत में संस्था पर लागू होगा।

3.संस्था के पदाधिकारी:-
संस्था में पदाधिकारियों के पद और संख्या इस प्रकार होगी ।
1- अध्यक्ष एक
2-उपाध्यक्ष तीन
3-महासचिव दो
4-सचिव चार
6-कोषाध्यक्ष एक
7-सदस्य अधिकतम 16(सोलह)
(4) संस्था का अध्यक्ष ही कार्यकारिणी का अध्यक्ष और संस्था का सर्वेसर्वा होगा।संस्था के सभी पदाधिकारी संस्था की आम सभा में चुने जाएगें।

(5)संस्था के पदाधिकारी जैसा की पैरा 3 में दर्शाए गये है उनकी निम्नलिखित शक्तियां और कार्य इस प्रकार होगें।

(6)अध्यक्ष :-
(क) साधारण सभा और संस्था की कार्यकारिणी की बैठकों की अध्यक्षता करेगा और कार्य सुचारु रुप से चलाने के आदेश देगा ।
(ख) किसी भी मतदान की सूरत में यदि मत बराबर रहते है तो अध्यक्ष को निर्णयक मत देने का अधिकार होगा ।
(ग)संस्था के अन्य पदाधिकारियों के कार्यों की समीक्षा देखरेख करेगा।
(घ) अध्यक्ष को कार्यकारिणी की बैठक बुलाकर संस्था के कार्य को सुचारु रुप से चलाने के लिए राष्ट्रीय ,प्रदेश ,जिला और ब्लॉक स्तर पर अस्थाई नियुक्ति का अधिकार होगा ।
(च)आवश्यकता पड़ने पर संस्था के कार्य हेतु पचास हजार रुपये मात्र तक खर्च करने का अधिकार होगा ।
(छ)कार्यकारिणी का कोई भी निर्णय बिना अध्यक्ष की अनुमति और सहमति के बिना लागू नही माना जाएगा ।

(6-i)उपाध्यक्ष :-
अध्यक्ष की अनुमति से अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उनके कार्यक्रमों को पूरा करेगा और उनको अपना पूरा सहयोग करेगा ।अध्यक्ष द्वारा दी गई जिम्मेदारी व कार्यों को करेगा ।

(7)महासचिव :-
(क) महासचिव संस्था का प्रतिनिधित्व करेगा और पब्लिक रिलेशन ऑफिसर और प्रवक्ता की भूमिका का भी निर्वाहन करेगा।
(ख)महासचिव सभी तरह के रिकार्ड,सदस्यों से संबधित जानकारी और बैठकों के मिनिट्स लिखेगा और उनका रिकार्ड रखेगा।
(ग)कार्यकारिणी की साधारण सभा एवं कार्यकारिणी की बैठकों को बुलाना ,कार्यवाही करना ,लिखना,नियमों को क्रियान्वित करना,करवाना,हर किस्म के पत्र व्यवहार करना और प्रत्येक कार्य को सुचारु रुप से चलाना ।
(च)बार्षिक विवरण तैयार करके साधारण सभा में प्रस्तुत करना ।
(छ)आवश्यकता पड़ने पर संस्था के कार्य करने के लिए 5000पांच हजार रुपये (पांच हजार रुपये मात्र) तक की व्यय करने का अधिकार,इससे अधिक व्यय के लिए कार्यकारिणी की अनुमति लेना अनिवार्य होगा । इसके अलावा महासचिव उन सभी कार्यो का निर्वहन करेगा जो अध्यक्ष अथवा कार्यकारिणी द्वारा दिए जाएगें।

(7-i)सचिव :-
महासचिव की अनुपस्थिति में सभी बैठकों का आयोजन और संचालन करना ,बैठकों के आय़ोजन में सदस्यों को एकत्रित करना तथा मीटिंग सम्मेलनों का कार्यभार की जिम्मेदारी,अध्यक्ष और महासचिव द्वारा दिये गये कार्यों का निष्पादन करना ।

(8)कोषाध्यक्ष :-
(क)यह समिति का आय-व्यय का हिसाब किताब सुचारु रुप से रखेगा ।
(ख)अध्यक्ष,महासचिव,कार्यकारिणी द्वारा सभी बिलों का भुगतान रसीद लेकर करेगें ।
(ग)चंदा इकट्ठा करने का मुख्य दायित्व कोषाध्यक्ष का होगा ।
(घ)आवश्यकता पड़ने पर समिति के कार्य के हेतु रुपये पांच हजार तक व्यय कर सकेंगे ।इससे अधिक खर्च के लिए कार्यकारिणी की अनुमति लेना अनिवार्य होगा ।

(9) वित्तिय वर्ष- एक अप्रैल से 31मार्च तक वित्तिय वर्ष मानकर संस्था का अकाउंट तैयार किया जाएगा।
(10) ऑडिट-संस्था का बार्षिक अकाउंट का ऑडिट एक चार्टड अकाउंटेंट द्वारा किया जाएगा जिसे संस्था संस्था के चार्टड अकाउंट रुप में नियुक्त करेगी।

(11)संस्था की आम सभा- संस्था के सभी सदस्यों को मिलाकर एक आमसभा गठित होगी .आमसभा की बैठक एक साल में एक बार होनी आवश्यक होगी..जिसका कोरम दो तिहाई सदस्य होंगे।बैठक को भंग करने के लिए किसी कोरम की आवश्यकता नही होगी।सात दिन के नोटिस पर आमसभा की आपातकालीन बैठक 3/4 सदस्यों के लिखित आग्रह पर भी बुलाई जा सकेगी।बार्षिक बैठक के लिए नोटिस सूचना का समय दस दिन होगा। आम सभा में निम्नलिखित कार्य निपटाए जा सकेंगे।
(i) आम सभा में संस्था के लिए बार्षिक कार्यक्रम और नीतियां तय होगीं।
(ii)उन सभी विषयों पर विचार जिनसें संस्था का सीधे या अप्रयत्क्ष तौर पर जुड़ी होगी...
(iii)संस्था का बार्षिक बजट तय करना।
(iv)संस्था के बार्षिक ऑडिट के लिए एक योग्य ऑडिटर की नियुक्ति करना।
(v)उन सभी विषयों पर विचार करना जो कि कार्यकारिणी द्वारा लाए गये हो।

12.असाधारण बैठक- आम सभा की किसी असाधारण या आपात बैठक में कोरम की अनिवार्यता लागू नही होगी।

13-कार्यकारिणी की वार्षिक सूची: धारा 4- हर वर्ष के बाद कार्यकारिणी सदस्यों व पदाधिकारियों की सूची ,नाम ,पता और सोसाइटी,पंजीकरण अधिनियम 1860 की धारा -4 के अनुसार रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटीज दिल्ली में जमा की जाएगी

14-नियम एवं उपनियम में संशोधन धारा-12 एवं 12 ए- किसी भी नियम एवं उपनियम में संशोधन यदि अनिवार्य हुआ तो उसे कार्यकारिणी ही करेगी..और इसकी पुष्टि आम सभा करेगी यह संस्था पंजीकरण अधिनियम 1860 की धारा 12 और 12 ए के अनुसार होगा ।

15-न्यायालय संबंधी विषय :-धारा 6-यदि न्यायालय में कोई मुकदमा आदि दायर करना पड़ा तो वह संस्था के नाम ही दायर किया जाएगा और संस्था के नाम से मुकदमा दायर करने अधिकार केवल अध्यक्ष और महासचिव को होगा ।जो कि संस्था पंजीकरण अधिनियम 1860 धारा 6के अनुसार होगा

16-आय का स्थानांतरण नही- संस्था की सभी तरह की चल-अचल संपत्ति केवल संस्था के उद्देश्यों को पूरा करने के कार्य में ही प्रयोग की जाएगी।जैसा की शपथ पत्र में उद्देश्य दर्शाए गये है..संस्था की संपत्ति या संपत्ति का कोई हिस्सा संस्था के पूर्व या वर्तमान सदस्य या पदाधिकारी को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से ट्रांसफर नही किया जा सकेगा।संस्था का पूर्व या वर्तमान कोई भी सदस्य संस्था की किसी भी प्रकार की चल अचल संपत्ति पर किसी भी प्रकार का दावा नही कर सकता।

17-विघटन धारा -13 एवं 14-कार्यकारिणी और साधारण सभा के 2/3प्रतिशत सदस्यों के बहुमत से ही इस संस्था को विघटित किया जा सकेगा ।जो कि समिति पंजीकरण अधिनियम 1860 की धारा 13 और 14 के अनुसार होगा ।

18-अधिनियम को लागू करना :-संस्था पंजीकरण अधिनियम 1860 के सभी अधिनियम और नियम जैसा की एक्ट 21 में हैं और
जैसा की संघराज्य क्षेत्र दिल्ली में लागू है वे समस्त इस संस्था पर लागू होंगे ।

19-निपटान धारा-14-उपरोक्त अनुसार संस्था का विघटन होने के पश्चात उसकी चल अचल संपत्ति को सदस्यों में नही बांटा जाएगा अपितु संस्था पंजीकरण अधिनियम 1860 की धारा 14 के अनुसार 75प्रतिशत सदस्यों के बहुमत से उसे समान उद्देश्यों वाली संस्था को दान के रुप में दे दिया जाएगा ।
हम संस्था की कार्यकारिणी के अध्यक्ष,महासचिव और कोषाध्यक्ष प्रमाणित करते है कि ये संस्था के नियमों और उपनियमों की सही प्रति है
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अध्यक्ष महासचिव कोषाध्यक्ष


स्थान-दिल्ली
दिनांक-




AFFIDAVIT

I ..................., do hereby solemnly affirm and
declare as under:-

(1) That I am the legal owner and in possession of property bearing
No. ...........................................................................
(2)That I shall have "No Objection" if the registered office of the
Society named ".......................' shall be situated at my above said
premises.


DEPONDENT

VERIFICATION:

Verified at Delhi ,on this the 08day of december 2009 that the content of the above affidavit are true and correct to the best of my knowledge and belief and nothing had been concealed therefrom.


DEPONDENT













AFFIDAVIT

I ............................................................................., do hereby solemnly
affirm and declare as under:-

(1) That I am the Presient of the society named "...............' address
.............................................................
(2) That the desirous Person of the societ are not related to each
other by way of blood relation or otherwise.
(3) That the name of Proposed Society is not identical / reassembles
to any other registered/non -registered Society in our Locality as
per my knowledge .
(4) That if name of this society is found attracting the Provision of
Emblems Act of 1950 and /or identical and resembles closely to
any other Society which is already registered under Societies
Registration Act of 1860 in the N.C.T.of Delhi and other law of
land applicable to them then registration granted shall be deemed
to have been withdrawn if the Society fail to change the name
within the given time do so Registrar of Societies,Delhi.

DEPONDENT
VERIFICATION:

Verified at Delhi ,on this the ......day of .......................that the content
of the above affidavit are true and correct to the best of my
knowledge and belief and nothing had been concealed therefrom.

DEPONDENT