Wednesday, October 19, 2016

आज़ादी के 70 साल बाद : आज भी औरतें देश में डायन !

डायन बता 11 साल से हुक्का-पानी बंद, पीड़िता ने पूछा-महिलाएं ही डायन क्यों, मर्द भूत क्यों नहीं?

आनंद चौधरी, रणजीत सिंह चारण | Aug 14, 2016, 08:55 AM IST
अंधविश्वास और कुरीतियों के गढ़ तलाशते हुए भास्कर टीम पहुंची भीलवाड़ा और राजसमंद के गांवों में, जहां घड़ी की सुइयां जाने वक्त के किस दौर में रुकी पड़ी हैं। तभी तो डायन प्रथा के खिलाफ प्रदेश में कानून लागू होने के बावजूद आज भी यहां महिलाओं को डायन बता बहिष्कार करने, अपमानित करने, पीटने और यहां तक जान से मारने के मामले बदस्तूर जारी हैं। भीलवाड़ा में हमें मिली भौली देवी जो मूलत: दरिबा गांव से हैं मगर पिछले 11 सालों से गांव, नाते-रिश्ते और समाज से दूर हैं। कारण ये कि समाज के ही कुछ लोगों ने डायन बता बहिष्कार की घोषणा कर दी। ये हैं रोंगटे खड़े करने वाले मामले...

- बड़ी बहू हेमलता ने भौली देवी (दोनों ऊपर तस्वीर में) का साथ दिया तो उसे भी डायन बता दिया।
- हेमलता कहती है-महिलाएं ही डायन क्यों हो जाती हैं, पुरुष कभी भूत क्यों नहीं होते?
- हमें जवाब तो नहीं मिला, मगर इन दोनों जिलों के दूर-दराज के गांवों में ऐसे कई और सवाल जरूर मिले।
- जिन मामले रिपोर्ट किए गए वे दर्दनाक हैं, मगर ज्यादा मामले तो ऐसे हैं जिसकी कहीं कोई रिपोर्ट भी दर्ज नहीं है।
- सामाजिक कार्यकर्ता तारा आहलुवालिया कहती हैं, महिला को डायन कहना गैर जमानती अपराध है लेकिन आरोपी 6-7 दिन बाद छूटकर आ जाते हैं।

मूं डाकन वैती तो काईं म्हारो परिवार जीवंतो रहतौ?
- मूं डाकन वैती तो काईं म्हारो परिवार जीवंतो रहतौ?
- बालवास गांव में हमारा सामना नंदू देवी के कुछ ऐसे ही दर्द भरे सवालों से हुआ।
- तीन साल से वह एक किलोमीटर दूर अपने घर नहीं जा पाई है।
- सात लोगों के परिवार के साथ वह गांव के बाहर जंगल में एक टूटे से झोंपड़े में रहने को मजबूर है।
- तीन साल पहले पड़ोसी डालू का बेटा बीमार हुआ तो इसका इल्जाम नंदू पर आ गया।
- डालू ने उसे डायन घोषित कर दिया। पूरा गांव उस पर टूट पड़ा।
- दंराती से बाल काट दिए, पीट-पीटकर अधमरा कर दिया। लोग तो उसे कुएं में डालने वाले ही थे पर वहां काम कर रहे मजदूरों ने उसकी जान बचाई।
गाय-बकरी की मौत से लेकर बच्चे की बीमारी किसी बहाने लगा देते हैं डायन का ठप्पा, जबकि संपत्ति या रंजिश होती है
वजह : 90 फीसदी मामलों में उन्हीं महिलाओं को डायन बताया जाता है जिनके पति की मौत हो चुकी या फिर अकेली हैं। इनकी संपत्ति और जमीन हड़पने के लिए नाते-रिश्तेदार साजिश रचते हैं या फिर कोई पड़ौस की महिला अपनी दुश्मनी निकालने के लिए इनपर डायन का तमगा लगा देती है।
कानून बनने के बाद भी सामने आए मामले
1998 से अब तक भीलवाड़ा में 74 और राजसमंद में 2005 से अब तक 29 मामले सामने आए हैं। अप्रेल, 2015 में डायन प्रताड़ना निवारण अधिनियम बनने के बाद भीलवाड़ा में 7 और राजसमंद में 1 मामला सामने आया है।
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पचास से अधिक जिलों में फैला ‘डायन’ वायरस

भारत में कानून की हुकुमत और सामाजिक चेतना के बावजूद डायन प्रथा और उसके हिमायती हार मानने को तैयार नहीं है.
राष्ट्रीय महिला आयोग के मुताबिक भारत में विभिन्न प्रदेशों के पचास से अधिक जिलों में डायन प्रथा सबसे ज्यादा फैली है.
इन जिलों में ऐसी औरतों की सूची लंबी है जो डायन करार दे दी गई और जुल्मों का निशाना बनी. ये सिलसिला अब भी जारी है.
भारत के गांव-देहातों और छोटे कस्बों में अब भी कोई ओझा, भोपा और तांत्रिक किसी सामान्य औरत को कभी भी डायन घोषित कर रहा है. औरत की विडम्बना ये है कि इसमें उसके अपने घर परिवार और रिश्तेदार भी शामिल हो जाते है.

दर-दर की ठोंकरे

"दस साल हो गए मुझे दर-दर की ठोकरें खाते हुए. पति बदला तो पीहर भी बदल गया. जिसके भी दरवाजे पर दस्तक दी, खाली हाथ लौटा दी गई. कसबे में कोई मकान तक किराये पर नहीं देता. जैसे ही पता चलता है ,मुझे मकान खली करने के लिए कह दिया जाता है"
पीड़िता कमला
राजस्थान में टोंक जिले की कमला मीना तीन बच्चो की माँ है. पति ने ताउम्र साथ निभाने का वादा किया था.मगर एक दिन उसने कमला को डायन करार दे दिया और दूसरी शादी कर ली.
कमला ने जब अपना दर्द बयान किया,गला भर आया. कुछ आंसू दामन पर गिरे,कुछ भीतर दिल के दालान पर.
कमला ने कहा, “ दस साल हो गए मुझे दर-दर की ठोकरें खाते हुए. पति बदला तो पीहर भी बदल गया. जिसके भी दरवाजे पर दस्तक दी, खाली हाथ लौटा दी गई. कसबे में कोई मकान तक किराये पर नहीं देता. जैसे ही पता चलता है ,मुझे मकान खली करने के लिए कह दिया जाता है”.
कमला बताती है कैसे उसे आधी रात को घर से निकाल कर मारा पीटा गया, उसने अपने जिस्म पर उभरे कुल्हाड़ी की मार के जख्म के निशान भी दिखाए.
कमला कहती है, “मेरी जान खतरे में है, न उसे पुलिस ने न्याय मिला न किसी इंसाफ के मंदिर से.”.
इन औरतों के लिए कोई खाप पंचायत खड़ी नहीं होती.कोई रहनुमा भी मदद नहीं करता.

पति मरा,जिंदगी खत्म

हिमाचल प्रदेश की निर्मल चंदेल को उस वक्त सहारे की दरकार थी जब अकस्मात पति का निधन हो गया. इसके बाद जमाना बेदर्द निकला.
निर्मल बताती हैं, “ उस समय मेरी उम्र चौबीस साल थी, तब भी लोगों ने कहा इसने ही ऐसे कर्म किये जिससे पति की मौत हो गई. मुझे ही इसके लिए जिम्मेदार बताया गया.”
निर्मल अब ऐसी ही प्रताड़ित औरतों के लिए काम करती है.
वह बताती हैं, “जब मेरे भाई की शादी होने लगी तो सब लोगों ने कहा इसे दूर रखना ,मगर मेरे भाई ने इसे नहीं माना. दिक्कत ये है कि बाकि लोग इस तरह सामने नहीं आते जैसे मेरे भाई खड़े हुए.”

ओझा अपराधी

"उस समय मेरी उम्र चौबीस साल थी, तब भी लोगों ने कहा इसने ही ऐसे कर्म किये जिससे पति की मौत हो गई. मुझे ही इसके लिए जिम्मेदार बताया गया"
पीड़िता निर्मल
महाराष्ट्र में सामाजिक कार्यकरता विनायक तावडे़ और उनका संगठन कई सालों से डायन प्रथा के विरुद्ध अभियान चला रहे है.
तावडे़ के मुताबिक आदिवासी इलाकों में ये प्रथा एक बड़ी समस्या बनी हुई है.वह बताते हैं कि कैसे एक ओझा गाव में एक महिला को डायन करार देने का उपक्रम करता है.
तावड़े उदहारण देते हैं, “जैसे गांव में कोई बीमार हो गया,तो कुछ लोग जवार के दाने बीमार के ऊपर सात बार घुमाकर ओझा के पास ले जाते है. ओझा एक दाना इस तरफ, एक उस तरफ रख कर मन्त्र बोलना शुरू करेगा,कहेगा हाँ, .उसे डायन ने खाया है. उस डायन का घर नाले के पास है, उसमे पेड़ है, इतने जानवर है.आम के पेड़ है, महू का पेड़ है ,इतने बच्चे है, ”
वह आगे बताते हैं, “इनमे जो बातें अनुमान से किसी पर लागु हो जाऐ, उस औरत को डायन करार दिया जाएगा. हमने ऐसे ही एक ओझा को गिरफतार करवाया है. ”
राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य निर्मला सावंत प्रभावलकर ने स्वीकार किया, “ देश के पचास से साठ के बीच ऐसे जिले है जहाँ इस कुप्रथा का बड़ा जोर है. कही महिला को डायन, कही डाकन, तेनी या टोनी, पनव्ती ,मनहूस और ऐसे ही नामों से लांछित कर उसे बहिस्कृत किया जाता है”
"देश के पचास से साठ के बीच ऐसे जिले है जहाँ इस कुप्रथा का बड़ा जोर है. कही महिला को डायन, कही डाकन, तेनी या टोनी, पनव्ती ,मनहूस और ऐसे ही नामों से लांछित कर उसे बहिस्कृत किया जाता है"
राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य निर्मला सावंत प्रभावलकर
प्रभावलकर के अनुसार ये समस्या शिक्षित वर्ग में भी है. जब कोई महिला राजनीती में आती है तो लोग कहने लगेगे ये जहां भी हाथ लगाएगी, नुकसान हो जायेगा. आप चुनाव हार जायेगे, ऐसा कह कर लांछित किया जाता है.
पीड़ित महिलाओं में ज्यादातर दलित, आदिवासी या पिछड़ा वर्ग से है. सामाजिक कार्यकर्ता तारा अहलुवालिया ने राजस्थान में आदिवासी बहुल इलाकों में ऐसी पीड़ित महिलाओं की मदद की है.
वह बताती है, “कोई 36 ऐसे मामले मेरे पास है जिनमें औरत को डायन घोषित कर दिया गया. मगर पुलिस ने कोई मदद नहीं की. फिर बताये कैसे इस कुप्रथा पर लगाम लगेगी. इन पीड़ित औरतों में कई इस कद्र टूट चुकी हैं कि जीने की ललक कम होने लगी है. ”

डायन विरोधी कानून जरूरी

अहलुवालिया ने कहा, “ ये समय है जब डायन विरोधी कानून बनना चाहिए. अकेले भीलवाड़ा जिले में ही कोई ग्यारह स्थान ऐसे है जो औरत के शरीर से डायन निकालने के लिए जाने जाते है. वहां हर सप्ताह भीड़ लगती है. इन औरतों के साथ हर तरह की हिंसा होती है”.
दक्षिण राजस्थान की सुन्दर बाई विधवा है. उन्हें उनके भतीजे ने ही डायन घोषित कर दिया.
सुन्दर बाई बताती हैं, “ पहले मुझे डायन करार दिया,फिर एक दिन मृत घोषित कर पेंशन बंद करा दी. क्योंकि वो मेरी सम्पति हड़पना चाहता है. पेंशन वापस शुरू हो गई है.मगर अब भी मैं डरी हुई हूँ.”
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राजस्थान:
कानून की लगाम कसकर अंध विश्वास रोकने की पहल तो कई बार हुई, पर अभी भी अटका है मसौदा।
राज्य के ज्यादातर जनजाति अंचलों की सैकड़ों महिलाएं डाकण या डायन के दंश के साथ जीने को मजबूर हैं। किसी भी गांव में होने वाली हर अकाल मौत पर इनके रोंगटें खड़े हो जाते हैं। उन्हें भय सताता है कि कहीं कोई समाज का ठेकेदार उन पर डायन का आरोप मढ़कर दरिंदगी पर न उतर आए। महिलाओं को सशक्त बनाने के दावे करने वाली सरकार उनके स्वाभिमान की रक्षा करने के लिए डायन प्रथा रोकथाम अधिनियम को पारित कर लागू कराने में रूचि नहीं ले रही है। यह बात दीगर है कि सरकार ने अध्यादेश लागू कर रखा है, पर पूरे राज्य में अब तक एक भी प्रकरण इस अध्यादेश के तहत दर्ज नहीं हुआ है। नतीजतन आए दिन महिलाओं पर अत्याचार बढ़ रहे हैं।
राजस्थान के ग्रामीणों, आदिवासियों और पिछड़े क्षेत्रों के भौपों, झाडफ़ूंक करने वालों की चौखट से 'डायन' आज सीधे विधानसभा पहुंच गयी और इस बार डायन को विधानसभा के सदन में प्रवेश दिलवाया मंत्री अनिता भदेल ने। राजस्थान में सतीप्रथा को रोकने का प्रयास तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत ने किया था और आज मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे की प्रेरणा से डायन बताकर गांवों में प्रताडि़त की जा रही गरीब, विधवा और मानसिक रूप से विक्षिप्त महिलाओं के शोषन को रोकने का विधेयक विधानसभा में पारित किया गया। यह विधेयक सिर्फ डायन शब्द पर कानूनी औपचारिकता ही नहीं है बल्कि 'राजस्थान डायन-प्रताडऩा निवारण विधेयक-2015' को जिस सख्ती से बनाया गया है आज विधानसभा में चर्चा के दौरान विपक्ष ही नहीं सत्ता पक्ष के विधायक भी 'डायन बिल' के लागू करने से सम्भावित 'मिस-यूज' को लेकर चिंतित दिखाई दिये।
विधानसभा में महिला विधायकों द्वारा डायन बनाने, प्रताडि़त करने एवं शोषण के लिए पुरूष प्रधान समाज को जिम्मेदार ठहराने का प्रयास किया गया, लेकिन डायन बिल पर सबको प्रभावित करने वाली चर्चा सिरोही विधायक एवं देवस्थान राज्यमंत्री ओटाराम देवासी जो स्वयं 'भौपा' जी हैं तथा मुण्डारा अम्बा माता मंदिर के मुख्य संरक्षक भी है। मंत्री देवासी ने समाज में डायन प्रथा को कलंक बताया और कहा कि समाज में अंधविश्वास है तथा डायन नामक कोई शक्ति नहीं होती है। सरकार को डायन प्रथा में महिला उत्पीडन को रोकने के लिए प्रचार-प्रसार और कानून को सख्ती से लागू करना चाहिये।
मेवाड़ के राजसमंद के पास गत दिनों एक महिला को डायन बताकर प्रताडित करने एवं उसकी मौत के बाद सरकार ने डायन प्रथा को गम्भीरता से लिया एवं स्वयं मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे ने पिछड़े, आदिवासी एवं ग्रामीणों में डायन बताकर बाल काटने, गधे पर बैठाकर घुमाने, नग्न करके घुमाना आम बात हो गयी है तथा सरकार और पुलिस डायन बताकर प्रताडित करने वालों के खिलाफ इसलिए कार्यवाही नहीं कर पाती है की अब तक ऐसी घटनाओं में सैकड़ों लोगो के समूह शामिल देखे गये हैं लेकिन डायन प्रताडऩा बिल में पूरे समूह, पूरे गांव या मोहल्ला क्षेत्र के लोगों के खिलाफ सामूहिक मुकदमा दर्ज कर सात साल की सजा का प्रावधान भी रखा गया है।
डायन प्रताडना विरोधी बिल को सदन में प्रारम्भ में बहुत ही मजाकिया रूप में, हंसी-मजाक एवं बहुत ही छोटे रूप में आंका जा रहा था, लेकिन महिला विधायक अल्कासिंह ने जब पुरूष प्रधान समाज में सिर्फ महिला को ही डायन बताने एवं पुरूष के डायन नहीं होने पर प्रश्न किया तब सदन गम्भीर हुआ और विधायक अल्कासिंह ने बताया कि पति के मरने के बाद गरीब महिला से शारीरिक शोषण करने वाले, उसकी सम्पति हड़पने के षडय़न्त्र और कई बार मानसिक रूप से डिप्रेशन-डिसआर्डर महिलाओं को भी समाज के धूर्त लोग डायन बताकर उसे प्रताडि़त करते है और डायन बिल को शारदा एक्ट के बाल विवाह की तरह औपचारिकता मात्र से दूर रखकर सख्ती से लागू करने की मांग भी की गई।
राजस्थान में डायन प्रताडऩा विरोधी बिल की विधानसभा में चर्चा के दौरान विधायक घनश्याम तिवाड़ी ने बताया कि सीकर जिले के लक्ष्मणगढ़ में एक विशाल डायन मंदिर बना हुआ है जिसपर पूरे प्रदेश से डायन पीडि़त महिलाएं आती है। कांग्रेस के गोविन्दसिंह डोटासरा ने डायन मंदिर पर पचास लाख रूपये खर्च कर जिर्णोद्धार की जानकारी भी सदन को दी।
विधायक हनुमान बेनीवाल ने विधानसभा में बताया कि डायन प्रकोप से गरीब, अशिक्षित और आदिवासी ही पीडि़त नहीं है बल्कि पूर्व में नागौर जिला कलेक्टर (आई.ए.एस.) होते हुए भी उनकी शादी इसलिए नहीं हो पाई थी कि बाहर प्रचलन था कि कलेक्टर स्वयं डायन है।
सात बार विधायक बन चुके सुन्दरलाल ने बताया कि डायन प्रथा पर रोकथाम के लिए झाडफ़ूंक करने वालों को जेलों में डालो। यदि यह कानून डायन वाले बाबाओं को राजस्थान से भगा दे तो डायन प्रथा स्वत: ही खत्म हो जायेगी।

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