Tuesday, November 8, 2016

ईमानदारी या स्वार्थी

मैं एक प्रशासनिक अधिकारी को जानता हूँ जिनकी ईमानदारी की लोग मिसालें देते हैं.
वे एक राज्य के मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव थे लेकिन लोकल ट्रेन की यात्रा करके कार्यालय पहुँचते थे. वे मानते थे कि उन्हें पेट्रोल का भत्ता इतना नहीं मिलता जिससे कि वे कार्यालय से अपने घर तक की यात्रा रोज़ अपनी सरकारी कार से कर सकें.
वे ब्रैंडेड कपड़े ख़रीदने की बजाय बाज़ार से सादा कपड़ा ख़रीदकर अपनी कमीज़ें और पैंट सिलवाते थे.
जिन दिनों वे मुख्यमंत्री के सचिव रहे उन दिनों सरकार पर घपले-घोटालों के बहुत आरोप लगे. उनके मंत्रियों पर घोटालों के आरोप लगे. लोकायुक्त की जाँच भी हुई. कई अधिकारियों पर उंगलियाँ उठीं.विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त भी हुई. कहते हैं कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को अच्छा चंदा भी पहुँचता रहा.
लेकिन वे ईमानदार बने रहे. मेरी जानकारी में वे अब भी उतने ही ईमानदार हैं.
उनकी इच्छा नहीं रही होगी लेकिन वे बेईमानी के हर फ़ैसले में मुख्यमंत्री के साथ ज़रुर खड़े थे. भले ही उन्होंने इसकी भनक किसी को लगने नहीं दी लेकिन उनके हर काले-पीले कारनामों की छींटे उनके कपड़ों पर भी आए होंगे.
भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सत्यनिष्ठा और ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं उठाना चाहता. अगर कोई चाहे भी तो नहीं उठा सकता क्योंकि वे सच में ऐसे हैं. वे सीधे और सरल भी हैं.
राजीव गांधी के कार्यकाल को इतिहास का पन्ना मान लें और ओक्तावियो क्वात्रोची को उसी पन्ने की इबारत मान लें तो सोनिया गांधी पर भी कोई व्यक्तिगत आरोप नहीं हैं. कम से कम राजीव गांधी के जाने के बाद वे त्याग करती हुई ही दिखी हैं. एक दशक तक राजनीति से दूर रहने से लेकर प्रधानमंत्री का पद स्वीकार न करने तक.
लेकिन इन दोनों नेताओं की टीम के सदस्य कौन हैं? दूरसंचार वाले ए राजा, राष्ट्रमंडल खेलों वाले सुरेश कलमाड़ी और आदर्श हाउसिंग सोसायटी वाले अशोक चव्हाण.
अटल बिहारी वाजपेयी की गिनती हमेशा बेहद ईमानदार नेताओं में होती रही है. लेकिन उनके प्रधानमंत्री रहते तहलका कांड हुआ, कारगिल में मारे गए जवानों के लिए ख़रीदे गए ताबूत तक में घोटाले का शोर मचा और पेट्रोल पंप के आवंटन में ढेरों सफ़ाइयाँ देनी पड़ीं. यहाँ तक के उनके मुंहबोले रिश्तेदारों पर भी उंगलियाँ उठीं.
ऐसे ईमानदार राजनीतिज्ञ कम ही सही, लेकिन हैं. लेकिन वो किसी न किसी दबाव में अपने आसपास की बेईमानी को या तो झेल रहे हैं या फिर नज़र अंदाज़ कर रहे हैं.
ऐसे अफ़सर भी बहुत से होंगे जो ख़ुद ईमानदार हैं लेकिन बेईमानी के बहुत से फ़ैसलों पर या तो उनके हस्ताक्षर होते हैं या फिर उनकी मूक गवाही होती है.
यह सवाल ज़हन में बार-बार उठता है कि इस ईमानदारी का क्या करें? अपराधी न होना अच्छी बात है लेकिन समाज के अधिकांश लोग अपराधी नहीं हैं. लेकिन ऐसे लोग कम हैं जिनके पास हस्तक्षेप का अवसर है लेकिन वे हस्तक्षेप नहीं कर रहे हैं. जो लोग अपराध के गवाह हैं उन्हें भी क्या निरपराध माना जाना चाहिए? क्या वे निर्दोष हैं?
एक तर्क हो सकता है कि बेईमानों के बीच ईमानदार बचे लोगों की तारीफ़ की जानी चाहिए. लेकिन यह नहीं समझ में नहीं आता कि बेईमान लोगों के साथ काम कर रहे ईमानदार लोगों की तारीफ़ क्यों की जानी चाहिए? बेईमानी को अनदेखा करने के लिए या उसके साथ खड़ा होने के लिए दंड क्यों नहीं दिया जाना चाहिए?
कालिख़ के बीच झक्क सफ़ेद कपड़े पहनकर घूमते रहने की अपनी शर्तें होती हैं. और कितने दिनों तक लोग इन शर्तों के बारे में नहीं पूछेगें?
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कोई महापंडित है, दयावान है, धार्मिक है, दानपुण्य करने वाला है, आशावादी और ईमानदार है लेकिन सड़क पर दुर्घटना हो जाने पर घायल व्यक्ति को इसलिए उठाकर अस्पताल नहीं पहुँचाता क्योंकि पुलिस परेशान करेगी और बाद में कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने पड़ेंगे. तो ऐसी मानवता वाले को स्वार्थी ही कहना ठीक होगा. बेईमान लोगों के बीच रहना और उनकी बेईमानी पर नहीं बोलना या गुनाह में शामिल नहीं होना पर गुनाह करते ख़ामोशी से देखना बेईमानी करना या गुनाह करने जैसा ही है. यह किसी की मजबूरी भी हो सकती है? करे तो क्या करे, नौकरी जो करनी है. हर पार्टी को चुनाव लड़ने के लिए चंदा चाहिए. चंदा चाहे जो भी ले दोषी तो वो सभी लोग हैं जो इस चंदे का उपयोग करके चुनाव जीतते हैं. नेता अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं कर सकते क्योंकि वे ख़ुद भी तो अधिकारियों की मदद से पैसे कमाते हैं. नेता तो पैसा कमाकर चले जाते हैं लेकिन अधिकारियों को तो 30 साल तक नौकरी में रहना पड़ता है. कह सकते हैं कि जो भ्रष्ट है उस नेता को वोट मत दो, अगर दूसरे को वोट दिया और वो भी भ्रष्टाचार करने लग गया तो जनता क्या करे? जनता अगर कुछ न कर सके तो काली पट्टी लगाकर विरोध प्रदर्शन तो करे. और कुछ नहीं तो मीडिया की नज़र तो जाएगी. आख़िर कुछ घोटालों का पर्दा तो फ़ाश हो ही रहा है और मीडिया की वजह से मजबूरी में कुछ कार्रवाई तो करनी ही पड़ रही है हमारी सरकार बेचारी को.

अगर बात ईमानदारी की है तो कई बेईमानों को छिपाने वाला ईमानदार कैसे हो सकता है? माना की हो सकता है ये लोग बेईमान ना हो लेकिन फिर इन्होंने बेईमानों को रोका क्यों नहीं? आख़िर नेता तो यही हैं, पूरी कमान तो इन्हीं के हाथ में है. मैं तो कहता हूं कि सबसे बड़े बेईमान यही हैं.

वास्तव में तर्क संगत है कि अगर ईमानदार व्यक्ति बेईमानी पर शांत रहता है तो यह बेईमानी का साथ देने वाली बात है. यहाँ पर जिस ईमानदार व्यक्ति की बात हो रही है वह कोई कमज़ोर इंसान नहीं बल्कि भारत का सबसे बड़े पद पर बैठा सबसे मज़बूत इंसान है. अगर ताक़त होते हुए भी उसका उपयोग न किया जाए तो उस पर रहने का फ़ायदा ही क्या है? अगर देश की जनता बदलाव टॉप लेवल से देखे तो उसमें उम्मीद भी बढ़े कि वो अगर आवाज़ उठाएगी तो उसकी सुनवाई होगी. जिस तरह हम न्याय प्रणाली में निचली अदालत से होते हुए सुप्रीम कोर्ट में इंसाफ़ की आस में जाते हैं अगर वहाँ भी पता चले कि सभी ऊँचे पदों पर बैठे लोग सिर्फ़ ईमानदार हैं लेकिन अन्याय के ख़िलाफ़ कुछ नहीं करते तो देश कैसे चलेगा? सुप्रीम कोर्ट की गई टिप्पणी अभी भी कमज़ोर को न्याय दिलाने की उम्मीद दिलाती है. पद की इज़्ज़त उस पर बैठे व्यक्ति के कर्तव्यों के पालन से होती है न कि सिर्फ़ मौन व्रत लेकर तमाशा देखने से. सच ये है कि कोई ख़रा और साफ़ बोले तो उसके हज़ारों दुश्मन पल में बन जाते हैं पर दोस्त बमुश्किल मुठ्ठी भर. जो होता है, होने दो मुझे क्या फ़र्क़ पड़ता है की नीति से सिर्फ़ शोषण ही बढ़ता है.

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