Wednesday, October 26, 2016

हमारी मानसिकता में भी संकीर्णता की जलकुंभी उग आई है।

आत्मकेन्द्रण के तलैयो ने जहाँ हमारी संस्कृति को प्रदूषित किया है, वहीं हमारी मानसिकता में भी संकीर्णता की जलकुंभी उग आई है। जिस ताल में हम आधुनिकता के कपड़े धोते है, नहाते हैं, बर्तन धोते हैं और उसी कथित आधुनिकता का पानी पीते भी हैं तो निश्चित रूप से बीमारियाँ तो बढ़ना ही है। हमारे अंदर के पानी ने संस्कारों की बुनियादें कच्ची कर दी हैं। आज लगभग हर बात में तनाव के साथ-साथ विश्वास का संकट समाया हुआ है। ग्रामीण अंचल में लम्बे समय से हाशिए पर रही नारी को जैसे ही मुख्य धारा में पंचायती राज के सहारे लाया गया उनके साथ भी वही विश्लेशकों, नीति निर्धारकों, चिंतकों का विश्वास डगमगाया हुआ था। लेकिन प्रारंभिक हिचकिचाहट के पश्चात आज उसी विश्वास को बनाए रखने में सक्षम सिध्द हुई हैं।
जहाँ एक ओर आ रही जबरन आधुनिकता, स्वच्छंदता व गुमराह स्वतंत्रता को बढ़ावा दे रही है, वहीं आज की नेतृत्व करती नारी परिवार के तारों को आधुनिकता तथा संस्कृति के मध्य समायोजन कर बाँधने का प्रयास कर रही है। सिहोर जिले की कुर्लीकलां ग्राम पंचायत की सरपंच मैनबाई घर-घर जाती हैं, सबसे बातें करती हैं और इसी के चलते उन्हौने गांव पंचायत के विभिन्न वर्ग के लोगों में अपना विशेष स्थान बना लिया है। लोगों की सामाजिक और निजी समस्याओं को धेर्यपूर्वक सुनना और फिर उनके हल की दिशा में सार्थक प्रयास करना, वहाँ के लोगों को भी लगता है कि वे एक नारी हैं इसलिए इस मुकाम पर वे पुरूषों से बेहतर सामजस्य बैठा पाती हैं। मैनबाई स्वयं बहुत ही गरीब आदिवासी परिवार से संबध्द हैं और पंचायत के चारो गांवों, कुर्लीकलां, नांजीपुर, कोड़कपुरा और निमावड़ा के गरीबों की व्यथा समझते हुए उस दिशा में जीतोड़ प्रयास करती हैं।
समाज में नारी द्वारा किया गया विवेकषील व्यवहार समाज को न केवल श्रेष्ठता के रूप में दृढ़ आधार देता है, विभिन्न सामाजिक अंतर्विरोधों को समायोजित करते हुए संतुलित करता है, वरन् भविष्य को भी समरसता की नींव प्रदान करता है। यह नारी ही है जो इन दिनों समाज में विभिन्न संगठनों में होने वाले विमर्श/तर्क-वितर्क/वाद-विवाद को अपने ढंग से ही संयोजित करती हैं और नवीन समाज की रचना में अपना अमूल्य योगदान देती है। होशंगाबाद जिले की बयावड़ा ग्राम पंचायत की सरपंच वैशाली परिहार एम.एस.सी. और एल.एल.बी. की शिक्षा प्राप्त हैं तथा महिलाओं की समस्याओं को लेकर उन्हौने सराहनीय कार्य किए हैं। पंचायत की लगभग 117 एकड़ जमीन को वे ग्रामीण बाजार, मछली पालन, लघु उद्योग आदि लगाने का सोच रही हैं। उनकी निगाह में गांव में ही रोजगार उपलब्ध करवाकर शहरों की ओर होने वाले प्रव्रजनों को रोकना है।
अक्सर हम कुछ नहीं तो हर बात के लिए पश्चिम को कोस रहे होते हैं, परन्तु पश्चिम में अभी भी सब कुछ अपनी जगह बनाए हुए हैं। सिनेमा के आ जाने से नाटक कला नहीं खत्म हो गयी। टी.वी. ने सिनेमा को नहीं हड़प लिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने किताबों सहित सारे प्रिंट मीडिया को निकाल बाहर नहीं किया और न ही आधुनिकता ने पुरानी संस्कृति को जार-जार नहीं किया। दरअसल, वहाँ हर चीज एक विकास क्रम में आई और संस्कार बनकर एक खास जरूरत की हैसियत से जीवन में शामिल हो गई। हर नई चीज का पुरानी चीजों के साथ समायोजन हो गया। जबकि हमारे यहाँ हर नई चीज भड़भड़ाते हुए पुरानी चीजों को रौंदती-कुचलती आई। नतीजतन हड़कंप मचता रहा। वर्तमान परिदृश्‍य वस्तुत: भारतीय संस्कृति का क्षरण काल है, जहाँ कर्मनिष्ठा के साथ-साथ मानवीय मूल्यों में बेतहाशा गिरावट आई है। धर्म को विदू्रप बनाकर, विश्वास की दीवारों को हिलाकर, भौतिकतावाद की बढ़ती आग के तले सभी को उपभोक्तावादी सोच में उलझाकर विषयनिष्ठा से जोड़ दिया है। ऐसे में आज फिर नारी के उस योगदान की आशा प्रासंगिक हो गई है जहाँ से समायोजन का सेतु बाँधा जा सकता है।
अब मीरादेवी मिश्र को ही लीजिए। वे कोनिया कोठार ग्राम पंचायत जिला सतना की सरपंच हैं और प्रारंभ में उनकी पंचायत सचिव से नहीं बनती थी लेकिन अपनी व्यवहार कुशलता से उन्हौने सचिव को पक्ष में कर लिया और विकास के कई कार्यों को अंजाम दिया। जैसे ही छुआछूत की बात आती है तो वे स्वयं ब्राम्हण होकर भी कहती हैं, ''मैं कई प्रशिक्षण कार्यक्रमों में जाती हूं और सभी वर्ग की महिलाओं के साथ बैठकर खाना-पीना करती हूं...... वर्ग भेद बनाया हुआ है और समय के साथ मिटता जाएगा।'' मीरादेवी ने इसी बात को अपने कर्मों में भी उतारा है और हरिजन बस्ती की सड़क, चबूतरे बनवाए। इसी तरह रोहाना ग्राम पंचायत की पंच रामवती भी कहती है, ''एक दलित के रूप में मुझे लोगों द्वारा नजरअंदाज किए जाने की आदत थी, लेकिन जब से मैं निर्वाचित हुई हूं अब वही लोग मुझसे अदब से बात करते हैं, ईश्वर ने मुझे नई राह दिखाई है और मैं भी जितना कार्य हो सकेगा उतना करूंगी और आगे मैं भी सरपंच बनना चाहूंगी।''
जिस प्रकार भोजन में संतुलन आवश्यक होता है उसी तरह हमारी महत्वाकांक्षाओं में भी संतुलन आवश्यक है, वरना अजीर्ण होने की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं। नारी अपने प्रयासों से अपने परिवार की इन महत्वाकांक्षाओं पर लगाम लगाने का कार्य पूर्ण समझ के साथ कर सकती हैं। क्योंकि उसे सारे मसालों में संतुलन बखुबी आता है। वे ही विवेकानंद के इस नारे को सार्थक कर सकती हैं, 'उठो, जागो और उद्देश्य की प्राप्ति होने तक मत रूको।' बकसरी बाई विश्वकर्मा, नाहली ग्राम पंचायत जिला हरदा की सरपंच हैं और उनका मानना है कि वे सिर्फ इसलिए चुनाव जीत पाई क्योंकि उनके परिवार की छवि ईमानदार, योग्यतासम्पन्न और हमदर्द की थी। आज भी समाज में इन बातों के मूल्यों का जनमानस में प्रभाव है और जैसे ही विकल्प मिलता है समाज स्वयं उन्हे मुख्य धारा में लाने के प्रयास करता है। पंचायत की दूसरी महिलाओं को वे अपना उदाहरण देते हुए कहती हैं कि ''पहले मैं भी बहुत हिचकती थी, परंतु मुझे एहसास हो गया कि अगर डर हावी हो गया तो मैं कुछ भी नहीं कर पाउँगी'' और इसी के चलते पंचायत की सभाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ी है।
कुल मिलाकर नेतृत्व करती नारी को समाज की बेहतरी के लिए बहना होगा नदी की तरह। सामाजिक समागम, आपसी समझ का विचार, समस्याओं के मूल में जाने की प्रवृति, आत्मविश्लेशण, धैर्य...इन सभी छोटी-छोटी नदियों को जिस तरह से उन्हे अपनी नदी में प्रवेश दिया है वह आज अपने परिणाम दिखा रहा है। ऐसा नहीं है कि विचारगत अंतर नहीं होंगे, समस्याएँ नहीं होंगी, वे भी होंगी...नदी के दो किनारे कहाँ मिलते है एक-दूसरे से.....फिर भी, वे साथ-साथ चलते हैं, एक दूसरे के समानांतर। विभिन्न नदियों में व्याप्त अधकचरेपन की सफाई और उनके आधुनिकता के उथलेपन को मिटाने के लिए मुहीम नारी को ही मुखिया बन कर चलानी होगी तथा उन्हें अपने व समाज के जीवन में भी उतारना होगा.... ताकि हम जीवन की इस दौड़ में अधकचरे न रह जायें। बकौल शायर, ''डाले गए पत्थर इस वास्ते आगे/ठोकर से अगर होश संभल जाए तो अच्छा।''
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मैं मिट्टी में खेला, मिट्टी में ही बना हूँ। गाँव में जन्मा, बचपन का बड़ा हिस्सा वहीं बीता, किशोरावस्था की भी बड़ी कोशिश की दुपहरी और ऍंधेरी-उजाली रात गाँव में ही बीती। अब फिर गाँव में हूं फेलोशिप की वजह से। इस थोडे से अंतराल में गाँव में बडे-बडे क़्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं, शक्ति के नए समीकरण बने हैं। त्रिस्तरीय पंचायती राज आ गया है। महिलाएँ भी नेतृत्व करने लगी हैं। हौले-हौले शहर की सभी न्यामतें यहाँ पहुंच गयीं हैं। शहरी आदतें धीरे से अपनी पैठ जमा रहीं हैं। देर तक जगना, देर से सोना, शोर-शराबे में एकान्त क्षण पाना। अब देखता हूं बच्चे रेडियों, टीवी, टेपरिकॉर्डर के मतवाले हैं और उन्हे पूरे वाल्यूम पर चला देते हैं, तभी उनके पढ़ने में एकाग्रता बनती है।
गोंड़ और बैगा आदिवासी बहुल मंड़ला और बालाघाट जिले की यात्रा के दौरान महिलाओं को शासन करते और उन्हे समाज द्वारा अपनाते हुए देखना उतना ही अच्छा लग रहा था जितना की किसी अच्छे बदलाव के होने पर लगता है। लेकिन लगभग पूरी तरह से बदलते गाँव में स्मृतियों में बसा पुराना गाँव और उसकी अमराई आज भी बुलाते प्रतीत होते रहे। वह खुला ऑंगन बुलाता रहा जहाँ कूटे गए धान की महक में, कूटने वाली चूड़ियों की खनक में और उसके भरे-पूरे होने की लहक में रोम-रोम खिल उठता था। वह बड़े से बरगद की छाँव बुलाती रही जहाँ जेठ की दुपहरी कबड्डी को और सावन की दुपहरी झूलों के मध्य खिलखिलाती ग्रामीण नवयौवनाओं को अर्पित होती थी। दूर उस पीपल की छांव में बच्चे दिन-दिन भर ढेरों तरह के खेल खेला करते थे और झगड़ते रहते थे अपने-अपने दाव के लिए। गाँव से थोड़ी ही दूर पर बारहमास बहने वाली नालेनुमा नदी जो पनघट के साथ-साथ सांस्कृतिक केन्द्र भी थी, वह बुलाती रही। पहले जब संध्या होती थी तब गांव के हर ऑंगन में उस छोटे से तुलसी के बिरवे के नीचे छोटा-सा दिया जलता था तो अनायास ही हाथ प्रार्थना की मुद्रा में जुड़ जाते थे, क्योंकि उस दिए में लौ मिली हुई थी संयुक्त परिवार की, माँ की, बहन की, भाभी की, पत्नी की, बहू की, बेटी की, रोटी की, भात की, नए गुड़ की ...।
अब यही गाँव शहरनुमा तर्ज पर बदल रहे हैं। उनका अपनी मौलिकता और ठेठपन गायब नजर आता है। मंड़ला जिले में स्थित विश्वप्रसिध्द कान्हा-किसली नेशनल पार्क से लगे हुई खटिया ग्राम पंचायत को ही लीजिए, बैगा और गोंड़ आदिवासी क्षेत्र इन दिनों विभिन्न लुभावने रिसोर्टों से अटा पड़ा है। सरपंच सुखवती बाई बताती हैं कि क्षेत्र में पानी की समस्या है और खेती के लिए भी पर्याप्त जल स्रोत नहीं हैं। दूसरी और हम देखते हैं कि वहाँ आपको बहुराष्ट्रीय कंपनियों के तमाम तरह के शीतल पेय पग-पग पर मिल जावेंगे और रिसोर्टों के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध हो जाता है। बाजार के दखल ने आदिवासियों को हाशिए पर धकेलना प्रारंभ कर दिया है।
खटिया पंचायत के सचिव बालकुमार यादव जिनके हाथ में ब्लूट्रूथ, केमरा युक्त अत्याधुनिकतम मोबाईल फोन है, 25-30 मिनिट की बातचीत के दौरान वे कई बार बतियाते भी हैं, और एक कुशल प्रबंधक की तरह से कहते हैं कि हमने आदिवासियों की लोककला को पर्यटकों के लिए एक समूह के माध्यम से खोल दिया है। पंचायत में ऑपरेशन थिएटर एवं सुविधा सम्पन्न प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र भी है लेकिन अभी भी वहाँ प्रसवोपरांत मृत्यु दर्ज हो रही है। दूसरी बार सरपंच बनी सुखवती बाई जो स्वयं भी गोंड़ हैं, कई मुद्दों पर अनभिज्ञ हैं और सचिव को ही आगे ठेलती दिखती हैं। उनके आरसीसी के निर्माणाधीन घर में भी रंगीन टीवी, डीवीडी प्लेयर आदि उपलब्ध है।
मोबाईल हाथ में लिए 38 गांवों की जनपद की जनपद सदस्य मंडला जिले के मोगा ब्लॉक की और गोंड़ आदिवासी सोनाबाई उइके भी गांवों से शहरों की ओर होने वाले प्रव्रजन से चिंतित हैं। उनके स्वयं के गांव पलिया के आसपास पर्यटन विभाग की वृहद परियोजना 'चौगान' को व्यवहारिक रूप देने की चल रही है। पास ही बहती जीवनदायनी नर्मदा की टूटती धाराएँ और बहुत कम होता पानी भी अत्यधिक दोहन की ओर इशारा करता है।
मंडला और बालाघाट जिलों के अन्य गांवों को भी देखने के बाद उनमें बाजार की घुसपैठ का अंदाजा लगाया जा सकता है। एक दूरस्थ गांव भानपुर खैड़ा के आदिवासियों की भी सामाजिक-आर्थिक हालत कमजोर है लेकिन एक सात-आठ साल के बच्चे को विभिन्न कंपनियों के 'गुटके' बेचते हुए देखकर स्थितियाँ और भी साफ हो जाती हैं। इसी गांव के लोगों से बातचीत करने पर पता चलता है कि किसी कथित प्रायवेट बैंक की एक ऐजेंट यहाँ से हजारों रूपए पक्के मकान बनवाने के नाम पर झांसा देकर भाग चुकी है।
बालाघाट जिले की हट्टा ग्राम पंचायत का दौरा करने के बाद तो लगता है कि पूरे कुँए में ही भांग घुली है। तमाम ईंट के भट्टों के ठेकेदारों ने पंचायत के विकास के समीकरण बदल से दिए हैं। इन आदिवासी पंचायतों में भी सारे शहरी तौर-तरीके, भागम-भाग, पैंतरे आ गए हैं। इसी क्षेत्र में कार्य करने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता विवेक पवार कहते हैं कि हम आदिवासियों का विकास चाहते हैं, अभी तक गांधीवादी दृष्टिकोण से चलने वाले इन आदिवासियों के लिए विकास की कौनसी परिभाषा ली जावे ताकि ये विकास की मुख्य धारा में भी आ जावें और इनकी मौलिकता भी बची रहे...... यह प्रश्न अभी भी जस का तस हमारे समक्ष एक चुनौती की भाँति खड़ा है।
इन सबके कारण भी हैं और ठोस कारण हैं। अब हम आदर्षों, संस्कारों, परम्पराओं, भावनाओं, आस्थाओं के जीते नहीं है, वक्त आने पर इन्हे शब्दों की भाँति दोहरा भर लेते हैं या फिर भार की तरह ढ़ो लेते हैं। इस पर ज्यादा कुछ बात करो तो चाँद पर पहुँचने की दुहाई दी जाती है, दकियानूसी होने के आरोप लगाए जाते हैं और फिर से वही दौर प्रारंभ हो जाता है। दूसरा कारण है थोड़ी ही दूर पर उपलब्ध बाजार, जहाँ उपभोक्तावाद मुंह फाड़े खड़ा है। जिसके आगे भावनाएँ, इच्छाएँ, मान-मर्यादाएँ सब गौण हैं, महत्वपूर्ण है तो बस रूपया। इसके अलावा लुभावने, मन-भावन भौतिक संसाधन, सुख सुविधाओं की दिखावटी चमक-धमक और एक अजीब से आकर्षण की मृग-तृश्णा, सब कुछ तो है बाजार के पास। ऐसे में गाँव को महज यह कह कर रोकना कि सभी चमकने वाली वस्तु सोना नहीं होती, नक्कार खाने में तूती की आवाज जैसा लगता है। यह आवाज उस चालाक और बधिर बाजार के मायाजाल से टकराकर बोलने वाले के पास प्रतिध्वनि के रूप में पुन: लौट आती है। सब कुछ पा लेने की दौड़, झटपट काम करने की हौड़ और रोज बनते-बिगड़ते रिश्तों की जोड़-तोड़ के माहौल में किसी से यह आशा रखना कि वह हाथी के इन शोदार दातों या नकली चमकते सोने को पहचान ले अपने ज्ञान के जरिए तो यह बेमानी होगा, क्योंकि इतना ज्ञान भी किसके पास है ?
औद्योगिकरण और मशीनीकरण के प्रभाव से कथित विकास हुआ, ग्रामीण शहरों की और भागने लगे। येन-केन-प्रकारेण धन कमाने के सारे साधन पूंजीवादी लोगों के कब्जे में आ गए और गांधी का सपना बिखर कर रह गया। ग्रामीण व्यवसाय शहरों की ओर पलायन कर गए और प्रत्येक गाँव की स्थिति वैसी ही हो गई जैसी अंग्रेजों के समय थी। उस समय कच्चा माल विदेश जाता था और उसी से बना माल उच्च कीमत पर बिकने भारत आता था।
मूंगफली, तिल, सोयाबीन सस्ते दामों पर शहर जाने लगी और मिलों द्वारा तैयार तेल, खली महँगे दामों पर गाँव में बिकने के लिए आने लगे। गाँव में रहने वाले तेली, खाती, लुहार, कुम्हार, मोची अपने-अपने कार्यों के अभाव में मजदूरी करने शहर जाने लगे। कपास, दूध, दलहन सभी मिल मालिकों के कब्जे में आ गया। दही बिलौने, चरखें आदि के दिन लद गए। अब गाँव की दुकानों पर फलां छाप नमक, फलां छाप तेल, फलां साबुन-टूथपेस्ट आदि बिकने लगे। मशीनीकरण की वजह से कृपि के यंत्र बुवाई, सिंचाई, बीज, खाद आदि शहरों में केन्द्रित हो गए और सारी खेती शहरी उपकरणों की गुलाम हो गई। जमीन भी विपरीत परिस्थितियोंवश टुकडे-टुकड़े में बँट गई और कई लोग उन्हे बेच-बेचकर शहर में रोजगार की तलाश में निकल गए। खेत जुताई के लिए ट््रेक्टर, बीज, खाद के लिए बड़ी कंपनियों के माल का सहारा, सिंचाई के लिए बड़ी कंपनियों के ही इंजन या विद्युत पंप। कुल मिलाकर खेती वही कर सकता है जिसके पास नकद पैसा हो, नहीं तो उधारी और तगडा ब्याज भरो इसके अलावा कोई चारा नहीं।
पहले सारा परिवार खेती में लगा रहता था, खेती में इतना पैसा खर्च नहीं होता था, केवल कामगारों को फसल पर अनाज देना होता था, अब स्थिति यह है कि कमाई का आधे से अधिक भाग उन्ही पूंजीवादी संस्थानों को जा रहा है। इसतरह यह फिर से जमींदारी प्रथा का ही नयारूप जन्म ले रहा है। जहाँ खेती की पैदावार से बगैर मेहनत के बिचौलिए ही वारे-न्यारे हो जाते हैं वही उन्हीं किसानों का माल चमकीली थैलियों, डिब्बाबंद प्रदार्थों के रूप में पुन: उन्ही के पास अधिक दामों में आता है। गाँवों का यह ढांचा बिगड़ने से कई लोग 'फ्री' हो गए हैं। या तो ये लोग शहरों की और पलायन कर रहे हैं या फिर वहीं गाँव में राजनीति, प्रपंच, झगडे आदि में व्यस्त रहते हैं।
यह एक विडंबना ही है कि गाँव के लोग मजदूरी करने शहर जाते हैं और अपने बीबी-बच्चों को जो गाँव में रह रहे हैं, उन्हे भेजी गई पगार से जीवन यापन करना पड़ता है। शहर के संकुचित माहौल में जाकर ये ग्रामीण अधिक से अधिक पैसा कमाने के चक्कर में अपना स्वास्थ्य खराब कर बैठते हैं। ग्रामीण उद्योग धंधों के नष्ट हो जाने के कारण खाट, बांण, मटके, लकड़ी व अन्य लोहे के सामान भी शहरों में उसी प्रकार से आने लगा है जैसा कि पचास साल पहले पैसिंल, सुई, गर्डर, मशीने लंकाशायर और लंदन से हमारे यहाँ आती थी।
आइये जरा ऑंकड़ों की जुबान से गाँवों को निहारें तो शहरों की भॉति गाँवों में भी हरित क्रांति के बाद एक नव-धनाड़य वर्ग ने जन्म लिया है। चूंकि भारत में ग्रामीण जनता का प्रतिशत ज्यादा है इसलिए उदारीकरण के बाद विदेशी कंपनियाँ अपने उपभोक्ताओं को वहीं गाँव में पकड़ रही हैं। ग्रामीण उपभोक्ता की नब्ज दबाकर ये कंपनियाँ उनके हिसाब से अपने उत्पादों में बदलाव लाकर बेच रही है। पिछले साठ सालों की आजादी के बाद हमने उन्नति के नए-नए इतिहास रचे हैं, परंतु यदि मूल में जाकर देखें तो अंग्रेजों के समय का औपनिवेषिक दृष्टिकोण आज भी हमारे विचारों की गहराई में मिल जाएगा। यह आजादी 25 प्रतिशत लोगों को लाभकारी हुई है जबकि 75 प्रतिशत लोगों के लिए थोड़ी सी स्वतंत्रता के साथ वही अग्रेजी शासन की पुनरावृत्ति भर है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपने समय जिस तरह के गाँव की कल्पना की थी वह अब केवल स्वप्न रह गया है।
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शिक्षा मानवीय विकास का प्रभावशाली साधन रहा है। मनुष्य की सारी कृतियाँ उसके द्वारा प्राप्त शिक्षा पर निर्भर करती हैं। यही नहीं शिक्षा किसी भी राष्ट्र की स्वयंभू स्थिति की संवाहिका होती है, नींव होती है। वास्तव में शिक्षा के महत्व को चंद शब्दों में समेटा नहीं जा सकता है।
कहते हैं न कि किसी चीज की कमी हमें उसके वास्तविक मुल्य का आभास करवा देती है। यही हालात पंचायती राज में राज-पाट संभाल रही महिलाओं का है। जैसे-जैसे उनका कार्यकाल सरपंच, पंच, जनपद अध्यक्ष, सदस्य के रूप में आगे बढ़ रहा है और परिस्थितियोंवश जो कम या बगैर शिक्षा के रह गईं, वे आज महसूस करतीं हैं कि काश वे शिक्षित होतीं तो वे आज कुछ और ही होती। बालाघाट जिले की हट्टा ग्राम पंचायत में एक गोंड़ आदिवासी नायिका लगातार तीन पारियों से सरपंच बन रही भगलो बाई पुरूषों को हराकर अपने पद पर काबिज हुई हैं। तीन गांवों को मिलाकर बनी पंचायत की 'सरदार' भगलो बाई स्वयं पढ़ी-लिखी नहीं हैं और दंभगता से कहती हैं, ''पढे-लिखो ने अच्छाईयों की जगह बुराईयों को ज्यादा अपनाया है।'' यह उनका अपना विश्वास है लेकिन वे शिक्षा के मुद्दे पर कुछ नहीं करती ऐसा नहीं है। उनकी खुद की संताने पढ़ी-लिखी हैं और पंचायत में भी शिक्षा और विशेषकर बालिका शिक्षा के लिए उन्हौने विशेष कार्य किए हैं।
आज शिक्षा की वास्तविक हालत से हम सब वाकिफ है, तथा अब यह प्रश्न उठते हैं कि जब किसी भी देश का वर्तमान व भविष्य वहॉं कि शिक्षा व्यवस्था से ही बनता है, बिगड़ता है फिर भी शिक्षा को शिक्षा की दिशा और स्थान क्यों नहीं दिया जाता है? उसकी प्रतियोगिता की सैध्दांतिक ही अधिक रहने देकर अव्यावहारिकता व औपचारिकता में ही क्यों लपेटा जाता है। ये व ऐसे ही कई प्रश्न आज शिक्षा को अपनी वास्तविक मंजिल से दूर रहने पर उठते हैं। इन सब के प्रमाण-स्वरूप आइए, कतिपय मनीशियों के विचारों की गहराई में उतर कर शिक्षा के अभिप्राय व मानदण्डों की प्रासंगिकता देखते हैं।
गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टेगोर ने अपनी पुस्तक 'माय स्कूल' में लिखा है, 'हम किसी कोतुकालय में रखी हुई निष्प्राण वस्तुओं की भाँति कक्षा में बैठे रहते थे। जिन पर पाठों की उपल वर्षा की जाती थी। जीवन के परिवेश से शिक्षा दूर तक भटक गई थी। प्रकृति के स्वास्थ्यप्रद तथा पूर्णता की ओर अग्रसर करने वाले प्रभावों से उनका संबंध टूट गया था।'
ग्रामीण परिवेश आज भी हमें उस तरह का माहौल पैदा करता है जिसमें शिक्षा का मूल उद्देश्य बाहर निकल कर आ सकता है। शिक्षा को बहुत ज्यादा मशीनीकृत बनाना ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। प्राचीन समय के गुरूकुल की ओर यदि हम दृष्टि डालें तो वहाँ की दी गई शिक्षा संपूर्ण विकास का प्रतीक थी। हमें भी उसी तरह की शिक्षा प्रणाली को अपनाते हुए शिक्षा का ढांचा तैयार करना था। अजगरहा पंचायत की सरपंच मायादेवी कहती हैं कि माहौल के मुताबिक शिक्षा यदि दी जावे तो वह अधिक व्यवहारिक होगी और हमारे सर्वांगीण विकास का मार्ग भी खोलेगी। वे आगे कहती हैं कि उनके चारो बेटे इसी ग्रामीण माहौल में पढ़े हैं और आज उच्च पदों पर रहकर सारी संवेदनशीलता के साथ अपना कार्य कर रहे हैं जो आज के समय में विलोपित होता जा रहा है। यही संवेदनशीलता, कर्मठता, तन्मयता उसी ग्रामीण परिवेश की शिक्षा की देन है जो उन्हे भौतिकता के अथाह समुद्र में भी अलग साबित करती है।
मुंशी प्रेमचंद लिखते हैं, 'विद्यार्थी की परीक्षा जब तक नहीं होती, वह उसी की तैयारी में लगा रहता है, लेकिन परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद भावी जीवन संग्राम की चिंता उसे हतोत्साहित कर दिया करती है। उसे अनुभव होता है कि जिन साधनों से अब तक मैंने सफलता प्राप्त की है, वे इस नए, विस्तृत, अगम्य क्षेत्र में अनुपयुक्त हैं।'
ग्राम्य जीवन को सबसे अच्छे ढंग से प्रेमचंद के अलावा किसी और ने कागजों पर नहीं उतारा है। इटमा तीर, जिला सतना की जुझारू सरपंच कमला बाई स्वयं निरक्षर हैं लेकिन शिक्षा के प्रति उनके सोच सुनकर हेरत होती है कि शिक्षा पाकर भी लोग बेरोजगार बनकर फिर से समस्या बने इससे पहले ही उनके लिए कोई उपाय होना जरूरी हैं। पढ़-लिखकर बच्चे खेती या मेहनत के कार्यों से जी चुराते हैं... वे गांव में रहना ही नहीं चाहते हैं... यह गांवों के लिए सबसे खराब बात है।
स्वामी विवेकानन्द ने युवाओं का आह्यान करते हुए एक जगह लिखा है, 'विदेशी भाषा में दूसरों के विचारों को रटकर अपने मस्तिष्क में उन्हें ठूस और विश्वविद्यालयों की कुछ पदवियाँ प्राप्त कर तुम अपने को शिक्षित समझते हो? क्या यही शिक्षा है? वह शिक्षा जो जनसमुदाय को जीवन-संग्राम के उपयुक्त नहीं बनाती, जो उनकी शक्ति का विकास नहीं करती, जो उनमें प्राणी विषयक दया का भाव, सिंह का साहस पैदा नहीं कर सकती, क्या उसे भी हम शिक्षा का नाम दे सकते हैं?' महर्षि अरविंद ने सच्ची राष्ट्रीय शिक्षा की विवेचना करते हुए कहा कि - सच्ची और 'सजीव' शिक्षा केवल वही कही जा सकती है जो मनुष्य की इस तरह सहायता करे कि उसके अंदर जो भी शक्ति-सामर्थ्य निहित है, वह बाहर अभिव्यक्त होकर उसके जीवन में अपना पूरा लाभ प्रदान करे, तथा मनुष्य-जीवन का जो भी संपूर्ण उद्देश्य और संभावना है उसकी संसिध्दि के लिए उसे तैयार करे।
ये तो थे मनीशियों के विचार जो दशकों पूर्व लिखे गये थे और स्पष्‍टत: आज के परिदृश्य पर भी उतने ही सार्थक व खरे उतरते हैं। एक और बिंदु इनसे उभरता है वह है कि हम शिक्षा के मूल उद्देश्य, प्रक्रिया, दिशा से भटके हुए हैं। और इसे महसूस भी वे जमीनी स्तर पर कार्यरत नेत्रियाँ कर रही है। वास्तव में माँ ही प्रथम गुरू होती हैं और इसे कम या लगभग निरक्षर महिलाएँ समझ पा रही हैं। मोगा ब्लाक, जिला मंडला की सोनाबाई उईके जनपद सदस्य रहते हुए आंगनवाड़ी और एक प्राथमिक स्कूल अपने बूते पर खुलवाने में सफल हुई और घर-परिवार के सहयोग के चलते वे पढ़ने-पढ़ाने में बहुत उत्साहित हैं।
शिक्षा वस्तुत: वह समाहन समीकरण रहा है जिसकी अवधारणा बार-बार हमारे शास्त्रों में उपजी है, झनझनाई है। कई उपनिशदों में यह प्रार्थना की गई है कि मैं स्पष्ट व पर्याप्त सुन सकूँ तथा देख सकूँ। इस प्रकार बेहतर, पवित्र, सूक्ष्म और गहराई तक देखना, सुनना, आकांक्षा करना भारतीय शिक्षा का प्रथम उद्देश्य रहा है। मतलब यह कि चरित्र मजबूत बने, वासनाओं और दुष्प्रवृतियों पर नियंत्रण हो सके तथा एकाग्रता और संकल्प की शक्ति बढे। यह मात्र हमारी छिपी हुई शक्तियों को उजागर नहीं करती है, अपितु सार्थक जीवन का आधार भी है। यही ग्रीको की भी शिक्षा है। अफलातून के अनुसार एक ऊंची आत्मा है और एक नीची आत्मा। शिक्षा की प्रक्रिया में निरंतर मन को धीर-धीरे उच्चतर मन के नियंत्रण में लाया जाता है। इसके लिए शिक्षा में योग, उद्योग व सहयोग का सिद्वांत निहित है। पाठयक्रम में शिक्षा के इन तीन पहलुओं के अध्ययन हेतु उपयुक्त मन:स्थिति का विकास, रोजगार पाने योग्य व्यावहारिक ज्ञान, सेवा और कर्तव्यनिष्ठा का सामंज्य होना चाहिए। शिक्षण कार्यक्रमों में छात्रों के मूल्यों के निर्माण की क्षमता होनी चाहिए।
text"धार जिले की जाबड़ा पंचायत की सरपंच राजकुंवर हाल ही में भारत सरकार द्वारा भेजे गए 100 युवाओं के दल के साथ चीन यात्रा कर आ चुकी हैं और वे इसके लिए शिक्षित होने को महत्वपूर्ण बताती है। मध्यप्रदेश उन अग्रणी राज्यों में से एक है जहाँ 29 विषयों को अभिशासन संबंधित राज्य शासन के अधिकार ग्रामसभाओं को प्रत्यायोजित कर दिए गए हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े विषय इन्ही 29 विषयों में सम्मिलित हैं। पंचायत में अब सामान्य प्रशासन, शिक्षा व स्वास्थ्य तथा निर्माण समीति पंचायतों में अस्तित्व में हैं। वैशाली परिहार बयावड़ा ग्राम पंचायत, जिला होशंगाबाद की सरपंच हैं और स्वयं एम.एससी., एल.एल.बी. हैं। उन्हे कभी भी यह प्रेरणा नहीं मिली कि उच्च शिक्षित होने पर वे गांव में रहकर अपना जीवन व्यर्थ कर रही हैं। खुद उच्च शिक्षित होने का परिणाम भी यह रहा कि पंचायत के कई कार्यों में जितनी सहजता उन्हे हुई और किसी को नहीं हो सकती थी। शिक्षा उन्हे एक अध्यापक के रूप में जीवन में सुधार लाने का बुनियादी तरीका लगता है। उनकी ग्राम पंचायत में सिर्फ प्राथमिक स्कूल है और हाई स्कूल वहाँ से तीन किलोमीटर दूर है। अक्सर इस वजह से लड़कियों का स्कूल छुड़वा लिया जाता था। उन्हौने पहल की और परिणाम भी बहुत जल्द मिला कि उनकी अपनी पंचायत में माध्यमिक स्कूल खुलवाया और बड़ी संख्या में अब लड़कियाँ उस स्कूल में पढ़ने जाती हैं। कुल मिलाकर ग्रामीण नेटवर्क में शिक्षा को लेकर श्रेष्ठ भावनाएँ तो प्रक्रिया में आ चुकी है और कई जगह उनका आदर्श रूप में संचालन हो रहा है लेकिन अभी भी संतुष्टि का स्तर आने में समय लगेगा।
शिक्षा की प्राचीन प्रणाली के अपने उच्चतर लक्ष्य थे लेकिन उनमें वे लक्ष्य भी समाहित थे जो आधुनिक शिक्षा पद्वति प्राप्त करना चाहती है। लेकिन असफल रहती है। आज सिर्फ इस बात पर अधिक जोर दिया जाता है कि देश के नौजवान अपनी रोजी-रोटी कमा सके बस। आखिर जब मनुष्य के मानसिक, बौद्विक व उच्च क्षेत्रीय विकास करने से इस शिक्षा का प्राय: कोई सरोकार ही नहीं रहा तो फिर इसे शिक्षा कैसे माना व कहा जाए? जहाँ शिक्षा को एकाग्रता के अभाव, विचलन, असंतोष आदि पर विजय पाने में सहायक होना चाहिए। वहीं आज तीक्ष्ण मन भी इन विकारों से ग्रस्त है। व्यक्ति कुछ मामलों में ऊंची उपलब्धियाँ प्राप्त करने में सफल हो सकता है, बुध्दिमान हो सकता है वह एक अच्छा इंजीनियर, रसायनशास्त्री, साहित्यकार, प्राध्यापक, प्रशासक हो सकता है। पर इसके बावजूद भी उसका मस्तिष्क धुँधला व बिखरा सा रहता है। वहीं एक निरक्षर ग्रामीण महिला जिसके पास शिक्षा नहीं है लेकिन अनुभव के आधार पर न केवल राज-काज चला रही हैं वरन् मौका मिलने पर उसमें बदलाव की प्रक्रिया को भी जोड़ रही हैं। उसके पास उतने अवसाद भी नहीं हैं जितने आज एक पढ़े-लिखे लोगों के पास हैं। उसके पास अपनी एक जीवन शैली है जिसमें रहकर वह अपेक्षाकृत अधिक संतुष्ट है।

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